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जो काम करे उसे वोट दें

Fri, 18 Apr 2014 07:28 PM IST
मधुर भंडारकर
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समय करवट बदल रहा है। राजनीति करवट बदल रही है। हर संवेदनशील आदमी इसे महसूस कर रहा है। लेकिन इससे भी अच्छी बात यह है कि अब कोई घरों में बैठकर क्रांति का इंतजार नहीं करना चाहता। लोग खुद परिवर्तन का हिस्सा बन रहे हैं। आप कह सकते हैं कि समाज उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। पिछले दो-तीन वर्षों में जिस तरह से देश के हर कोने में आंदोलन हुए, वे इसके गवाह हैं। इस बदलाव का श्रेय जनता की उस इच्छाशक्ति को जाता है, जिसमें वह पुरानी बातों और जड़ व्यवस्था को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इस सामाजिक क्रांति में सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है। यह मीडिया केवल देश में नहीं, दुनिया में परिवर्तन का कारण बन रहा है।
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वर्तमान में हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें विकास सबसे अहम मुद्दा है। बीते साठ-पैंसठ साल में देश का जितना विकास होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ता। इसके पीछे भ्रष्टाचार प्रमुख कारण है। लेकिन अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है। भ्रष्टाचार और भ्रष्ट आचरण करने वाले नेता एक समय जब सिनेमा के पर्दे पर दिखते थे, तो कौतुक का विषय होते थे, परंतु धीरे-धीरे मीडिया की क्रांति ने इन्हें ऐसे उजागर किया कि वे रोज की खबरों का अहम हिस्सा बन गए। परिणाम यह निकला कि जो जनता भविष्य में किसी परिवर्तन की उम्मीद में चुपचाप बैठी थी, उसका गुस्सा फूट पड़ा।

बर्दाश्त की सारी हदें टूट चुकी हैं। हमें सत्ता और व्यवस्था, दोनों जगहों पर ईमानदार लोगों की जरूरत है, जो सचमुच जनता की तकलीफों को समझें और उनके हित में काम करें। हमें विकास पुरुष की जरूरत है। वास्तव में आज हमारे वोट देने का आधार यही होना चाहिए कि कौन हमारी स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। जो आपके लिए काम करे, उसे ही वोट देना चाहिए।
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जिन लोगों को लगता है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन है और सिनेमा की दुनिया के लोगों के कोई विचार नहीं होते, उन्हें जानना चाहिए कि वक्त बदल गया है। सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है। कलाकार सिर्फ कठपुतलियां नहीं हैं। यही कारण है कि अब फिल्म इंडस्ट्री से भी आपको परिवर्तन की आवाजें सुनाई देती हैं। यहां लोग मूक दर्शक या तटस्थ नहीं हैं। यह बात अलग है कि कभी-कभी उनके स्वर एक-दूसरे से विपरीत मालूम पड़ते हैं। इसके बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बॉलीवुड का चरित्र धर्मनिरपेक्ष है। फिल्म इंडस्ट्री हो या हिंदी सिनेमा, दोनों का चेहरा बहुत उदार है। उनका अपना धर्म है, जिसमें सारे धर्मों की बराबर जगह है। फिल्मी दुनिया हमें एकजुट होने के लिए प्रेरित करती है। आजादी के पहले से सिनेमा ने उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

दुनिया की किसी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा नहीं हुआ होगा कि कलाकारों ने अपने धर्म से आगे बढ़कर नाम बदले और कामयाब हुए। नई पीढ़ी के लोग शायद दिलीप कुमार, मधुबाला और मीना कुमारी के वास्तविक नाम न बता सकें। वहीं आज के ‘खान’ सितारों को प्यार करते हुए लोग यह नहीं देखते कि उनका धर्म क्या है? फिल्मों ने हमारे समाज को धर्मनिरपेक्ष बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैसे यह दुखद है कि फिल्मी कलाकारों की लोकप्रियता उनकी सितारा हैसियत तक सीमित रही। सुनील दत्त, विनोद खन्ना या शत्रुघ्न सिन्हा जैसे अभिनेताओं को छोड़ दें, तो अपने राजनीतिक प्रयासों में अधिकतर कलाकारों को नाकामी मिली। वे उस तरह से समाज में जगह नहीं बना सके, जैसा दक्षिण भारतीय सिनेमा में हुआ, जहां कलाकारों को राजनेताओं के रूप में भी जबर्दस्त कामयाबी मिली।

मुझे लगता है कि अब शायद सिनेमा के लोगों के दिन फिरने वाले हैं। जिस तरह से फिल्मी दुनिया के लोग राजनीति को लेकर मुखर हो रहे हैं, अपने विचार खुलकर प्रकट कर रहे हैं, इससे साफ है कि परिवर्तन की इच्छा उनके भीतर भी जोर मार रही है। वे राजनीति में किसी पिछले दरवाजे से प्रवेश नहीं करना चाहते। उनके सामाजिक सरोकार आज बहुत स्पष्ट हैं। जिन्हें आप उनकी फिल्मों में तक साफ देख सकते हैं। ये कलाकार भी आम भारतीय नागरिक हैं और अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति जागरूक हैं। वे भी यथास्थिति में बदलाव देखना चाहते हैं।

फिल्में बनाते हुए मुझे डेढ़ दशक से अधिक हो चुका है। व्यक्तिगत रूप से मैंने भी हमेशा सार्थक, सच्चा और सरोकारों से जुड़ा सिनेमा बनाने का प्रयास किया है। तीन राष्ट्रीय पुरस्कार इसका प्रमाण हैं। चांदनी बार, सत्ता, पेज थ्री, ट्रैफिक सिग्नल, फैशन और हीरोइन जैसी फिल्में न केवल समीक्षकों द्वारा सराही गई, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी कामयाब रहीं। चाहे मीडिया की दुनिया हो या फिर राजनीति और कारपोरेट का कल्चर, हर जगह आज दो चेहरे हैं। एक दुनिया के सामने और दूसरा दुनिया से छिपा हुआ। मेरी कोशिश हमेशा छिपे हुए चेहरों को उजागर करने की रही है। ऐसी कोशिशों को दर्शकों ने हमेशा बहुत प्यार दिया है। मुझे लगता है कि अब लोगों ने खुद से प्यार करना भी सीख लिया है, इसीलिए वे अपने आसपास की दशा और दिशा बदलना चाहते हैं। ठहरे हुए पानी में अब कोई डुबकी लगाना नहीं चाहता। जड़ व्यवस्था का पानी खराब हो चुका है। इससे गंध उठ रही है। इसे हर हाल में बदलने की जरूरत है। यह केवल हमारे आज की बेहतरी के लिए नहीं है, बल्कि आने वाले कल के लिए भी अनिवार्य कदम है।
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