भाजपा को 2004 में अपनी जीत का इस कदर भरोसा था कि उसने लोकसभा को तयशुदा समय से पहले भंग कर नए चुनाव कराने का फैसला किया। मगर इसमें मिली हार ने न सिर्फ उसे, बल्कि सभी को चौंका दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो इंडिया शाइनिंग का भाजपा का नारा ही उसकी हार की वजह बन गया। दरअसल यह नारा केवल अमीरों पर लागू होता था, गरीब तबका इससे खुद को नहीं जोड़ पाया।
मेरा मानना है कि तत्कालीन सरकार का आर्थिक मोर्चे पर प्रदर्शन पिछली सरकार की तुलना में खराब रहा था, और इसी का उसे खामियाजा भुगतना पड़ा। 2004 में सत्ता में आने वाली यूपीए सरकार ने गरीबों के कल्याण के लिए कई कार्यक्रमों और अनुदानों का सिलसिला शुरू किया। इसी का फायदा उसे 2009 के चुनावों में बड़ी जीत के साथ मिला। मगर इसकी एक बड़ी वजह यूपीए एक के शासन में होने वाली तेज विकास दर भी थी। यूपीए 2 ने इस तथ्य की अनदेखी की और भ्रष्टाचार व कुशासन से बेखबर रहते हुए सामाजिक कल्याण की नीतियों पर फोकस किया। इसी वजह से इस दौरान आर्थिक विकास दर धीमी रही। और इसका खामियाजा कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
चुनाव तो हर पांच साल में होते हैं, ऐसे में सरकार के कामकाज के आकलन का क्या तरीका हो सकता है? एक आम औरत के नजरिये से देखें, तो किसी सरकार के कामकाज के आकलन का सबसे आसान तरीका यह है कि वह यह देखे कि पांच साल में वह, उसके परिवार, मित्रों, पड़ोसियों और पहचान वालों पर क्या गुजरी है, और इसकी तुलना वह पिछली सरकार के पांच साल से करे। अगर उसे वर्तमान सरकार कमतर लगती है, तो सत्तारूढ़ दल के वोटों में कटौती तय है।
आर्थिक वृद्धि, सार्वजनिक सेवाएं (बिजली, पानी, सड़क) और सब्सिडी— इन तीन आर्थिक सूचकों पर ही आम मतदाता की नजर रहती है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि न केवल औसत मतदाता के रहन-सहन में बदलाव को, बल्कि सामान्य आदमी के लिए उपलब्ध रोजगार या स्व रोजगार के अवसरों को भी दर्शाती है। सड़क, पीने का पानी, सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बुनियादी शिक्षा जैसी सेवाओं की गुणवत्ता और प्रसार के स्तर का असर मतदाता पर पड़ता है। और अंततः सत्तारूढ़ दल का वोट प्रतिशत भी इससे अछूता नहीं रह पाता। इसी तरह सब्सिडी और कर व्यवस्था का असर भी वोटों की शक्ल में देखा जा सकता है।
दरअसल कागजी कानून, घोषणाएं और बजटीय आवंटन के आम औरत के लिए कोई मायने नहीं होते। उसके लिए जमीनी स्तर पर सेवाओं की उपलब्धता और उससे मिलने वाले संतोष का ही महत्व है। सेवाओं की गुणवत्ता के निर्धारण में आम औरत के लिए सुशासन, भ्रष्टाचार और महिला उत्पीड़न सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
प्रति व्यक्ति जीडीपी की बढ़ोतरी निचले तबके के औसत मतदाता के लिए आर्थिक खुशहाली या बदहाली का सूचक है। इसलिए अगर प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढोतरी या कमी होती है, तो इसका असर सत्तारूढ़ दल के वोट प्रतिशत पर पड़ता है।
1999-2000 और 2004-05 के बीच एनडीए सरकार का दौर था। इस कार्यकाल के दौरान औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी में 4.1 फीसदी वार्षिक की दर से बढ़ोतरी हुई, जबकि इससे पहले के पांच वर्षों में यह 4.5 फीसदी थी। शायद यही वजह थी कि ज्यादा जागरूक शहरी मतदाता शाइनिंग इंडिया के नारे से प्रभावित नहीं हुआ, नतीजतन 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 23.8 से घटकर 22.2 फीसदी रह गया। इसके अलावा गठबंधन सहयोगियों की घटती संख्या का भी नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा था।
2004-05 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनी। यूपीए का पहला कार्यकाल 2008-09 तक चला। यूपीए एक के दौरान प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोतरी की वार्षिक दर 2.7 फीसदी से 6.8 फीसदी तक पहुंच गई। प्रति व्यक्ति आय की दर में 69 फीसदी के इजाफे की बदौलत ही 2009 के आम चुनाव में न केवल कांग्रेस पार्टी के वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ, बल्कि यूपीए दोबारा सत्ता में भी आई। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 7.9 प्रतिशत बढ़कर 28.6 प्रतिशत हो गया। जबकि 2004 में यह 26.5 फीसदी था। हां, इसके शहरी केंद्रीकरण की वजह से सीटों की संख्या के अनुपात में जरूर ऊंची वृद्धि देखने को मिली।
मगर यूपीए 2 के कार्यकाल के दौरान प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि का औसत 5.4 फीसदी वार्षिक रहने की उम्मीद है। यूपीए 1 की तुलना में यह आंकड़ा कम बैठता है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 2004-05 के चुनावों में भाजपा को मिले वोटों से ज्यादा हो सकता है। मगर 2004 में कांग्रेस को मिले वोटों से इसके कम ही होने की आशंका है। यह कांग्रेस के लिए वोट प्रतिशत में कम से कम 6.5 फीसदी की गिरावट को दिखाता है।
2004-05से 2008-09 की तुलना में 2009-10 से 2013-14 के दौरान प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी की दर में होने वाली कमी का नुकसान कांग्रेस को 16वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनावों में उठाना पड़ेगा। इसके अलावा केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार और कुशासन जैसे मुद्दों का असर मतदाताओं के व्यवहार पर पड़ेगा। वजह यह है कि सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता का सीधा जुड़ाव मतदाता की जिंदगी से होता है। कुल मिलाकर कांग्रेस के वोट प्रतिशत में गिरावट तय है।