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शिक्षा और गोरक्षा उनका मिशन था, पीढ़ियों तक याद किए जाएंगे स्वामी ब्रह्मानंद

अमित राजपूत Published by: अमित राजपूत Updated Fri, 13 Sep 2019 03:04 AM IST
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स्वामी ब्रह्मानंद - फोटो : a

स्वामी ब्रह्मानंद देश के पहले गेरुवा-वस्त्रधारी सांसद थे। वह पहली बार 1967 में चौथे लोकसभा चुनाव में जनसंघ के टिकट पर भारी मतों से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। अगले चुनाव में वह इंदिरा गांधी के आग्रह पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और फिर सांसद चुने गए। वह 1967 से 1977 तक हमीरपुर से सांसद रहे। वह पहले सांसद थे, जिसने गोवंश की रक्षा और गोवध का विरोध करते हुए संसद में करीब एक घंटे तक ऐतिहासिक भाषण दिया था। स्वामी ब्रह्मानंद ने अपनी समस्त आध्यात्मिक ऊर्जा का रचनाधर्मी प्रयोग जन-कल्याण के लिए किया। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके भगीरथ प्रयासों और गोरक्षा आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी नहीं भूल सकतीं। वह एक ऐसे संत रहे, जिन्होंने अखाड़ा, आश्रम, परिषद या ऐसी किसी भी संस्था में खुद को कैद नहीं किया।



उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जनपद की सरीला तहसील के बरहरा गांव में चार दिसंबर, 1894 को पैदा हुए स्वामी ब्रह्मानंद ने महज 23 वर्ष की अवस्था में वैराग्य लेकर संन्यासी के रूप में बारह वर्ष तक पूरे देश का भ्रमण किया। उस दौरान उन्होंने देशवासियों की भावनाओं और उनकी समस्याओं को जड़ से समझा और पाया कि कुल समस्याओं की जड़ अशिक्षा ही है। सर्वप्रथम उन्होंने पंजाब में हिंदी पाठशालाएं खुलवाईं। बीकानेर सहित राजस्थान के कई सूखाग्रस्त क्षेत्रों में उन्होंने बड़े-बड़े तालाब खुदवाए तथा किसानों और दलितों के उत्थान के लिए काम किया। शिक्षा के प्रति वह बेहद गंभीर थे। सांसद रहते हुए उन्हें जो धन मिलता, उसकी पाई-पाई वह शिक्षा के लिए दान दे देते और खुद भिक्षा मांगकर खाते थे। हमीरपुर के राठ में उन्होंने 1938 में ब्रह्मानंद इंटर कॉलेज, 1943 में ब्रह्मानंद संस्कृत महाविद्यालय तथा 1960 में ब्रह्मानंद महाविद्यालय की स्थापना की। शिक्षा के क्षेत्र में स्वामी ब्रह्मानंद के सराहनीय योगदानों से प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे चंद्रभानु गुप्त ने एक सार्वजनिक समारोह में उन्हें 'बुंदेलखंड मालवीय’ की उपाधि से सम्मानित किया था।


स्वामी ब्रह्मानंद गोहत्या को लेकर चिंतित रहने वालों में सबसे आगे थे। वर्ष 1966 में हुए सबसे बड़े गोहत्या हत्या निषेध आंदोलन के वह जनक थे। तब उन्होंने प्रयाग से दिल्ली के लिए पैदल ही प्रस्थान किया था, जिसमें उनके साथ कुछ और भी साधु-महात्मा थे। गोरक्षा आंदोलन के लिए निकले जत्थे ने उनके नेतृत्व में 1966 की रामनवमी को दिल्ली में सत्याग्रह किया था। तब उनके साथ 10-12 लाख लोगों का हुजूम जुट गया था, जिससे तत्कालीन सरकार घबरा गई और फिर उन्हें गिरप्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।


स्वामी ब्रह्मानंद का विराट व्यक्तित्व ही था कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इनके जन्म स्थान पर इनकी मूर्ति स्थापित की और उनके गांव का नाम बरहरा से बदलकर स्वामी ब्रह्मानंद धाम तथा विरमा नदी पर बने मौदहा बांध का नाम स्वामी ब्रह्मानंद बांध किया। केंद्र सरकार ने भी इनके 13वें निर्वाण दिवस यानी 13 सितंबर, 1997 को उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया था।


यह वर्ष स्वामी ब्रह्मानंद की 125 जयंती का वर्ष भी है। देश के सुदूर और उपेक्षित इलाकों में शिक्षा का प्रसार कर तथा देश में गोरक्षा के प्रति सामाजिक और विधायी स्तर पर क्या किया जाए, इस पर व्यापक विचार कर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं।

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