सबसे ज्यादा प्रभावित हिमाचल प्रदेश में राहत और बचाव कार्य जारी है। भूस्खलन के बाद ऐसी आशंका जताई जा रही है कि कई लोग कीचड़ और इमारतों के मलबे के नीचे दबे हुए हैं। सैकड़ों सड़कें अवरुद्ध हैं। दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य देखभाल की स्थिति के बारे में जानकारी बेहद कम है। राजधानी शिमला में स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। अकेले हिमाचल में 7028.28 करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान की खबर है। इसके बावजूद हम कह सकते हैं कि ये मौतें, आपदा, विनाश और तबाही अप्रत्याशित नहीं हैं। पारिस्थितिकी के नजरिये से हिमालय क्षेत्र वैसे भी काफी नाजुक माना जाता है। कुछ खास बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं जोखिम से भरी होती हैं। विशेषज्ञ कई वर्षों से इस बारे में आगाह करते रहे हैं। पर्यावरण में हो रहे बदलावों से जोखिम भी लगातार बढ़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भूस्खलन से 48 लाख लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है और इससे 1998-2017 के बीच 18 हजार से ज्यादा लोगों की मौतें हो चुकी हैं। पर्यावरण में बदलाव और बढ़ते तापमान के कारण खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में ज्यादा भूस्खलन होने की आशंका होती है। हिमालय में अधिक ऊंचाई पर जमी हुई बर्फ जब पिघलती है, तब, खड़ी ढलानें ज्यादा अस्थिर हो सकती हैं, नतीजतन, भूस्खलन हो सकता है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले केंद्र सरकार के एक शीर्ष निकाय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सितंबर, 2019 के रणनीति पत्र में कहा गया है, 'देश में कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर कोई भूमि उपयोग नीति नहीं है। हिमालय पर शहरों का बोझ बढ़ रहा है। और, ये शहर कचरे व प्लास्टिक, अनुपचारित सीवेज, जल संकट, अनियोजित शहरी विकास और वाहनों के चलते स्थानीय वायु प्रदूषण के कारण बनकर रह गए हैं। खासकर, गर्मियों में आने वाले पर्यटकों की भीड़ को देखते हुए इन शहरों को थोड़ा नियोजित करने की जरूरत है।'
रणनीति पत्र यह भी रेखांकित करता है, 'ग्रामीण क्षेत्रों में बगैर पर्याप्त शोध और जल निकासी की सुचारु व्यवस्था के सड़क निर्माण में भारी निवेश और पहाड़ों में अनियोजित ढंग से की जा रही विकास गतिवधियां इन क्षेत्रों में जोखिम बढ़ा रही हैं।' यह पत्र परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाने से पहले इसमें शहरी योजनाकारों को भार वहन परीक्षणों, जोखिम क्षेत्र, ढलान और भूमि उपयोग का मानचित्र तैयार रखने की वकालत करता है। इसके अलावा, यह ग्रामीण समुदायों पर भूस्खलन के प्रभावों को भी रेखांकित करता है, जहां कृषि के एक बड़े क्षेत्र में नुकसान ने पहाड़ी क्षेत्रों में आजीविकाओं को नष्ट किया है। यह पहाड़ी इलाकों में खाद्य सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
इसके अलावा, भूस्खलन में किसानों की खोई जमीन के मुआवजे देने पर भी ध्यान देने की जरूरत है। रणनीति पत्र यह भी कहता है, 'हाल ही में हुए भूस्खलन और बादल फटने व बाढ़ जैसे खतरों के दौरान बड़े पैमाने पर संपत्ति के नुकसान से पता चला है कि अधिकांश निर्माण योजनाएं गलत हैं और मानक मानदंडों का पालन नहीं करतीं। आमतौर पर सरकारी विभागों द्वारा भी डिजाइन संबंधी नियमों का पालन नहीं किया जाता है। इसने एक चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है, जहां प्रतिकूल जलवायु, नाजुक वातावरण और टेक्टोनिक रूप से सक्रिय अस्थिर पहाड़ी इलाकों में पहले से ही मौजूद असुरक्षित इमारतों की संख्या में हर साल काफी असुरक्षित भवन और जुड़ जाते हैं।'
राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति तीन वर्षों के अनुसंधान और क्षेत्रीय दौरों के नतीजों के आधार पर सिफारिश करता है कि 'पर्यावरण और अन्य प्रासंगिक कारकों को ध्यान में रखते हुए एक एकीकृत विकास योजना तैयार की जा सकती है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल निकायों सहित दूसरे जल निकायों को भी संरक्षित करने के प्रयास होने चाहिए। पहाड़ी ढलान को काटने से पारिस्थितिक क्षति होती है और निकटवर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता आती है, इसलिए जब तक उचित उपाय नहीं कर लिए जाते, ऐसी कटाई नहीं की जानी चाहिए। आमतौर पर 30 से अधिक ढलान वाले क्षेत्रों या भूस्खलन के खतरे वाले क्षेत्रों में कोई निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।'
जाहिर है, क्या किया जाना चाहिए और इससे भी महत्वपूर्ण क्या नहीं होना चाहिए, इस पर कई विशेषज्ञों की राय उपलब्ध है। दिक्कत केवल इतनी है कि दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। हमें आपदाओं के बारे में अपनी समझ बदलने की जरूरत है। एक बेहतर समझ में आपदाओं के प्रभाव को कम करने के एहतियाती उपाय शामिल होते हैं, जो बचाव और राहत कार्य समाप्त होने के बाद बेहतर निर्माण में मदद कर सकते हैं।
पर्यावरण समूह हिमधारा की संस्थापक मानसी अशर जैसी जमीनी कार्यकर्ता और कई दूसरे लोग भी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन पर्यावरण-संवेदनशील राज्यों के विकास मॉडल को फिर से तैयार करने की जरूरत है। विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर हुए पारिस्थितिक विनाश के कारण हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन जैसी आपदाओं की आवृत्ति कई गुना बढ़ गई है। यह अनियोजित विकास है। नियोजित विकास पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखता है, ताकि दोनों के बीच किसी समझौते की जरूरत न रहे। अब समय आ गया है कि नीति निर्माता संबंधित अधिकारियों और नागरिक समाज की आवाज सुनें।