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किसानों का हिस्सा हड़पने वाले

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सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते प्रतिपक्ष के पास अब एक और गंभीर मामला है, जो किसानों से जुड़ा है। यह मामला 2008 का है। पिछले आम चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन यूपीए सरकार ने किसानों की कृषि कर्ज माफी का ऐलान किया था। इसके तहत 3.69 करोड़ छोटे व सीमांत किसानों के कर्ज माफ होने थे, जबकि 0.6 करोड़ अन्य किसानों के कर्ज में राहत देनी थी। इसके लिए करीब 52,000 करोड़ रुपये की राशि खर्च करने का हिसाब भी सरकारी कागजों में दर्ज हो गया।
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उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कुल रकम का बड़ा हिस्सा बांटा गया। यह समझाने की कोशिश की गई कि यूपीए सरकार किसानों की सबसे बड़ी हितैषी है। इसका असर दिखा भी। यह योजना यूपीए के लिए 'गेम चेंजर' साबित हुई। वर्ष 2009 के चुनाव में कांग्रेस को 2004 के मुकाबले करीब 40 फीसदी अतिरिक्त सीटें प्राप्त हुईं।

लेकिन हाल ही में संसद में पेश हुई कैग रिपोर्ट इस मामले की अलग तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट बताती है कि कर्ज माफी योजना के नाम पर जरूरतमंद किसानों को धोखा दिया गया। जांच में करीब 22 फीसदी अनियमितता के मामले सामने आए हैं। यानी हर पांचवें मामले में धांधली! जांच में कहीं 20 करोड़ रुपये, तो कहीं 164 करोड़ रुपये के गलत भुगतान की बात कही गई है।
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यह रकम पिछले घोटालों के मुकाबले सुनने में थोड़ी कम जरूर लग सकती है, लेकिन समझना होगा कि यह सिर्फ नमूना जांच है। कुल करीब 3.7 करोड़ खातों में से 90,000 की ही जांच की गई है, जो महज 0.25 फीसदी है। अगर सारे खातों की जांच की जाए, तो भ्रष्टाचार का यह मामला हजारों करोड़ में पहुंच सकता है।

राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला ब्लॉक आवंटन मामलों की तरह इस मामले में भी सामने आई कैग रिपोर्ट ने राजनीतिक गलियारे में हड़कंप-सा मचा दिया है। विपक्ष का आरोप है कि 34 लाख योग्य किसानों को इस योजना के तहत लाभ नहीं मिल सका, तो वहीं 24 लाख अयोग्य किसानों को इससे फायदा मिला। हालांकि जिन राज्यों में योग्य किसानों को योजना से बाहर किया गया, उनमें मध्य प्रदेश के करीब 90 फीसदी मामले हैं।

पूछा जाना चाहिए कि देश के बाकी हिस्सों की भांति वहां का प्रशासन और चुने हुए जनप्रतिनिधि भी 2008 से वर्ष 2012 तक क्या करते रहे? बहरहाल, कृषि मंत्री को इसमें कोई घोटाला नजर नहीं आता है। उनका तर्क है कि इतने छोटे नमूने की जांच के आधार पर किसी निष्कर्ष तक नहीं पंहुचा जा सकता है। गनीमत है, इस बार कैग की कार्यप्रणाली और कथित राजनीतिक निष्ठा से जुड़े आरोप सामने नहीं आए हैं। हालांकि प्रधानमंत्री दोषियों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिला रहे हैं, लेकिन नतीजा क्या आएगा, कहना मुश्किल है।   

ऐसे में बुनियादी सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में सरकारें कृषि क्षेत्र को लेकर गंभीर रही हैं? एक रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों के नाम पर दिए जाने वाले कर्ज का केवल छह फीसदी हिस्सा ही छोटे और सीमांत किसान को मिल पाया है। यानी लाखों-करोड़ों की रकम महज चार फीसदी की रियायती ब्याज दर पर बड़े खिलाड़ियों को दी जा रही है। जबकि छोटे और सीमांत किसानों की हिस्सेदारी कुल किसानों में 80 फीसदी से ज्यादा है।

ऐसी ही नीतिगत विफलताओं के चलते इस कृषि प्रधान मुल्क में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं। औसतन हर आधे घंटे में एक मौत! ध्यान रहे कि इस दौरान एनडीए शासन भी रहा है। अफसोस कि कर्ज माफी के ऐलान के बाद भी मौत का यह सिलसिला नहीं रुक सका।
 
इन सबके बीच कैग का खुलासा हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के दावों की पोल खोलता है। मौजूदा सरकार की साख और निगरानी तंत्र पर एक बार फिर सवाल खड़ा होता है। अलग से कृषि बजट और कृषि पर संसद के विशेष सत्र की जायज मांग के बीच अब समय आ चुका है कि 60 फीसदी से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र पर ठोस नीति बने और उसका ईमानदारी से पालन हो। हमें याद रखना होगा कि पंडित नेहरू ने कहा था कि सब मामलों में प्रतीक्षा की जा सकती है, लेकिन कृषि मामले में कतई नहीं।
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