प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले छह महीनों में नरेंद्र मोदी ने आठ बार विदेश यात्रा की है। कोई इन विदेश यात्राओं को रोड-शो के रूप में देख सकता है, जिसका उद्देश्य अपने और अपनी सरकार का प्रदर्शन करना और आर्थिक व रणनीतिक, दोनों स्तरों पर व्यापार के लिए द्वार खोलकर एक नए भारत का वायदा पूरा करना है।
प्रधानमंत्री की ज्यादातर यात्राएं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हुईं। इनमें से कई बहुपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान हुई हैं। इस दौरान उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं का स्वागत भी किया। अब मोदी की विदेश नीति की रूपरेखा हमारे सामने है, जिससे दो बातें साफ होती हैं- पहला, देश में तेजी से आर्थिक विकास को गति देने के लिए निवेश एवं प्रौद्योगिकी को आकर्षित करना और दूसरा, अपने पड़ोस एवं व्यापक एशियाई क्षेत्र में भारत की सामरिक हैसियत का निर्माण करना। इस तरह से मोदी अपने उन मतदाताओं की अपेक्षाओं को पूरा कर कर रहे हैं, जिन्होंने उन्हें इस उम्मीद में वोट दिया था कि उनकी नीतियां उनके जीवन में बदलाव लाएंगी; साथ ही, जो चाहते थे कि विदेश व सुरक्षा नीति से संबंधित मुद्दों पर भारत मजबूत रुख अपनाए।
हाव-भाव के हिसाब से देखें, तो मोदी की सबसे सफल यात्रा जापान की थी। हालांकि मोदी टोक्यो के साथ परमाणु समझौता करने में सफल नहीं रहे, पर यह भरोसा लेकर आए कि अगले पांच वर्षों में वह भारत में 35 अरब डॉलर का निवेश करेगा। मोदी के राजनीतिक कौशल का सुबूत उनका अमेरिकी दौरा रहा। मैडिसन स्क्वैयर गार्डन की ऐतिहासिक रैली को व्यापक तौर पर सराहा गया और उसने बराक ओबामा को यह संदेश दिया कि एक अनूठा विश्व-नेता उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
पड़ोस में भी मोदी ने नेपाल के साथ दोस्ताना रिश्ता बढ़ाया है, जिसे खुश करना आसान नहीं था। पिछले 17 वर्षों में वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने नेपाल के साथ रिश्ते में गर्मजोशी लाई। अपनी दो यात्राओं के दौरान उन्होंने नेपालियों को 1950 में हुई भारत-नेपाल संधि पर फिर से विचार करने का प्रस्ताव देकर यह संदेश दिया है कि भारत नेपाल के साथ अपने रिश्ते को नई धरातल पर ले जाने के लिए तैयार है।
मोदी आगामी गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि के रूप में बराक ओबामा का स्वागत करेंगे। आगामी वर्ष की पहली छमाही में वह श्रीलंका, ब्रिटेन, बांग्लादेश, जर्मनी और रूस का दौरा करेंगे। मोदी की अब तक की विदेश यात्रा और आगामी यात्राओं के कार्यक्रम पर नजर डालें, तो साफ है कि उनके मन में दो लक्ष्य हैं। जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से जहां वह व्यापार और निवेश की उम्मीद रखते हैं, वहीं सार्क देश के पड़ोसियों और म्यांमार के साथ बेहतर संबंध रखना चाहते हैं। नेपाल की यात्रा वह कर ही चुके हैं। और बांग्लादेश की यात्रा वह तब करेंगे, जब उसके साथ भूमि-सीमा संबंधी समझौता होगा। उनका उद्देश्य पड़ोसी देशों के साथ रणनीतिक रिश्ता कायम करना है। यही वह क्षेत्र है, जहां भारत का चीन से मुकाबला है। श्रीलंका भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि वहां चीन की गतिविधियों ने भारत को बेचैन कर दिया है। हमारे साथ सामान्य रिश्ते रखने से पाकिस्तान के इन्कार करने से हमारा पड़ोसी राजनय विफल हो गया है।
चीन मोदी की विदेश यात्रा का एक बड़ा विषय बना हुआ है। दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के मन में भारत की प्रधानता बहाल करने के लिए मोदी ने पड़ोसी देशों की यात्राएं की है, जबकि जापान, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया का दौरा शक्ति संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया, जो एशिया में चीन की बढ़ती ताकत को रोकने में मददगार होगा। जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में दिए गए भाषणों और संयुक्त बयानों में चीन के संबंध में सुरक्षा एक महत्वपूर्ण तत्व था। इसका सुबूत जापान में दिए उनके इस बयान से मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा कि समुद्री सुरक्षा, समुद्री क्षेत्रों में पोतों एवं विमानों की निर्बाध आवाजाही, नागरिक उड्डयन सुरक्षा, निर्बाध वैध व्यवसाय एवं अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान दोनों देशों की प्रतिबद्धता है। ये सारे ऐसे मुद्दे हैं, जो चीन और जापान के रिश्तों में प्रमुख रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया से भी मोदी ने समुद्री सुरक्षा बनाए रखने के लिए सहयोग मांगा। माना जाता है कि ये दोनों देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। इसका मतलब यह भी है कि भारत-अमेरिका के बीच नौसैनिक सहयोग बढ़ सकता है, हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है। नए रक्षा मंत्री के तौर पर एस्टन कार्टर की नियुक्ति अच्छा संकेत है, क्योंकि रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह भारत-अमेरिकी सहयोग बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हालांकि इसकी संभावना नहीं है कि भारत चीन-विरोधी किसी गठजोड़ में शामिल होगा। मोदी ने चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता और सहयोग की नीति का संकेत दिया है। इसलिए निवेश और चीन को रोकने के लिए रणनीतिक साझेदार ढूंढने के बावजूद, वह आर्थिक मामलों में बीजिंग के साथ जाना पसंद करेंगे और भारत ब्रिक्स बैंक और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बैंक (एआईआईबी) की सदस्यता ग्रहण करेगा। ये दोनों बैंक चीन की पहल हैं, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर पश्चिमी देशों और जापान की पकड़ को कमजोर करना है। भारत गंभीरतापूर्वक दिल्ली और चेन्नई के बीच हाई स्पीड ट्रेन लिंक के चीनी प्रस्ताव और अन्य चीनी निवेश योजनाओं की तलाश कर रहा है।
मोदी की विदेश यात्राओं का पहला चरण खत्म हो गया है। दुनिया उनसे प्रभावित है, लेकिन कोलाहल और चकाचौंध से भरपूर मोदी के रोड-शो के आधार पर ही निवेश की उम्मीद नहीं की जा सकती। वह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत में कारोबार को आसान बनाने के लिए वह कौन-कौन से फैसले लेंगे। यह एक प्रक्रिया है, जो संसद एवं सत्ता के गलियारों में विचाराधीन है। कुछ फैसले तो पहले ही लिए जा चुके हैं, लेकिन निवेशक भारत में निवेश करने से पहले यही देखेंगे कि जमीनी स्तर पर उसे कितना लागू किया गया है।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं)