एक तरफ प्लास्टिक को हतोत्साहित करने की कोशिशें हो रही हैं, क्योंकि यह पर्यावरण के लिए घातक है, तो दूसरी तरफ तेल उद्योग अब भी इसके उत्पादन पर दांव लगा रहा है। प्लास्टिक उद्योग में तेल की बहुत खपत होती है, इसलिए तेल उद्योग का प्लास्टिक के प्रति आकर्षण कम नहीं हो रहा है।
गौरतलब है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल हमारी जिंदगी में बढ़ गया है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में हर सेकंड 15,000 प्लास्टिक की बोतलें बिकती हैं, वहीं हर साल 260 से 270 खरब प्लास्टिक बैगों की खपत होती है।
प्लास्टिक उत्पादन से जुड़े कार्बन डाइऑक्साइड और तमाम हानिकारक गैसों से उत्सर्जन और उनसे जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी लागत और बायो डीग्रेडेबिल नहीं होने की वजह से इसके संग्रह की लागत और जमीन व समुद्र में इसका कूड़ा जमा होने से यह सभी के लिए एक मुसीबत बन चुका है। क्या जानवर और क्या इंसान, दोनों ही इसके कभी खत्म न होने वाले कचरे से बेहाल हैं।
मई में प्लास्टिक संधि के लिए यूरोपीय संघ की पेशकश के हिसाब से, मांग कम करने से प्लास्टिक के उत्पादन स्तर में कमी की उम्मीद है। ब्रिटेन ने दुनिया के सभी देशों से प्लास्टिक उत्पादन और खपत को 'नियंत्रित' करके कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्यों को अपनाने का आह्वान किया है। जबकि अफ्रीकी देशों के समूह ने प्लास्टिक उत्पादन को नियंत्रित करने का लक्ष्य रखा है।
अमेरिका और सऊदी अरब जैसे प्रमुख तेल और गैस उत्पादकों ने प्लास्टिक उत्पादन में कटौती का आह्वान नहीं किया। वे रीसाइक्लिंग और कचरे को कम करने के जरिये प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दरअसल, प्लास्टिक का उत्पादन तेल के उत्पादन पर निर्भर करता है। मतलब प्लास्टिक की मांग बढ़ेगी, तो तेल का उत्पादन भी उसी क्रम में बढ़ेगा। दुनिया के सबसे बड़े प्लास्टिक उत्पादक देश चीन ने अपनी प्रस्तुति में कहा-प्लास्टिक उत्पादों के उत्पादन और उपयोग को कम करने के लिए एक इंटीग्रेटेड आर्थिक और बाजारू तरीका अपनाना चाहिए।
गौरतलब है कि नैरोबी में 28 फरवरी, 2022 से दो मार्च, 2022 तक आयोजित पांचवीं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (यूएनईए) के फिर से शुरू होने वाले सत्र में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए तीन मसौदा प्रस्तावों पर विचार किया गया था। भारत द्वारा प्रस्तुत मसौदा प्रस्ताव में देशों द्वारा तत्काल सामूहिक स्वैच्छिक कार्रवाई का आह्वान किया गया।
दो मार्च, 2022 को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा ने प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने के लिए 2024 तक एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी रूप से बाध्यकारी मसौदा (संधि) तैयार करने के पक्ष में फैसला किया। भारत के आग्रह पर प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए कार्रवाई करते समय राष्ट्रीय परिस्थितियों और क्षमता के सिद्धांत को संकल्प के पाठ में शामिल किया गया, ताकि विकासशील देशों को उनके विकास पथ का अनुसरण करने की अनुमति मिल सके।
यह संधि (प्लास्टिक ट्रीटि) 2024 में क्रियान्वित होगी। इसी की तैयारियों के लिए मई में दुनिया के सभी देश बैठक कर रहे हैं। भारत में हर साल 95 लाख टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। भारत ने एक जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगा दी है। लेकिन यह लक्ष्य अभी हासिल नहीं हो पाया है। देश को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने का सफर आसान नहीं है और यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इस प्रतिबंध को कामयाब बनाने के लिए कंपनियों, केंद्र और राज्य सरकारों समेत उपभोक्ताओं को अपनी भूमिका निभानी होगी। देशवासियों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आना होगा।
- लेखिका, जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा की संचार विशेषज्ञ हैं।