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मुद्दा : पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए ...आयोग के गठन से रोजगारपरक समस्याओं के समाधान की उम्मीद

आर विक्रम सिंह
Updated Sat, 24 Feb 2024 09:23 AM IST

सार

लगभग प्रत्येक राज्य की सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए तृतीय श्रेणी में पांच फीसदी से 15 फीसदी तक आरक्षण की व्यवस्था है। उत्तर प्रदेश में यह आरक्षण पांच फीसदी है। जातीय एजेंडे की सरकारों ने उत्तर प्रदेश की सिविल सेवा में पूर्व सैनिकों के आरक्षण को जातीय कोटे में बांट दिया है।
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सैनिक


अब तो तीन वर्ष बाद अग्निवीर भी सैन्य सेवा से वापस आने लगेंगे। पिछले हफ्ते संसदीय स्टैंडिंग कमेटी ने सीमा पर बलिदान हुए अग्निवीरों के लिए सरकार को सुझाव दिया है कि उनके परिवार को नियमित सैनिकों की तरह पेंशन फंड दी जाए। उन्हें भी देश/प्रदेश की सेवाओं में समायोजन के आश्वासन दिए गए हैं। यदि यह व्यवस्था अभी से नहीं बनाई गई, तो अचानक सारी व्यवस्थाएं करने में मुश्किलें आ सकती हैं।


लगभग प्रत्येक राज्य की सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए तृतीय श्रेणी में पांच फीसदी से 15 फीसदी तक आरक्षण की व्यवस्था है। उत्तर प्रदेश में यह आरक्षण पांच फीसदी है। जातीय एजेंडे की सरकारों ने उत्तर प्रदेश की सिविल सेवा में पूर्व सैनिकों के आरक्षण को जातीय कोटे में बांट दिया है। अब तक जो सैनिक बिना जातीय आरक्षण के सेना में रहे, उन्हें अब राज्य सरकार की सेवाओं में समायोजन के लिए अपनी जाति बतानी पड़ रही है, जाति-प्रमाणपत्र लेना पड़ रहा है। इन संशोधनों के चलते पहले से चला आ रहा चयन बाधित हो गया है। दूसरी ओर, व्यवस्थागत कमियों के कारण तृतीय श्रेणी में आरक्षण कोटे का पूरी तरह भरा जाना संभव नहीं हो पाता। हालांकि योगी सरकार में स्थिति पहले से कहीं बेहतर हुई है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर समरूप नीतिगत दखल की आवश्यकता है।


उधर हथियारों के लाइसेंस मिलने में भी अलग-अलग राज्यों में समस्याएं हैं। नतीजतन सुरक्षा गार्ड की नौकरी मिलने में भी मुश्किलें हो जाती हैं। प्रत्येक पूर्व सैनिक को पेंशन फंड की तरह एक शस्त्र के लाइसेंस का अधिकार भी सेवानिवृत्ति लाभ की तरह दिया जाना चाहिए। पूर्व सैनिकों के पास शस्त्र होने से उनके गांव या मुहल्लों, जहां वे रहते हैं, के नागरिकों को सुरक्षा का आभास होता है।


पूर्व सैनिक प्रशिक्षित मानव शक्ति हैं, जो सिविल में पुलिस, सशस्त्र पुलिस, होमगार्ड, वन विभाग, वायरलेस ऑपरेशन, अग्निशमन, नागरिक सुरक्षा आदि विभागों में कई दायित्वों को बखूबी निभा सकते हैं। उनके आने से विभागीय कार्यक्षमताओं में वृद्धि ही होगी। नगर प्रबंधन, ग्राम स्तरीय योजनाओं के संचालन, शिक्षा व्यवस्था आदि में उनकी सक्रिय भागीदारी हो सकती है। पूर्व सैनिक कल्याण निदेशालय में वह प्रशासनिक शक्ति नहीं है, जिसके तहत वे विभिन्न विभागों से आरक्षित कोटे के भरे जाने के संबंध में प्रगति विवरण मांग सकें। पूर्व सैनिकों के रोजगार, स्थानीय समस्याओं यथा भूमि-विवादों संबंधी विषयों का भी त्वरित समाधान होता नहीं देखा गया है।


आधारभूत समस्या यह है कि पूर्व सैनिकों के लिए एक अधिकार प्राप्त मंत्रालय न होने के कारण न तो उच्च स्तरीय समीक्षाएं हो पाती हैं, और न ही विभिन्न विभागों में रिक्तियों की स्थिति का पता चल पाता है। नतीजतन समस्याओं के समाधान के नीतिगत रास्ते नहीं बन पाते। उदाहरण के लिए, पुलिस, वन विभाग, होमगार्ड, शिक्षा आदि कई विभागों में नियुक्तियों केअवसर आते रहते हैं, लेकिन पूर्व सैनिकों के विषयों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल पाती, क्योंकि पूर्व सैनिक संवर्ग समाज कल्याण मंत्रालय का एक बहुत छोटा भाग होता है। राज्यों में भी पूर्व सैनिकों का कोई अलग मंत्रालय नहीं है। उत्तर प्रदेश में सैनिक कल्याण के लिए एक राज्यमंत्री तो होता है, लेकिन अलग विभाग व अलग सचिव न होने से उनकी प्रभावशीलता अत्यंत सीमित हो जाती है। कोई आत्मनिर्भर सचिव व सक्षम प्रशासनिक संरचना के न होने के कारण सैनिक कल्याण मंत्री का पद दिखावटी होकर रह गया है। यदि महिला आयोग, अनुसूचित जाति जनजाति आयोग, पिछड़ा वर्ग आयोग की तरह राज्यों में एक पूर्व सैनिक आयोग का गठन किया जाए, तो नीतिगत, व्यवस्थागत और रोजगारपरक समस्याओं के समाधान के रास्ते निकल सकते हैं।


- लेखक पूर्व सैनिक एवं पूर्व प्रशासक हैं।

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