लक्ष्मीनारायण कर्नाटक के सिमोगा के एक किसान हैं। उन्होंने केनरा बैंक के स्थानीय शाखा से 35,000 रुपये कर्ज लिए। लगभग एक महीने पहले उन्हें बैंक से एक धमकी भरा फोन आया कि या तो वह बकाए कर्ज का भुगतान कर दें, अन्यथा बैंक कर्ज वसूली के लिए कार्रवाई करने पर मजबूर होगा।
घबराकर उन्होंने बैंक जाने का फैसला किया। लेकिन उस समय कोई बस उपलब्ध नहीं होने के कारण वह पहाड़ी इलाके में पंद्रह किलोमीटर तक पैदल चलकर आखिरकार बैंक पहुंचे। बैंक में उन्हें बताया गया कि लंबित कर्ज की राशि चुकाने के लिए उन्हें 3.46 रुपये भुगतान करना पड़ेगा!
यह कहानी बैंकों के दोहरे मानदंड की याद दिलाती है कि वे अपने ग्राहकों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। एक तरफ जहां अक्सर गरीबों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है, जिससे वे जेल जाने या आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं, वहीं अमीरों के साथ नरम व्यवहार किया जाता है और आसानी से उन्हें बैंक को चूना लगाने का मौका दिया जाता है।
अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ही मामले को लें। खबरों के मुताबिक, बैंक ने पिछले आठ वर्षों में 1.23 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट बुरे ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया है। यह बताए जाने के बावजूद कि तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डालने का मतलब ऋण माफी नहीं है और वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है, इन आठ वर्षों में बैंक ने जो राशि वसूली है, वह मात्र 8,969 करोड़ रुपये है, जो बकाए कर्ज का मात्र सात फीसदी से थोड़ा ज्यादा है।
इस विशेष मामले में सबसे बड़े डिफॉल्टर हैं भूषण पावर ऐंड स्टील लिमिटेड, जिस पर 7,705 करोड़ रुपये और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड पर 3,411 करोड़ रुपये बकाया हैं। सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत पूछे गए सवाल के जवाब के अनुसार, दोनों कंपनियां एक भी पैसा जमा नहीं कर पाई हैं।
वास्तव में 56 कंपनियों की जो सूची उपलब्ध कराई गई थी, उनमें से 36 कंपनियों से वसूली शून्य थी। मात्र 3.46 रुपये की शेष राशि के लिए एक किसान को बैंक में आने और उसे भुगतान करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन 36 कंपनियों का क्या हुआ, जिनसे एसबीआई एक पैसा भी वसूल नहीं कर पाई?
आरटीआई के जवाब पर आधारित एक अन्य खबर में बताया गया कि 2015-16 से 2018-19 के बीच चार वर्षों में बट्टे खाते में डाले गए बैंक ऋणों में से केवल 10 प्रतिशत की ही वसूली हुई है। इन चार वर्षों में कुल 4,32,584 रुपये बट्टे खाते में डाले गए, जिनमें से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल 45,659 करोड़ रुपये ही वसूल सके।
यदि कुल राशि का सात से दस प्रतिशत, जिसे अंततः बैंक वसूलने में सक्षम होता है, तो सवाल उठता है कि कॉरपोरेट ऋण को बट्टे खाते में डालने को बैंक कृषि ऋणमाफी से अलग बताने की कोशिश क्यों करता है। बट्टे खाते में डालने और ऋण माफी के बीच के ‘तकनीकी’ अंतर का उपयोग करते हुए बैंक बहुत चालाकी से भारी कॉरपोरेट गड़बड़ी को ढकने का काम करते हैं।
हैरानी की बात है कि यह प्रथा समय के साथ एक बैंकिंग प्रक्रिया बन गई है। लेकिन इससे पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बैंकों को जारी एक परिपत्र में कहा था कि उन्हें इस प्रथा से बचना चाहिए। ‘बैंकों को किसी भी खाते को पूर्णतः या अंशतः बट्टे खाते में डालने से पहले वसूली के सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग करने की जरूरत है।
यह देखा गया है कि कुछ बैंक खातों को तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डालने का सहारा ले रहे हैं, जिससे वसूली के प्रति प्रोत्साहन कम हो जाता है। खातों को तकनीकी रूप से आंशिक और पूर्णतः बट्टे खाते में डालने वाले बैंकों को ऋण के शेष हिस्से को मानक संपत्ति के रूप में नहीं दिखाना चाहिए।’
संभवतः अपनी गलतियां छिपाने के लिए बैंक नियमित रूप से यह दावा करते रहे हैं कि बट्टे खाते में डालने का मतलब है कि खाते को एक लेजर से दूसरे लेजर में ले जाना है, वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है। लेकिन कई बैंकिंग विशेषज्ञ मानते हैं कि जब बुरे ऋण को बट्टे खाते में डाला जाता है, तो बैंक वास्तव में बैलेंस शीट से परिसंपत्तियों को हटा देते हैं, यह मानते हुए कि वे कुछ भी वसूली करने की उम्मीद खो चुके हैं।
यहां एक सवाल उठता है कि किसी भी ऋण को बट्टे खाते में डालने की घोषणा करने से पहले बैंकों को वसूली के सभी उपायों को आजमाने के लिए क्यों नहीं कहा जाता है। बैंक नुकसान को अलग खाते में डालकर बैंक के मुनाफे को बैलेंस शीट में दिखाकर क्यों लोगों को (और नीति निर्माताओं को भी) जान-बूझकर भ्रमित किया जाता है?
यह नुकसानदेह प्रथा है, जिसे बंद किए जाने की जरूरत है। बैंकों द्वारा तथ्यों को जान-बूझकर छिपाने की इस प्रथा के खिलाफ रिजर्व बैंक को सख्त कदम उठाने की जरूरत है। लेकिन इसके बजाय बैंकों पर एक खराब बैंक व्यवस्था बनाने का दबाव बनाया जाता है, जो बुरे कर्जों को बढ़ावा देता है।
यानी बढ़ते हुए ऋणों की गड़बड़ियों के पीछे मूलभूत कारणों को ठीक करने के बजाय, बैंक एक और तथ्य छिपाना चाहते हैं। खराब बैंकों की स्थापना मेरी नजर में एक बुरा विचार है। अप्रैल में रिजर्व बैंक ने बताया कि 68,067 करोड़ रुपये, जो कि पिछले कुछ वर्षों से 50 जानबूझकर दिवालिया होने वालों द्वारा चुकाए नहीं गए थे, राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा बट्टे खाते में डाल दिए गए हैं। हीरा व्यापारी मेहुल चोकसी सहित कई व्यवसायी उसमें शामिल हैं।
कई बैंकिंग विशेषज्ञों ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आह्वान किया है, लेकिन ऐसा कभी नहीं किया गया। अखिल भारतीय बैंकिंग कर्मचारी संघ के महासचिव सी एच वेंकटचलम ने पहले मीडिया को बताया था कि ‘यह ज्ञात है कि इन बुरे ऋणों के लिए बड़ी संख्या में बड़े व्यवसायी और समृद्ध लोग जिम्मेदार हैं।
दुर्भाग्य से बैंक ऋण न चुकाना अब भी एक नागरिक अपराध है और इसलिए उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा रही है।’ 'विलफुल डिफॉल्टर्स' यानी जानबूझकर दिवालिया होने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करना बैंकों को अमीर और ताकतवर लोगों की ठगी से बचाने के पहला कदम होना चाहिए। आश्चर्य की बात कि क्यों किसानों को छोटे ऋण न चुकाने के लिए दंडित किया जाता है, जबकि अमीर आसानी से भाग जाते हैं।