अमेरिका के इतिहास में सोशल मीडिया पर यह सब से बड़ी कार्रवाई है। साइबर बुलिंग एक तरह की ऑनलाइन बदमाशी है, जो डिजिटल माध्यमों से होती है। सोशल मीडिया और मैसेजिंग व गेमिंग प्लेटफॉर्म पर साइबर बुलिंग की घटनाएं बाल मानस पर विपरीत असर डाल रही हैं। सोशल मीडिया पर खास नियंत्रण न होने से झूठ फैलाना, शर्मनाक तस्वीरें, वीडियो, मैसेजिंग प्लेटफॉर्म से हल्के मैसेज और फोटो की मार चलती है। ऑनलाइन वीडियो गेम के दुरुपयोग के मामले बहुत बढ़ रहे हैं। ऑनलाइन गेमर्स के पास चैट करने के लिए एक माइक्रोफोन के उपयोग के माध्यम से अन्य उपयोगकर्ता से बात करने की सुविधा होती है। इसका उपयोग टीमवर्क को प्रोत्साहित करने, दोस्ती निभाने और सामान्य रूप से गेमिंग के समग्र अनुभव को बेहतर बनाना होता है। कुछ लोग इस तकनीक का गलत फायदा उठाकर इसका लाभ मौखिक दुर्व्यवहार या टेक्स्ट मैसेजिंग के माध्यम से करते हैं। सुविधा के नाम पर या देखादेखी बच्चों को फोन देने के बजाय माता-पिता को यह जानना चाहिए कि फोन की जरूरत क्या है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ओर से यूरोप के संदर्भ में कहा गया है कि ऑनलाइन की दुनिया बच्चों के लिए बहुत ही असुरक्षित बन रही है। बच्चे 24 घंटे में लगभग छह घंटे ऑनलाइन रहने लगे हैं। दुनिया का हर छठा बच्चा ऑनलाइन हिंसा का शिकार हो रहा है। इसके लिए यूरोप, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अमेरिका के 44 देशों के 11 से 15 साल के 27,900 बच्चों के डाटा का अध्ययन किया गया है, जिससे पता चला है कि 16 प्रतिशत बच्चे साइबर बुलिंग का शिकार हुए थे। चार साल पहले बच्चों में साइबर बुलिंग की मात्रा 12 प्रतिशत थी। कोरोना महामारी के लंबे लॉकडाउन के बाद किशोरों और किशोरियों की दुनिया तेजी से वर्चुअल बन गई। परिणामस्वरूप वर्चुअल हिंसा भी बढ़ी। एक समय घर, स्कूल और समुदायों में बच्चे हिंसा का सामना करते थे। अब एसएमएस, फोटो, वीडियो और ईमेल चैट से साइबर बुलिंग का शिकार बनाया जाता है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, बच्चों के साथ सब से अधिक साइबर बुलिंग बुल्गारिया, लिथुआनिया, मोल्डोवा और पोलैंड में देखने को मिलती है। साइबर बुलिंग के शिकार बच्चे अपनी रुचि के विषयों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं। डिप्रेशन, बेचैनी और गुस्से जैसे मानसिक लक्षण जब शारीरिक लक्षणों थकान, नींद न आना, सिर और पेट में दर्द देखने को मिलता है। माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे अपनी व्यक्तिगत जानकारी नाम, पता और फोन नंबर आदि शेयर न करें। बच्चों को स्क्रीनशॉट, ईमेल और टेक्स्ट मैसेज जैसे साइबर बुलिंग के सबूत इकट्ठा करने की समझ देनी चाहिए।
साल 2022 में अमेरिका की एक कंप्यूटर सिक्योरिटी कंपनी ने जानकारी दी थी कि भारत के बच्चों में साइबर बुलिंग अधिक देखने को मिलती है। 45 प्रतिशत भारतीय बच्चों ने माना था कि कभी न कभी किसी अनजान व्यक्ति की धमकी मिली थी, जिसमें 42 प्रतिशत नस्लवादी, 35 प्रतिशत यौन उत्पीड़न और 23 प्रतिशत जानकारी लीक करने की धमकी थी। अन्य देशों की अपेक्षा भारतीय बच्चे कम उम्र में ही मोबाइल का उपयोग सीख जाते हैं।
भारतीय माता-पिता साइबर अपराध के बारे में बच्चों से कम बात करते हैं। बच्चे डाटा लिमिट खत्म होने तक ऑनलाइन सक्रिय रहते हैं। गर्मी की छुट्टियों में बच्चे पढ़ाई के नाम पर ज्यादा मोबाइल पर सक्रिय रहते हैं। कोविड के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई तो उसी के बाद बच्चों में मोबाइल के प्रति रुचि बढ़ गई, जो अब भी यथावत है। जो बच्चे इंटरनेट पर अधिक रहते हैं, वे साइबर बुलिंग का शिकार अधिक होते हैं।