सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा से कहा, व्यापार को खेल मत बनाओ! सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीसीआई से कहा, खेल को व्यापार मत बनाओ! सर्वोच्च न्यायालय ने दलों से कहा, संसद को अपराधियों का कठघरा मत बनाओ! चुनाव आयोग ने सरकार से कहा, चुनाव पूरा होने तक गैस के दाम मत बढ़ाओ! इन चार निर्देशों ने इस देश की न्यायपालिका और चुनाव आयोग के प्रति, और कुल मिलाकर भारतीय लोकतंत्र की आंतरिक ताकत के प्रति जितना भरोसा बढ़ाया है, उसकी तुलना हाल की किसी घटना से नहीं की जा सकती। दुर्भाग्य की इस घड़ी में हम भाग्यशाली हैं कि यह सब देख रहे हैं। अदालत में प्रचलित भाषा में कहूं, मी लॉर्ड, हम आपके आभारी हैं।
बीसीसीआई के मामले में न्यायमूर्ति ए एन पटनायक और न्यायमूर्ति एफ एम इब्राहिम कलिफुल्लाह की बेंच ने जब कहा कि इस मामले से इतनी बदबू आ रही है कि श्रीनिवासन के इस्तीफे से पहले कोई बात की ही नहीं जा सकती, तब वे अपना गुस्सा भर नहीं प्रकट कर रहे थे, बल्कि देश की भावनाओं को शब्द दे रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित कर दिया कि उनका कहा 48 घंटों में अमल में आ जाए, 'आप इस्तीफा दें या हम आपको ऐसा आदेश देंगे!' किसी भी मामले की सुनवाई करने से पहले, सुनवाई लायक वातावरण बनाने की अदालत की यह चरम मुद्रा है।
हमें पूछना ही चाहिए कि जस्टिस मुकुल मुदगल की लिफाफे में बंद जिस रिपोर्ट का थोड़ा अंश पढ़कर, श्रीनिवासन के वकील की बोलती बंद हो गई थी, क्या उसमें जितने नाम हैं या हो सकते हैं, उन सबको इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए, ताकि जांच तेजी से शुरू हो जाए और अदालत को बार-बार लोगों से इस्तीफा देने को न कहना पड़े? जिस बदबू की बात अदालत ने की है, वह सबसे तेजी से बढ़ी है आईपीएल की शुरुआत के साथ। मतलब कुछ तो है आईपीएल में क्रिकेट के अलावा कि वह खिलाड़ी नहीं, सट्टेबाज पैदा करता है। दुनिया भर के चमकते सितारे इसमें जमा होते हैं और एक-एक कर निस्तेज होते जाते हैं; और फिर क्रिकेट में उनकी किताब बंद होने लगती है। यही सचिन के साथ हुआ, राहुल के साथ हुआ, सहवाग के साथ हुआ, पोटिंग के साथ हुआ, ब्रेट ली के साथ हुआ। क्रिस गेल का डंका बहुत बजता है आईपीएल में, लेकिन हम यह भी तो तौलें कि क्रिकेट के आला खिलाड़ियों की किस सूची में गेल को जगह मिलेगी? लेकिन अभी इस मुद्दे पर इतना ही। सामान्यत: लोग अब इसे खेल नहीं, जुआ ही समझने लगे हैं, और इसलिए हर खिलाड़ी की उपलब्धि या विफलता एक नए अविश्वास को जन्म देती है। क्रिकेट का ऐसा पतन हुआ है कि इसकी और राजनेताओं की विश्वसनीयता एक ही पलड़े पर रखी जाने लगी है। यह खुला रहस्य बन गया है कि यहां बाजार ही गेंद फेंकता है और बाजार ही बल्ला भी चलाता है; और बाजार की आत्मा नहीं होती, पैसा उसका भगवान होता है।
जब अदालत का यह आदेश आया, तब हमारे सितारे खिलाड़ी बांग्लादेश में 20 ओवरों का वर्ल्ड कप खेल रहे थे। अपने होटल में आराम फरमाते खिलाड़ियों पर कैसी प्रतिक्रिया हुई? बताया गया कि खिलाड़यों ने इसे बहुत गंभीरता से लिया- पांच सितारा होटल के पूल किनारे रवींद्र जडेजा अपनी आंखें, मोहित शर्मा अपने कान और अजिंक्य रहाणे अपना मुंह ढांपे बैठे थे। ये तीनों गांधीजी के नाम से प्रचलित, लेकिन संदर्भ से काट कर प्रचारित उन तीन बंदरों का संकेत दे रहे थे, जो न बुरा देखते हैं, न सुनते हैं और न बोलते हैं! ये लोग अगर अपनी लाचारगी का ऐसा संकेत दे रहे थे, तब तो बात दूर तलक जाएगी, अन्यथा श्रीनिवासन की अध्यक्षता वाले क्रिकेट आयोग ने सच में भारतीय क्रिकेट की ऐसी ही हालत बना रखी है।