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पारिस्थितिकी: जलवायु पर भी असर डालता है फैशन, अपशिष्ट जल और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में ये है हिस्सेदारी

बबिता भंडारी
Updated Wed, 19 Apr 2023 07:34 AM IST

सार

फैशन उद्योग वैश्विक अपशिष्ट जल का करीब 20 फीसदी उत्पादन करता है और वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 10 फीसदी योगदान देता है।
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fashion industry waste - फोटो : सोशल मीडिया


संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 25 खरब डॉलर का फैशन उद्योग वैश्विक अपशिष्ट जल का करीब 20 फीसदी उत्पादन करता है और अपनी लंबी आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा गहन उत्पादन के कारण वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत योगदान देता है। इसके साथ ही मैकिंसे के एक अध्ययन के अनुसार, हर साल पांच नए कपड़ों के उत्पादन के पीछे तीन कपड़ों के बराबर सामग्री बर्बाद हो जाती हैै। शोध के अनुसार, हमारे 90 फीसदी कपड़े जरूरत से पहले ही फेंक दिए जाते हैं। फैशन के अंधाधुंध उत्पादन और खपत ने एक खतरनाक स्थिति पैदा कर दी है, जैसा कि आंकड़ों से स्पष्ट है।


हाल के कुछ वर्षों में, फैशन का कुछ गैर-संवेदनशील फैशन लेबलों द्वारा डिस्पोजेबल वस्तु के रूप में विपणन किया जा रहा है। आम आदमी अक्सर फैशन की दुनिया के चमकदार ग्लैमर पक्ष से मोहित और प्रभावित हो जाता है। फैशन के दिखावे के पीछे की सच्चाई अब भी आम आदमी से छिपी हुई है। आम आदमी कभी-कभी बाजार में आए फैशन का आंख मूंदकर अनुसरण करता है, यह जाने बिना कि फैशन ट्रेंड्स आते हैं और चले जाते हैं और कुछ ट्रेंड्स एक सीजन तक भी नहीं टिकते, जो पुनः एक चिंताजनक स्थिति पैदा कर रहा है। इसलिए उपभोक्ता के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वह अपने निर्णय के बारे में जागरूक हो कि क्या और कितना कपड़ा खरीदना है।


दिलचस्प बात यह है कि मनुष्य में दूसरों से अलग दिखने, अपनी बेहतर जीवन शैली और बेहतर सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने की प्रवृत्ति होती है, और फैशन ऐसा करने का सबसे उपयुक्त तरीका बन जाता है। हालांकि, फैशन का अंधाधुंध पालन करने से यह स्थिति पैदा हो गई है कि वर्तमान में पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जलीय जीवन के लिए खतरे आदि से लड़ रही है। इन सभी का हल करने के लिए जीवन शैली में और प्रत्येक उद्योग के कार्य करने के तरीके में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन करना आवश्यक हो गया है।


इस संदर्भ में, प्रकृति के शुभचिंतकों द्वारा धीमे अथवा 'स्लो फैशन' का समर्थन किया जाता है। इस शब्द का इस्तेमाल शोधकर्ता केट फ्लेचर ने जर्नल द इकोलॉजिस्ट के एक लेख में किया था। हालांकि यह अवधारणा पहले से ही भारतीय समाज की सांस्कृतिक प्रथाओं में आत्मसात थी। नवजात के लिए कपड़े सिलना, शादी का साजो-सामान खुद तैयार करना, माताओं के कपड़े उनकी बेटियों को सौंपना, बड़े भाई-बहनों के इस्तेमाल किए हुए कपड़ों को छोटों के साथ बांटना, जरूरत पड़ने पर कपड़ों की मरम्मत करना इसके कुछ उदाहरण हैं।


पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए कई छोटे पैमाने के ब्रांड इस अवसर का उपयोग कर कुछ स्लो फैशन संग्रह लॉन्च कर रहे हैं। इस संबंध में भारतीय साड़ी को स्लो फैशन का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है, क्योंकि यह किसी भी बॉडी टाइप पर फिट हो सकती है, और इसे कई तरह से स्टाइल किया जा सकता है।


इसके अतिरिक्त हाथ से बुने और सिले हुए, हाथ से कशीदाकारी, छोटी मात्रा में बेहतर गुणवत्ता वाले परिधानों का उत्पादन, स्लो फैशन डिजाइन करने के कुछ तरीके हैं। इसलिए कपड़ों की खरीदारी करते समय सोच-समझकर निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण है, ताकि यह लैंडफिल में न पहुंचे और जलवायु पर कम प्रभाव पड़े।
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-सहायक प्रोफेसर, टेक्सटाइल डिजाइन, निफ्ट, कांगड़ा।

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