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संकट: सिलिकॉन वैली बैंक के ध्वस्त होने के मायने, कैसे आई यह नौबत

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Tue, 14 Mar 2023 06:32 AM IST

सार

एसवीबी के इतिहास और कद को देखते हुए इस बैंक का पतन एक बड़ी घटना है। भारतीय स्टार्ट-अप पेटीएम के पुराने संस्करण ‘वन 97’ को एसवीबी ने वित्त पोषित किया था। स्टार्ट-अप्स के लिए इसका सबक यह है कि ऐसे बैंकों के साथ जोखिम भी जुड़े होते हैं, जो उनके व्यवसाय और उद्यम को चौपट कर सकते हैं।
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सिलिकॉन वैली बैंक - फोटो : ANI


वास्तव में एसवीबी उद्यम में अपने निवेश के साथ बहुत पहले लाभ लेकर निकल गया था। जीतने वाले उपक्रमों पर सट्टा लगाने के लिए प्रसिद्ध यह बैंक यह भांप भी नहीं पाया कि अपने कुछ गलत कदमों के कारण उसका अंत निकट है। एसवीबी के इतिहास और कद को देखते हुए इस बैंक का पतन निश्चित तौर पर एक बड़ी घटना है। बैंक अपने आप में अच्छा व्यवसाय कर रहा था और चिंता की कोई बात नहीं थी। फिर भी अपने सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं के कारण यह ध्वस्त हो गया। तकनीकी क्षेत्र का अप्रभावी प्रदर्शन, फंडिंग और रिटर्न पर लंबे समय तक कोविड-19 का प्रभाव प्राथमिक समस्याएं थीं। लेकिन जिस चीज ने बैंक को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, वह था केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि करके मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की कवायद। एसवीबी ने बॉन्ड में अपना पैसा लगाया था, और बॉन्ड यील्ड एवं ब्याज दरें एक-दूसरे से विपरीत रूप से संबंधित हैं।


इसलिए जिस क्षण केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में वृद्धि करनी शुरू की, एसवीबी के पास मौजूद बॉन्ड अपनी कमाई खोने लगे, खासकर जब ग्राहकों ने नए जारी किए जा रहे उच्च ब्याज देने वाले बॉन्ड में निवेश करने के लिए अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। यह बुरे वक्त का मामला था और बैंक के ग्राहक अपना पैसा निकालने लगे थे, क्योंकि उन्हें बैंक के बारे में थोड़ी-बहुत चिंताजनक खबरें सुनने को मिलने लगी थीं।


आम तौर पर, जो बैंक सुरक्षित बॉन्ड में निवेश करते हैं, उन्हें समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है, खासकर जब वे इन्हें परिपक्वता अवधि तक रखते हैं। लेकिन जैसे ही बैंक के ग्राहकों ने नकदी निकालना शुरू किया, एसवीबी को बॉन्ड को कम दर पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे इसकी कीमत प्रभावित हुई।


एसवीबी की मूल कंपनी-एसवीबी फाइनेंशियल ग्रुप ने घोषणा की थी कि उसने अपने पोर्टफोलियो में से 21 अरब डॉलर की प्रतिभूति बेचीं और वह अपना वित्त बढ़ाने के लिए 2.25 अरब डॉलर की शेयर बेच रही थी। चूंकि कई स्टार्ट-अप्स इसके बैंकिंग ग्राहक थे, एसवीबी को एक अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि इनमें से कई कंपनियां उद्यम पूंजी (वेंचर कैपिटल) और प्राइवेट इक्विटी के माध्यम से सीमित धन प्रवाह के कारण डूबने लगीं। चूंकि अनेक स्टार्ट-अप्स को कोविड का नतीजा भुगतना पड़ा, जिसके कारण उनके लिए फंडिग करना घाटे का सौदा बन गया। नतीजतन उनके पास सिर्फ रिजर्व राशि बची रह गई, नतीजतन उन्हें बैंक से नकदी निकालने के लिए विवश होना पड़ा।


सिलिकॉन वैली बैंक द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, दिसंबर, 2022 तक उसके पास कुल संपत्ति के रूप में 209 अरब डॉलर और कुल जमा के तौर पर 175.4 अरब डॉलर थे। लेकिन संकट के समय जहां दूसरे बैंकों से जमाराशि निकालने की सीमा तय की जाती है, उसी तरह एसवी बैंक के ग्राहक भी अधिकतम 2,50,000 डॉलर ही निकाल सकते हैं। जाहिर है, यह कोई बड़ी राशि नहीं है, खासकर तब, जब इस बैंक के ग्राहक वे स्टार्ट अप्स हैं, जिन्हें किसी कंपनी की सारी हिस्सेदारी खरीद लेने और रणनीतिक निवेश के लिए हमेशा पैसे चाहिए। अब जब बैंक के लिए परिस्थिति संभालना मुश्किल हो गया, तब कैलिफोर्निया डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल प्रोटेक्शन ऐंड इनोवेशन ने इस बैंक को बंद कर दिया और एफडीआईसी (फेडरल डिपोजिट इन्श्योरेंस कॉर्प) को रिसीवर घोषित कर दिया।


एफडीआईसी ने डिपॉजिट इन्श्योरेंस नेशनल बैंक ऑफ सांटा क्लैरा नाम का बैंक बनाया, जिसमें एसवीबी के जमाकर्ताओं के पैसे सुरक्षित हैं, और सोमवार सुबह से जमाकर्ताओं की अपने बैंक खातों तक पहुंच भी हो गई है। सोमवार से विनियंत्रक की निगरानी में एसवीबी बैंक की शाखाएं भी खुल गई हैं। 11 मार्च को जो नियम जारी किया गया, उसके अनुसार, जमाकर्ताओं की बीमित राशि-यानी 2,50,000 डॉलर तो सुरक्षित है। उससे अधिक की राशि सुरक्षित नहीं भी हो सकती है-यानी डूब सकती है।
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दरअसल यह एक बैंक के फेल हो जाने का मामला है, क्योंकि जिस तरह का काम वह करता था, वह जोखिम भरा था। बेशक बैंकों के संचालन पर विनियंत्रक की नजर रहती है, लेकिन ग्राहकों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि इस तरह के बैंकों में पैसे रखने के जोखिम भी हो सकते हैं। भारत में बैंकों के इस तरह डूब जाने के उदाहरण नहीं हैं, और ऐसी स्थिति आने पर भारतीय बैंकों के विनियंत्रक-यानी रिजर्व बैंक और सरकार ग्राहकों के हितों की रक्षा करने के लिए आगे आते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में हमारे यहां येस बैंक और पीएमसी बैंक के दिवालिया होने के मामले आए हैं।


एसवीबी जैसे खास तरह के बैंकों से जुड़ने वाले स्टार्ट-अप्स के लिए यह सबक है कि ऐसे बैंकों के साथ जोखिम भी जुड़े होते हैं, जो उनके व्यवसाय और उद्यम को चौपट कर सकते हैं। बैकों में पैसा रखने वाले ग्राहकों के लिए भी यह सबक है कि एक ही बैंक पर निर्भर रहने के बजाय, जिससे भविष्य में समस्या हो सकती है, उन्हें अपनी जमाराशि विभिन्न बैंकों में रखनी चाहिए। उतना ही जरूरी यह है कि आसान कर्ज के वादों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय ग्राहक बैंकों की गतिविधियों पर भी नजर रखें और देखें कि जहां उन्होंने अपनी जमाराशि रखी है, वह बैंक सुरक्षित है भी या नहीं।    

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