धर्मशास्त्रों में मानव जीवन को कई चरणों में बांटते हुए कहा गया है कि वानप्रस्थ का पालन भी जीवन का अंग है, जिसमें परमात्मा से साक्षात्कार होता है। जब सांसारिक सुख-सुविधा से विमुख होकर मनुष्य एकांत साधना के लिए वन जाता है, तब भी उसे प्रभु को याद करते हुए हमेशा मानव कल्याण में तत्पर रहना चाहिए।
इसी से जुड़ी एक कहानी परम विरक्त विभूति शुकदेव जी का है। बाल्यावस्था में ही जब वह गृह त्यागकर जाने लगे, तो उनके पिताश्री वेदव्यास जी ने कहा, वत्स, शास्त्रों के नियमानुसार ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम, इन तीनों का पालन करने के उपरांत जीवन के अंतिम दौर में तुम्हें संन्यास लेकर वन जाना चाहिए।
शुकदेव जी ने कहा, पिताश्री, मैंने जन्म किसी भी प्रकार का भोग करने के लिए नहीं लिया है। मैं तो मानव को भक्ति रूपी अमृत का पान कराने के उद्देश्य से इस धरा पर आया हूं। आप मेरे संकल्प की पूर्ति में बाधा न बनकर मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मानव समुदाय को जीवन सार्थक बनाने का रास्ता दिखा सकूं।
महर्षि वेदव्यास जी का आशीर्वाद पाकर ही शुकदेव जी ने अपना जीवन भक्ति भागीरथी प्रवाहित करने में व्यतीत किया। उन्होंने एक ऋषि के शाप से ग्रस्त महाराजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर जीवनमुक्त किया। वह आजीवन सांसारिक बंधनों से मानव को मुक्त होने की प्रेरणा देते रहे।