खेतिहर समाज के रूप में कृषि समुदाय को एकजुट रखने में किसान आंदोलनों की बड़ी भूमिका थी, ताकि खेती जिंदा रह सके। इससे किसान भले ही विलासितापूर्ण जीवन नहीं जी रहे थे, मगर सामान्यतौर पर किसान सहज जीवन जी रहे थे और सिर्फ आपदा के समय ही उन्हें कर्ज लेना पड़ता था। लेकिन हाल के वर्षों में आंदोलन तो पीछे रह गए और राजनीतिक वर्ग ने खेतिहर वर्ग को एकजुट होने से हतोत्साहित किया। इससे ग्रामीण आबादी भी जातिवादी राजनीति की ओर मुड़ गई।
1980 और 1990 के दशक के किसान आंदोलन छोटे-छोटे गुटों में बंट गए। जाति के आधार पर राजनीति करने वाले दलों ने भी अपने किसान संगठन बना लिए, जोकि पार्टी लाइन पर काम करने लगे और यह सब उद्योग से संचालित होते थे। इससे किसान अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने में कमजोर पड़ते गए, दूसरी ओर व्यापारियों ने लागत से भी कम दाम पर उनके उत्पाद खरीद कर उनका शोषण किया।
किसानों को सुरक्षा देने के लिए सरकार ने प्रमुख फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था शुरू की। गेहूं और धान सहित 24 फसलों के लिए एमएसपी घोषित होने के बावजूद किसी बात की गारंटी नहीं थी और किसानों को मजबूरी में एमएसपी से कम दामों पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है। एमएसपी को जानबूझकर नीचे रखा जाता है, ताकि उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित रहें।
इस बीच, जिला स्तरों पर कुकुरमुत्तों की तरह किसान संगठन उग आए और अपनी सीमाओं के बावजूद किसानों के हितों की लड़ाई लड़ते रहे। राज्य ने इन आंदोलनों को कुचल दिया और उनके खिलाफ आपराधिक मामले भी दर्ज करवा दिए। इससे कुछ संगठन सरकार के आगे झुक गए और किसानों को हताशा में छोड़ दिया। चूंकि खेती घाटे का धंधा बनती जा रही है, पंद्रह-बीस साल के दौरान साढ़े तीन लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, किसान परिवारों की अगली पीढ़ी खेती से विमुख होती जा रही है।
ऐसे ही माहौल में पिछले साल मध्य प्रदेश में कुछ किसान संगठनों ने कर्जमाफी और एमएसपी पर खरीद जैसी मांगों को लेकर आंदोलन किया, लेकिन पुलिस ने बलपूर्वक आंदोलन को कुचल दिया, जिससे मंदसौर में छह जून, 2017 को छह किसान फायरिंग में मारे गए।
किसानों के एकजुट आंदोलन की जरूरत को महसूस करते हुए 16 जून, 2017 को देशभर के सैकड़ों किसान संगठनों ने मिलकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) का गठन किया। इससे 194 किसान संगठन जुड़ चुके हैं। देशभर में तकरीबन दस हजार किलोमीटर की यात्रा और पांच सौ से अधिक बैठकें करने के बाद एआईकेएससीसी ने दो अहम मांगों को चिह्नित किया है, जिन पर किसानों का संकट दूर करने के लिए तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
ये मांगे हैं, कर्ज से मुक्ति और गारंटीशुदा लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य। ये दोनों मांगें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं-यदि कर्ज से राहत दिए बिना लाभकारी समर्थन मूल्य दिया जाएगा तो जो रिटर्न मिलेगा वह सिर्फ बढ़ते कर्ज को चुकाने के ही काम आएगा। दूसरी ओर यदि सिर्फ कर्जमाफी की जाती है और लाभकारी मूल्य नहीं दिया जाता है, तो वे फिर कर्ज में डूबने लगेंगे। लिहाजा एआईकेएससीसी ने तय किया कि वह इन दोनों मांगों की पूर्ति के लिए केंद्रीय कानून बनाने के लिए दो निजी विधेयक पेश किए जाने पर जोर देगी।
इस क्रम में नवंबर, 2017 में देशभर के लाखों किसान नई दिल्ली में किसान मुक्ति संसद में इकट्ठा हुए, जहां इन दोनों बिलों के मसौदे पेश किए गए। देश के विभिन्न हिस्सों में राज्य और जिला स्तर पर मशविरे के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों को इन बिलों के मसौदे भेजे गए। 28 मार्च, 2018 को 21 राजनीतिक दलों ने एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर इन बिलों का समर्थन किया। ये दोनों बिल लोकसभा और राज्यसभा में क्रमशः राजू शेट्टी और के के रागेश द्वारा प्रस्तुत किए गए।
उधर देश के सारे जिलों के किसानों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को भेजे गए और उनसे आग्रह किया गया कि इन बिलों को किसान विधेयकों के रूप में मंजूरी दिलवाई जाए। इन दोनों बिलों को सत्ता पक्ष और विपक्ष में शामिल अनेक दलों ने समर्थन देने का वायदा किया। आखिर जब जीएसटी के लिए मध्य रात्रि को संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है, तो फिर कृषि संकट को सुलझाने के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता?
एआईकेएससीसी के सदस्यों ने 28 मई को राष्ट्रपति से मुलाकात कर उनके हस्तक्षेप की मांग की और उनसे देश इन दो बिलों को पारित करवाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने का आग्रह किया। राष्ट्रपति ने प्रतिनिधिमंडल को कृषि संकट को दूर करने के लिए हर संभव मदद करने का आश्वसान दिया।
इस बीच, एक सच यह भी है कि किसानों के मुद्दे उठाना फैशन जैसा बन गया है। जिन राजनेताओं ने सत्ता में रहते किसानों की तकलीफों को कम करने के लिए कुछ नहीं किया वह अब धरना प्रदर्शन करते हैं। इसी तरह से कुछ संगठनों ने इसी साल फरवरी में किसान आंदोलन का एलान किया और नाकाम होने के बाद वे अन्ना हजारे के आंदोलन का हिस्सा बन गए थे। उन्हें जब किसानों का समर्थन नहीं मिला तो उन्होंने एक से दस जून के बीच 'गांव बंद' का ऐलान कर दिया।
एआईकेएससीसी ने खुद को गांव बंद आंदोलन से दूर रखा है। इस मौसम में कोई फसल नहीं होती, सिवाय सब्जियों और दूध के जोकि खराब भी हो जाते हैं। किसान इन्हें ही बेचते हैं। दूध कृषक समुदाय में 85 फीसदी हिस्सेदारी करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के जीवनयापन का मुख्य स्रोत है। गर्मियों में जब दूध का उत्पादन कम होता है, किसानों से यह कहना कि वह दूध न बेचें या सड़कों पर बहा दें, किसी भी रूप में जायज नहीं है।
गांव बंद से बिचौलियों को फायदा हो रहा है। वास्तव में राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने की जरूरत है, ताकि वे खेती को लाभकारी बनाने के लिए जमीनी स्तर पर काम करें; और किसान स्वयं जाति-बिरादरी को छोड़कर किसान बिरादरी से जुड़ जाएं।
-लेखक अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक हैं।