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चिकित्सा: जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं का सवाल, गुणवत्ता की जांच बढ़ाने की दरकार

सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Wed, 23 Aug 2023 07:36 AM IST

सार

बेशक जेनरिक दवाएं सस्ते इलाज के लिए जरूरी हैं, मगर दवाओं की गुणवत्ता उससे भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि नकली दवाएं जानलेवा साबित हो रही हैं।
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drugs - फोटो : अमर उजाला


आईएमए के अध्यक्ष का कहना है कि जब एनएमसी डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य कर रही है, तो उसे इसकी गारंटी देनी चाहिए कि जेनेरिक दवाएं, ब्रांडेड दवाओं की तरह गुणवत्तापरक होंगी। उनका यह भी कहना है कि अगर ब्रांड नाम से लाइसेंस दिया जा रहा है, तो ब्रांड नाम से दवा लिखने से कैसे रोका जा सकता है? आईएमए ने तो यहां तक कहा कि हमारे यहां दवा की गुणवत्ता की जांच नहीं होती। अपने देश में प्रतिवर्ष कुल उत्पादित एक प्रतिशत दवाओं की ही 26 सरकारी प्रयोगशालाओं में जांच हो पाती है। जांच रिपोर्ट आने में छह से नौ महीने लग जाते हैं। ऐसे में दवाओं की गुणवत्ता की गारंटी नहीं होती।


बेशक जेनेरिक दवाएं सस्ती होती हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने का सवाल भी कम जरूरी नहीं है। ब्रांडेड दवाएं महंगी हैं और डॉक्टरों को प्रभावित कर बेची जाती हैं। इसके अलावा अपने देश में बिना फार्मासिस्टों के ही दवाओं की दुकानें खुलती हैं और एक फार्मासिस्ट औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अपना लाइसेंस कई दुकानों को उपलब्ध कराकर कमाई करता है।


गुणवत्ता का सवाल कई कारणों से उठ रहा है। जी-20 की बैठक में अमेरिकी हेल्थ ऐंड ह्यूमेन सर्विसेज के सेक्रेटरी ने भारतीय दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि हम भारत की दवाएं तभी मंगाएंगे, जब वे अमेरिकी मानकों पर खरा उतरेंगी। ब्रिटिश जर्नल ऑफ क्लिनिकल फार्मेसी के मुताबिक, भारत में 64 प्रतिशत एंटीबायोटिक दवाएं बिना मंजूरी के बिक रही हैं। वर्ष 2022 में गांबिया (अफ्रीका) में भारतीय कफ सिरप पीकर लगभग 70 बच्चे मर गए। वर्ष 2022 के अंत में उज्बेकिस्तान में 18 बच्चे भारतीय डॉक-1 मैक्स कफ सिरप पीकर मर गए थे। इन घटनाओं से दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल तब भी उठे थे और नेपाल ने 16 भारतीय दवा कंपनियों की दवाएं प्रतिबंधित कर दी थीं। यह सही है कि जिलों में फूड ऐंड ड्रग्स कंट्रोलर के यहां कोई लैब नहीं है, जहां दवाओं की गुणवत्ता जांची जा सके। दवा उत्पादन, वितरण और अनुमति का पूरा कारोबार बिना जांच के, अथाह कमीशन के बल पर ही चल रहा है।


इसके अलावा देश के 10,500 के करीब दवा निर्माताओं पर नियंत्रण के लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (सीडीएसओ) के पास न पर्याप्त कर्मचारी हैं और न ही आधारभूत सुविधाएं हैं। दवा कंपनियां अपने लाभ के लिए डॉक्टरों को प्रभावित कर महंगी ब्रांडेड दवाएं बेच रही हैं। जबकि सौ से हजार प्रतिशत सस्ती जेनरिक दवाओं से भी इलाज किया जा सकता है। यह दवा कंपनियों का ही कमाल है कि लगभग एक हजार जरूरी दवाओं को नब्बे हजार से अधिक नामों और पैकेटों में बाजार में उतारा जा रहा है। देश के अधिकांश डॉक्टरों के भ्रमण, सैर-सपाटे आदि का खर्च दवा कंपनियां ही उठाती हैं, जिससे डॉक्टरों द्वारा लिखा पर्चा मरीजों के बजाय कंपनियों के हित में होता है।


जाहिर है, आधारभूत सुविधाओं के अभाव में सारी दवाओं की जांच संभव नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दवाओं की गुणवत्ता की जांच बढ़ाई जाए। बेशक जेनरिक दवाएं सस्ते इलाज के लिए जरूरी हैं, मगर दवाओं की गुणवत्ता उससे भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि नकली दवाएं जानलेवा साबित हो रही हैं।

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