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कानून-व्यवस्था से खेल और नेतृत्व पर उठते सवाल

तवलीन सिंह Published by: तवलीन सिंह Updated Sun, 25 Aug 2019 07:02 PM IST
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तवलीन सिंह - फोटो : a

नेताओं ने इतनी बार निराश किया है कि हम उनसे कम आशा करते हैं। पर क्या उनसे नेतृत्व की भी उम्मीद करना बंद करना पड़ेगा? जिस दिन से हमारे पूर्व गृह मंत्री ने अपने ही पूर्व अफसरों से भागने का प्रयास किया, यह सवाल मैंने स्वयं से बार-बार पूछा है। ऐसा उन्होंने इतने नाटकीय ढंग से किया कि हर समाचार चैनल को उनकी पल-पल की गतिविधियों को दिखाना पड़ा। देखने वालों में मैं भी थी। नाटक शुरू होने से अंत तक टीवी के सामने चिपकी रही, जैसे ‘मिर्जापुर’ जैसा सीरीयल देख रही हूं।



नेतृत्व का सवाल बार-बार आया ध्यान में। चिदंबरम साहब कोई मामूली राजनेता नहीं हैं। कई बार भारत के वित्त मंत्री और गृह मंत्री रहे हैं। उन्हें देश से इतना सम्मान मिला है कि संकट के समय इनको संकट का समाधान ढूंढने लाया गया है। एक उदाहरण है 26/11 का, जब तत्कालीन गृह मंत्री को हटाकर उन्हें गृह मंत्री बनाया गया था। दूसरा उदाहरण है, सोनिया-मनमोहन सरकार के दूसरे दौर से, जब प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन भेजकर उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया था। उस समय प्रणब बाबू ने ऐसा टैक्स लगाया था कि विदेशी निवेशक भारत छोड़कर भाग रहे थे। व्यक्तिगत तौर पर मैं चिदंबरम साहब को वर्षों से जानती हूं। सो जब उनकी अग्रिम जमानत दिल्ली उच्च न्यायालय ने रद्द कर दी और उनके गिरफ्तार होने की संभावनाएं दिखने लगीं, तो मुझे विश्वास था कि वह बाइज्जत स्वयं को उन संस्थाओं के हवाले कर देंगे, जो उनसे पूछताछ करना चाहती थीं। आश्चर्य तब हुआ, जब ऐसा करने के बदले वह एक अपराधी की तरह फरार हुए, सो उनकी गिरफ्तारी एक टीवी धारावाहिक का रूप धारण कर गई। उनके निवास के सामने टीवी पत्रकार देर रात तक पल-पल की खबरें देने के लिए टिके रहे। अगले दिन सुबह से फिर नाटक शुरू हुआ। शाम को चिदंबरम कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय में अपने वकीलों के साथ प्रकट हुए। इस मंच से उन्होंने भाषण दिया, जिसमें कहा कि लोकतंत्र का आधार है स्वतंत्रता और उनको अगर जीवन और स्वतंत्रता के बीच चुनना पड़े, तो वह स्वतंत्रता को चुनेंगे।


बेशक उनका भाषण अच्छा था, लेकिन क्या चिदंबरम नहीं जानते कि इस देश का आम नागरिक अदालतों के दरवाजे तक नहीं खट-खटा सकता, क्योंकि न्याय मिलना न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि अपने देश में उनके लिए नामुमकिन है, जिनके पास वकील रखने की भी क्षमता नहीं होती। गरीबों का क्या, अधिकतर मध्यमवर्गीय लोग भी न्याय से वंचित रहते हैं। जो हिम्मत करके न्याय मांगने न्यायालय तक जाते हैं, अक्सर आधे रास्ते में ही थक जाते हैं। अपने देश में न्याय की यात्रा लंबी और कठिन है। उस न्याय प्रणाली की पेचीदगियां चिदंबरम साहब अच्छी तरह जानते हैं। जिन संस्थाओं को उन्होंने चकमा देने की कोशिश की थी, उन्हें भी वह अच्छी तरह जानते हैं और यह भी जानते हैं कि उन्होंने ऐसा करके आम नागरिकों के सामने नेतृत्व का ऐसा उदाहरण रखा है, जो शर्मनाक है। जिस कानून व्यवस्था की उन्होंने जिंदगी भर सेवा की है, उस पर अगर उन्हें विश्वास नहीं है, तो आम नागरिकों को कैसे हो सकता है?


जब मीडिया में किसी को दोषी ठहराने का प्रयास होता है, तो निजी तौर पर मुझे सख्त तकलीफ होती है। किसी को दोषी ठहराना या बेगुनाह साबित करना, हमारा काम नहीं है। यह काम सिर्फ न्यायालयों का होना चाहिए। लेकिन अगर पिछले सप्ताह मीडिया में चिदंबरम साहब पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप साबित करने का प्रयास हुआ, तो दोष उनका है। चिदंबरम साहब, अगर आपने नेतृत्व दिखाया होता, तो आपके इस बुरे दौर में शायद मीडिया आपके साथ होता।


 

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