भारत में आम चुनाव के शोर-शराबे के बीच चुनाव सुधार भी विमर्श के केंद्र में है। यह मुद्दा भारतीय न्यायतंत्र की सबसे प्रमुख चिंताओं में से एक है। वर्ष 2008 के बाद हुए संसदीय और विधानसभाओं के चुनावों में उम्मीदवारों के हलफनामों का अध्ययन करने वाले नेशनल इलेक्शन वॉच तथा एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के मुताबिक, 30 निवर्तमान सांसदों और 127 विधायकों ने माना था कि उनके खिलाफ चुनाव के दौरान कानूनों के उल्लंघन और भ्रष्टाचार से संबंधित मामले दर्ज हैं।
सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर यह कहता आया है कि प्रत्येक मतदाता को संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव लड़ रहे किसी भी प्रत्याशी के बारे में जानकारी पाने का मूलभूत अधिकार है। सर्वोच्च अदालत ने इस अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1) ‘ए’ का हिस्सा माना है। जहां मताधिकार मतदाता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है, वहीं, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के उपभाग 33 'ए' के तहत प्रत्याशी के बारे में पूरी जानकारी पाना भी एक मतदाता का हक है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के उपभाग 33 'ए' से जुड़े फॉर्म 26 पर कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभिन्न स्तरों पर अब भी बहस हो रही है, मगर दूसरी ओर न्यायालयों में चुनाव से जुड़े अपराधों के लंबित मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि से संबंधित जानकारी के खुलासे के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में 2002 में 33 ‘ए’ का प्रावधान किया गया था। मगर भारत सरकार बनाम एडीआर से संबंधित मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा मतदाता को प्रत्याशी की संपत्ति, देनदारियां और शैक्षणिक योग्यता की जानकारी देने संबंधी निर्देश को 33 ‘ए’ में नहीं जोड़ा गया। लिहाजा फॉर्म 26 के तहत मांगी गई नई अर्हताओं के उल्लंघन को रोका नहीं जा सकता। उपभाग 33 'ए' के तहत जानकारियों को सार्वजनिक करने से जुड़ी पहली अनिश्चितता तो निर्वाचन अधिकारी की शक्तियों से संबंधित है।
उपभाग 36 (6) के तहत निर्वाचन अधिकारी को नामांकन पत्र को मंजूर करने या खारिज करने का अधिकार है और नामांकन पत्र खारिज करते समय उसे लिखित में संक्षिप्त में कारण बताना होता है। हालांकि भारत सरकार बनाम पीयूसीएल के मामले में 13 मार्च, 2003 को आए फैसले में सर्वोच्च अदालत ने निर्वाचन अधिकारी के अधिकारों में कटौती की थी। अदालत ने कहा था, 'गलत जानकारी या तथ्यों को छिपाना, निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर नामांकन पत्र रद्द करने की वजह नहीं बन सकता। दरअसल चाहे निर्वाचन अधिकारी हो या कोर्ट, दोनों ही के लिए ऐसे मामलों में सत्यता की जांच करना बेहद मुश्किल होता है।'
सर्वोच्च अदालत के फैसले के आलोक में केंद्रीय चुनाव आयोग के 27 मार्च, 2003 को दिए गए आदेश के मुताबिक, हलफनामे में दी गई अधूरी या गलत जानकारी के चलते किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द नहीं किया जाएगा। इसमें निर्वाचन अधिकारी से यह अपेक्षा भी की गई कि वह भारतीय दंड विधान की धारा 177 और/या जनप्रतिनिधित्वि अधिनियम की धारा 125 'ए' के तहत ऐसे मामले संबंधित मजिस्ट्रेट को सुपुर्द करेगा। गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि इस व्यवस्था ने न सिर्फ निर्वाचन अधिकारी और चुनाव आयोग को कमजोर किया, बल्कि उपभाग 33 'ए' का मजाक बनाकर रख दिया है।
इसके बाद 13 सितंबर, 2013 को दिए अपने फैसले में सर्वोच्च अदालत ने व्यवस्था को थोड़ा लचीला बनाया। फैसले के मुताबिक, अगर निर्वाचन अधिकारी की चेतावनी के बाद भी कोई प्रत्याशी जरूरी जानकारी नहीं देता है, तो फिर उसका नामांकन रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन इस फैसले को लागू करने से पहले जरूरी है कि चुनाव आयोग के 27 मार्च, 2003 के सर्कुलर में संशोधन किया जाए। निर्वाचन अधिकारी को यह शक्ति देनी चाहिए कि अगर फॉर्म 26 के तहत आवश्यक शर्तें पूरी न हों, तो समुचित परीक्षण के बाद वह नामांकन रद्द कर सकता है।
चुनाव से जुड़े ज्यादातर अपराध गलत जानकारी देने या तथ्यों को छिपाने से संबंधित होते हैं। ऐसे मामले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125 'ए' के तहत आते हैं। निर्वाचन अधिकारी ऐसे मामलों को संबंधित अदालतों के सुपुर्द करता है। चूंकि आमतौर पर अदालतों में ऐसे मामले लंबे खिंचते हैं। ऐसे में, आरोपी प्रत्याशी भी चुनाव में हिस्सा लेता है। इससे मतदाताओं को भी सही फैसला लेने में दिक्कत आती है।
ऐसे में, पहली जरूरत यह है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले के मुताबिक निर्वाचन अधिकारी की शक्तियां फिर से बहाल की जाएं। इसके अलावा धारा 125 'ए' के तहत आने वाली शिकायतों के छह महीने के भीतर निपटारे की व्यवस्था हो। यह व्यवस्था अधिनियम की धारा 86 के प्रावधानों जैसी होनी चाहिए। इसमें कहा गया है, 'चुनाव से जुड़ी हर याचिका को उच्च न्यायालय में पेश किए जाने की तारीख्ा से छह महीने के भीतर निपटाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।' एक उपाय यह भी है कि चुनाव से जुड़ी याचिकाओं के निपटारे के लिए अलग से चुनाव अधिकरणों का गठन किया जाए। ध्यान रखना होगा कि अगर संविधान के प्रावधानों के तहत अदालतों ने सतर्कता बरतनी शुरू नहीं की, तो चुनाव से जुड़े अपराधों के ऐसे मामलों में वृद्धि होती ही जाएगी।
(लेखक भारतीय दूरसंचार नियामक के पूर्व अध्यक्ष तथा पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन के निदेशक हैं)