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जब देश बदलता है

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उम्र का हिसाब लगाएं, तो वह केवल 58 वर्ष तक पहुंचती है और सत्ता का हिसाब लगाएं, तो वह केवल 14 वर्षों की रही। लेकिन ह्यूगो राफेल शावेज फ्रियास आधुनिक इतिहास में और उस पर असर डालने में इससे कहीं बड़ी जगह घेरते हैं। शावेज गरीब शिक्षक माता-पिता की संतान थे और फौजी स्कूलों में पढ़ते हुए पाराट्रूपर इकाई के सदस्य बने, लेकिन उनका आसमान कुछ और ही था।
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फौजी काम करते हुए उन्होंने एक पोशीदा क्रांतिकारी संगठन बनाया, जिसने 1992 में फौजी बगावत की विफल कोशिश की। नतीजतन दो साल की जेल। जेल से बाहर आते ही उन्होंने सीधी लड़ाई का मन बनाया और एक राजनीतिक दल का गठन किया, जिसमें बाद में कई और दल शामिल हो गए और सबने मिलकर 1998 का चुनाव लड़ा। वही इस पार्टी के सब कुछ थे, प्रचारक, दार्शनिक और शिल्पकार भी!

वेनेजुएला की राजनीति में पहली बार कोई ऐसी आवाज सुनाई दी, जो गरीबों के अधिकारों की बात करती थी। जीत मिली और शावेज अधिकार की उस जगह पर पहुंचे, जिसकी उन्हें खोज थी। शावेज ने शुरुआत ही ऐसी की कि पूरे लैटिन अमेरिका का ध्यान उन्होंने खींचना शुरू किया।
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शावेज ने वेनेजुएला की ताकत उस तेल में पहचानी, जिसके बगैर आज की औद्योगिक सभ्यता की गाड़ी नहीं चलती है और यही तेल वेनेजुएला के पास बहुतायत में था। इसी तेल की कमाई को शावेज ने अपना हथियार बनाया। दूसरी तरफ फौजी अधिकारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने बेरहम अभियान चलाया। प्रशासनिक सुधार का सख्त दौर था वह, जब शावेज नौकरशाही की जड़ें हिला रहे थे।

शावेज ने तेल भंडार का राष्ट्रीयकरण कर दिया और उससे होने वाली कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा आम लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा में लगाना शुरू किया। इन दोनों क्षेत्रों में उन्होंने राष्ट्रीय निवेश बढ़ाकर 61 फीसदी तक पहुंचा दिया। परिणाम यह हुआ कि 1996 में जहां 71 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे, वे आज महज 21 फीसदी बचे हैं। उन्होंने तेल कंपनियों और बेहद अमीरों पर विशेष कर लगाए।

वेनेजुएला में जहां 90 फीसदी अनाज का आयात होता था, उसे शावेज ने 30 फीसदी पर ला दिया। आज वहां मात्र पांच फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। वेनेजुएला में 10,000 लोगों पर 58 डॉक्टर हैं, जो पहले मात्र 18 थे। 85 फीसदी बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं। वह खुद गरीबी भुगते इंसान थे, इसलिए अभाव की पीड़ा को पहचानते थे।

शावेज सम्मोहक वक्ता थे, भीड़ को उन्मत्त कर अपनी तरफ कर लेने का कौशल उनमें था। वह चीन के माओ-त्से-तुंग जैसे लोगों में थे, जो मानते थे कि बिल्ली का रंग कैसा है यह बात तब तक कोई मतलब नहीं रखती है, जब तक वह चूहे पकड़ती है। वह मानते थे कि राज्य के पास जो भी संसाधन हैं, उनका इस्तेमाल उनके हित में होना चाहिए, जो सबसे कमजोर-उपेक्षित हैं।

इसमें पूंजी की बढ़ोतरी का गणित वैसे ही अलग-अलग तरह से काम करता है, जैसे साधन-संपन्न वर्ग के हित में खर्च की गई पूंजी का हिसाब अलग तरह से लगाया जाता है। आप इसे न्याय की सामान्य समझ कहें या साम्यवादी दर्शन, यह आप पर निर्भर है। शावेज इसे, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध करने वाले नजरिये से देखते थे और अमेरिका विरोधी खेमे के स्तंभ बने।

शावेज इतना लोकतंत्र मानते थे कि वेनेजुएला में चुनाव होते थे और जो जीतता था, उसकी सरकार बनती थी। यह अलग बात है कि अपनी जीत पक्की करने के लिए शावेज वे सारे हथकंडे अपनाते थे, जो सत्ता की इस छीनाझपटी में जायज न भी माने जाते हों, लेकिन बर्दाश्त तो किए ही जाते हैं।

वर्ष 2002 में थोड़े वक्त के लिए शावेज सत्ता से बाहर भी हुए थे और अमेरिकी खेमे ने पूरा जोर भी लगाया था कि उनकी वापसी न हो, लेकिन वेनेजुएला के लोगों को अपने शावेज की कीमत मालूम थी और उन्होंने सड़कों पर उतरकर ऐसा आलम रचा था कि शावेज की वापसी हुई। वह वापस लौटे, तो उन सारी ताकतों को कुचलने में नहीं हिचके, जिन्होंने उन्हें सत्ताच्युत किया था। साम्यवादी दर्शन में तानाशाही की बू छिपी ही रहती है, शावेज भी इस सत्य के नए प्रमाण बने।

क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को शावेज में अपनी सूरत व सीरत नजर आई और दोनों ने एक-दूसरे को अपनाया। अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ कास्त्रो की लड़ाई को शावेज ने आगे बढ़ाया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे जोड़ी बहुत कम बनती व मिलती है। शावेज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बीमार और उम्र से लड़ते फिदेल कास्त्रो की आवाज बन गए।

इतना ही नहीं, क्यूबा की आर्थिक मदद में भी शावेज ने हाथ बढ़ाया। कास्त्रो ने जिसकी कई बार कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए, उसे भी शावेज ने संभव बनाया और कम्युनिटी ऑफ लैटिन अमेरिकन ऐंड कैरेबियन स्टेट्स नाम का संघ अस्तित्व में आया। अमेरिका ने कई अवसरों पर अपने इस धुर विरोधी को नाकाम करने की कोशिशें कीं, लेकिन न शावेज रुके, न उनका प्रभाव कम हुआ।

चौथा आम चुनाव लड़ते वक्त तो शावेज ने चुनाव प्रचार से भी खुद को अलग कर लिया। फिर भी नतीजा आया कि 23 में से 20 राज्यों में शावेज की पार्टी को जीत मिली। लेकिन इसी दौरान कैंसर ने उन्हें धर दबोचा, और फिर वे इसकी पकड़ से कभी छूट नहीं सके। शावेज के तरीकों से असहमति रखने वाले मेरी तरह के कई लोग बेझिझक मानते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ दुनिया में वह बुलंद आवाज विराम पा गई है, जो उनकी बात करती थी, जो अपनी बात नहीं कह पाते।
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