आजाद भारत में पहली बार बिना किसी नेतृत्व, कमान और लगाम के हुई युवा क्रांति ने सिद्ध कर दिया है कि देश में आजादी को अब सहेजने-संवारने के लिए आमजन जागरूक हो चुका है। युवाओं की यह गूंज कंपकंपाती जनवरी में सत्ता के गलियारों को गर्म करती रही।
इससे जनवरी महीने की प्रासंगिकता का एक अध्याय और जुड़ गया। इसी माह में ही गणतंत्र की स्थापना हुई है और स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। और इसी माह की 22 तारीख को समाजवादी आंदोलन के नायक रहे 'छोटे लोहिया' जनेश्वर मिश्र ने भी हमेशा के लिए आंखें मूंद ली थीं। देश को गांधीजी ने स्वतंत्रता दिलाई, जबकि छोटे लोहिया ने इसे महफूज रखना सिखाया।
जनेश्वर मिश्र के संघर्षों की शुरुआत इलाहाबाद की छात्र राजनीति से हुई थी। यहीं उन्हें समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कोठियों और चौड़ी सड़कों के शहर इलाहाबाद की आबोहवा और तासीर का जनेश्वर मिश्र पर गहरा प्रभाव था।
वह अक्सर कहते थे कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और समाजवादी आंदोलन का केंद्र रहे प्रयाग तट पर गंगा-यमुना का संगम होता है, टकराव नहीं। यहीं यमुना समर्पित हो गंगा को आगे जाने का रास्ता देती है। इन दो नदियों में सिर्फ पानी नहीं बहता, देश की संस्कृति का बहाव होता है। यही कारण है कि देश की तहजीब को गंगा-जमुनी तहजीब कहा जाता है, जिसका संगम इस प्रयाग तट पर होता है और जो समय-समय पर देश को दिशा देने का कार्य करता रहा है।
जनेश्वरजी प्राकृतिक रूप से समाजवादी थे। कहते हैं, विचार बौद्धिकता का विषय होता है, लेकिन भावनाएं बाल्यकाल से ही विकसित होती हैं। घर-परिवार एवं आसपास के परिवेश के साथ-साथ जीवन-संघर्ष की रीति-नीति इसमें सहायक होती है। ये तत्व उनके अंदर ताउम्र विद्यमान रहे।
वह कहते थे कि इस देश को समझने के लिए गांवों को जानना जरूरी है। इसलिए वह देश की सबसे बड़ी पंचायत में ग्रामीण जीवन की समस्यों को रखते हुए आजीवन लोक वेश-भूषा, लोकभाषा व लोकभोजन का पालन करते रहे। गांवों और गरीबों को लेकर वह हमेशा उद्वेलित हो जाते थे। कहते थे कि लोग चकाचौंध से प्रभावित होकर शहर की तरफ भाग रहे है। यह ठीक है, पर गांवों को नकारा नहीं जा सकता है। वह मानते थे कि शहर का विकास हो, पर गांवों का विकास भी जरूरी है।
समाजवाद को लेकर जनेश्वरजी के विचार बेहद स्पष्ट थे। वह कहते थे कि समाजवाद सिर्फ विचार या सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक आचरण है। उसे जीवन में उतारकर ही समाज, देश, आदमी एवं उसकी समास्याओं को देखा जा सकता है। उनका मानना था कि समाजवाद वही है, जो किसी पर अन्याय नहीं होने दे, बल्कि कमजोर के साथ खड़े होकर उसे मजबूत बनाए।
शोषणमुक्त समाज के लिए संघर्ष करना ही समाजवाद है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के तमाम समस्याओं पर भी छोटे लोहिया बेबाक तरीके से अपनी बातें रखते थे। संसद पटल पर सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा उठाकर उन्होंने इस विषय की गंभीरता से सदन को जोड़ने का प्रयास किया। इसके अलावा खेती-किसानी, महिला सशक्तिकरण, कामगारों के अधिकारों को लेकर भी वह लगातार मुखर रहे।
आज देश चौतरफा समस्याओं से जूझ रहा है। बुनियादी जरूरतों का व्यावसायीकरण हो रहा है। इससे राजनीति भी अछूती नहीं रही। ऐसे में आम आदमी अपनी मूलभूत आवश्कताओं से वंचित होता जा रहा है। जनेश्वर मिश्र इसके खिलाफ हमेशा संघर्ष करते रहे। उनका कहना था कि राजनीति हमेशा गरीब, मजलूम और बेसहारा लोगों को उनका अधिकार दिलाने के लिए होनी चाहिए, न कि अन्य चीजों के लिए।
सत्ता से सिर्फ पहचान होती है, लेकिन संघर्ष से पहचान बनती है। संघर्ष की पहचान व्यक्ति को सदैव जिंदा रखती है। उनके ये विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे और इन्हीं के सहारे मजहब और जाति से ऊपर उठकर समाज के अंतिम आदमी के हक की बात हो सकेगी, तभी शोषणमुक्त, भयमुक्त व न्याययुक्त खुशहाल समाज की स्थपना संभव होगी। जनेश्वर मिश्र जैसे लोकनायकों को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।