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संसद की गरिमा और विपक्ष का दायित्व

आलोक मेहता
Updated Sun, 14 Feb 2021 08:17 AM IST
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लोकसभा - फोटो : ANI

मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे वर्ष 1972 से संसद की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिलता रहा है। पहले समाचार एजेंसी का संवाददाता होने से अधिक समय गैलरी में बैठना होता था। नियम-कानूनों को ध्यान में रखकर सुनना और लिखना पड़ता था। अखबारों में रहने पर सदन के अंदर और बाहर अथवा संसदीय लाइब्रेरी में रहकर अधिकाधिक जानकारियां प्राप्त करनी होती थीं। वर्षों तक अखबारों में संसद की कार्यवाही-प्रश्नोत्तर और महत्वपूर्ण मुद्दों पर पहले पृष्ठ की खबर से अधिक अंदर पूरे एक पृष्ठ की सामग्री जाती थी। महत्वपूर्ण भाषणों के अधिकांश अंश छापे जाते थे। लेकिन दो दशक से अधिकांश अखबारों अथवा निजी टीवी समाचार चैनलों पर केवल विवादास्पद मुद्दे प्रमुखता पाते हैं। इससे संसद की छवि खराब होती जा रही है। संसद में आज भी योग्यतम सदस्य हैं। निश्चित रूप से इनकी तुलना आजादी के बाद बीस वर्ष तक रहे दिग्गज नेताओं से नहीं की जा सकती। लेकिन विभिन्न दलों के कई नेता पूरी तैयारी से, तथ्यपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रखते हैं। लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल-जवाब और भाषण मीडिया में न्यूनतम दिखते हैं। इस बार संसद के कुछ दृश्यों, गतिविधियों और टिप्पणियों ने भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को धक्का पहुंचाया है।



राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार, सभापति पर अनुचित टिप्पणी, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और अब राज्यसभा के मनोनीत सम्माननीय सदस्य पर बेहद आपत्तिजनक आरोपों की चर्चा, प्रधानमंत्री के विरुद्ध भी अशोभनीय भाषा का प्रयोग, बजट सहित कई गंभीर विषयों पर निर्धारित समयावधि में अनुपस्थिति अथवा प्रतिपक्ष के प्रमुख नेता द्वारा विषय पर न बोलने का दंभपूर्ण दावा दुखद ही नहीं, संसदीय व्यवस्था को भी शर्मसार करता है। संसद के विशेषाधिकार के नाम पर कुछ सदस्यों ने न केवल अनर्गल आरोप लगाए, बल्कि झुकने को भी तैयार नहीं हुए। उनकी पार्टी ने भी उन्हें न रोका, न खेद जताया।


इस गंभीर मुद्दे पर संसदीय नियम और अपनी लक्ष्मण रेखा का निर्वाह करते हुए यहां मैं उन सदस्यों और आपत्तिजनक बातों का उल्लेख नहीं कर रहा हूं। विडंबना यह है कि पुरानी परंपरा और संसदीय नियमावली के अनुसार अध्यक्ष/सभापति सदन की कार्यवाही से उन बातों को निकाल देने की आदेशात्मक घोषणा कर देते हैं, लेकिन लोकसभा या राज्यसभा के सीधे प्रसारण के समय न केवल वे आरोप और अशोभनीय दृश्य देश-दुनिया में पहुंच जाते हैं, बल्कि कोई कहीं भी उसे रिकॉर्ड करके रख लेता है, फिर सोशल मीडिया पर करोड़ों लोग तक पहुंचा देता है। मैं उन पत्रकारों में से हूं, जो संसद और अदालत की कार्यवाही के टीवी पर सीधे प्रसारण के लिए बोलते-लिखते रहे हैं। इसलिए अब किस तरीके से इस व्यवस्था पर किसी तरह के अंकुश की बात कर सकता हूं? फिर भी मैंने पिछले वर्षों के दौरान सदन के सभापतियों के समक्ष यह बात जरूर रखी थी कि सदन की कार्यवाही से निकाले जाने की घोषणा से प्रिंट में छापना नियमानुसार अपराध हैं और बाहर उसी अंश के वीडियो चलने पर रोक नहीं लग पाती। यह कितना हास्यास्पद है। लेकिन यह नियम बरकरार है। क्या राजनीतिक दलों और सांसदों को स्वयं अपनी और सदन की साख के बारे में गंभीरता से नहीं सोचना चाहिए?


हाल की घटनाओं से लगता है कि राहुल गांधी और उनके समर्थक मोदी सरकार को हटाने के लिए ब्रिटिश नेता चर्चिल के फॉर्मूले को अपना रहे हैं। यों चर्चिल वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन बुरे दिन आने और लेबर सरकार के आने से दुखी होकर उन्होंने कहा था, 'विपक्ष का धर्म है कि वह सत्तारूढ़ दल को सत्ता से हटाए, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े।' इसी सिद्धांत को मानकर राहुल गांधी और उनकी मंडली नए कृषि कानूनों से किसानों की सारी जमीन और फसल केवल दो उद्योगपतियों के पास चल जाने, विदेशी कंपनियों द्वारा सारा अनाज विदेश ले जाने से भारत में लोगों के भूखे मरने, चीन के भारत में घुस आने और प्रधानमंत्री के घुटने टेकने जैसे अनर्गल आरोप संसद के अंदर और बाहर लगा रहे हैं। निरंतर भ्रम और अफवाहों की वजह से क्या उनकी और भारत की छवि खराब नहीं हो रही है? ऐसा नहीं कि सत्तारूढ़ नेताओं से कोई गलती नहीं हो रही या उनकी गड़बड़ियों, कमियों की तीखी आलोचना नहीं होनी चाहिए। संघ-भाजपा के नेताओं में भी मतभिन्नता संभव है। लेकिन सुरक्षा और समाज कल्याण के मुद्दों पर गलत जानकारियां फैलाना कितना उचित कहा जाएगा?


यह वह संसद है, जिसमें पिछले पचास साल में अटल बिहारी वाजपेयी, ज्योतिर्मय बसु, मधु लिमये, पीलू मोदी, जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, जॉर्ज फर्नांडीज, हेमवती नंदन बहुगुणा, नरसिंह राव, प्रणब मुखर्जी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज सांसदों ने पक्ष-विपक्ष में रहकर आदर्श लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत किया। विरोध में नैतिक मूल्यों और संस्कारों की रक्षा की। तभी तो पिछले दिनों राज्यसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद की स्वयं प्रधानमंत्री ने सराहना की। संसद में न्यायपालिका, मीडिया, सेना, वैज्ञानिकों तक की विश्वसनीयता पर दाग लगाने से पूरा भारत कलंकित हो रहा है। संसद ही भारतीय लोकतंत्र का दर्पण है। इसे टूटने से बचाना सबका कर्तव्य है।

 

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