फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कोरोना: महामारी के दौर में मानवता, स्वार्थ के बीच इंसानियत की भी मिसाल

तस्लीमा नसरीन Published by: तस्लीमा नसरीन Updated Wed, 19 May 2021 03:54 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
कोरोना वायरस से मौतें - फोटो : पीटीआई

कोविड से बचने की खातिर वैक्सीन लेने और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए लोग अब तत्पर हो उठे हैं। हालांकि यह देखना आश्चर्यजनक है कि इस बीच अनेक ऐसे लोग हैं, जो मानते हैं कि शरीर में गोबर मलने और गोमूत्र पीने से कोरोना वायरस से मुक्ति मिल जाएगी। बहुत लोगों को यह भी विश्वास है कि गंगा में नहाने भर से कोरोना खत्म हो जाएगा। महामारी को खत्म करने के लिए तरह-तरह की कोशिश करने के बाद भी लोग कोरोना से आक्रांत हो रहे हैं। इसके बावजूद गोबर या गोमूत्र के प्रति कुछ लोगों का भरोसा जरा भी नहीं डिग रहा। सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ नामचीन लोगों को भी कोरोना के खिलाफ गोबर और गोमूत्र की बात करते हुए देखा जा रहा है, जो बहुत ही आश्चर्यजनक है। अनेक जगह गोशालाओं में भी भीड़ बढ़ रही है। कोविड को दूर भगाने के लिए अनेक लोगों को देह में गोबर लगाते, गाय के दूध से स्नान करते और गोमूत्र पान करते हुए देखा जा रहा है। 



किसी चीज के प्रति विश्वास ही मनुष्य से अविश्वसनीय चीजें करवा लेता है। ऐसे लोगों पर तरस आता है। अगर ये लोग विज्ञान में विश्वास करते, तो ऐसी बातें कतई न करते। इस प्रवृत्ति को देखकर वैज्ञानिक समुदाय सक्रिय हुआ है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष का कहना है कि 'गोबर या गोमूत्र रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है। गोबर या गोमूत्र से शरीर में नई बीमारियां पैदा हो सकती हैं, इस दिशा में हमें सतर्क रहना होगा।' मैं नहीं जानती कि आईएमए के अध्यक्ष की बातों का जमीनी स्तर पर कितना असर होगा। अगर इसका वाकई लोगों में कोई असर होगा, तो वे मास्क लगाने के प्रति गंभीर होंगे और शारीरिक दूरी बनाए रखेंगे। 


कोई माने या न माने, कुंभ, चुनावी प्रचार और कोविड की दूसरी लहर ने ही महामारी को इतना भीषण बनाया है। ऐसे में, समुचित तैयारी न होने के कारण मरीजों के लिए बेड और ऑक्सीजन का इंतजाम न होने, अस्पतालों में ऑक्सीजन के अभाव में मरीजों के मारे जाने, श्मशानों में लंबी कतार लगने, कोविड से मृत लोगों का ठीक ढंग से अंतिम संस्कार न हो पाने और गंगा नदी में लाशों को फेंक देने जैसे मर्मांतक ब्योरे आए हैं। आज वैक्सीन लेने के बाद भी लोग संक्रमित हो रहे और मर रहे हैं। सबसे भयावह यह है कि वैक्सीन का दो डोज लेने के बाद भी कुछ लोगों के संक्रमण से मरने की सूचनाएं आई हैं। जिस दिल्ली में मैं रहती हूं, वहां कुछ दिन पहले तक भी मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए श्मशानों में जगह कम पड़ रही थी। 


नतीजतन कई जगह पार्कों में अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। कोविड की पहली लहर में भारत में इतनी मौतें नहीं हुई थीं, जितनी दूसरी लहर में हो रही हैं। लोगों के अस्पतालों में, अस्पतालों के बाहर, सड़क पर, घरों, कार और ऑटो रिक्शा तक में मारे जाने के विवरण आए हैं। यह न सिर्फ महामारी की भीषणता का परिचायक है, बल्कि इसका भी परिचायक है कि ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवा के ध्वस्त हो जाने का क्या नतीजा होता है। भारत में महामारी के मौजूदा दृश्य 1918 के स्पैनिश फ्लू की याद दिलाते हैं। तब भी बीमारों के संपर्क में आने वाले परिजन बीमार होकर मारे गए थे, तब भी चिता जलाने के लिए लकड़ियों की भारी कमी हुई थी और तब भी नर्मदा नदी में असंख्य लाशें फेंक दी गई थीं।


दुख और संताप के इस दौर में भी यह देखकर थोड़ा अच्छा लगा कि कुछ मुस्लिमों ने हिंदुओं के अंतिम संस्कार में मदद की। कोरोना वायरस लोगों को धार्मिक आधार पर निशाना नहीं बनाता। मुस्लिमों के जमावड़े पर जिस तरह कोविड का हमला हुआ, उसी तरह हिदुओं और ईसाइयों के धार्मिक समूहों पर भी हुआ। कोविड के इस दु:समय में लोग एक दूसरे के बगल में खड़े नहीं होंगे, तो फिर कब खड़े होंगे? मनुष्यता के इस कठिन समय में लोग ईर्ष्या, घृणा, सांप्रदायिकता और जातिभेद नहीं भूलेंगे, तो फिर कब भूलेंगे? लेकिन यह मान लेना भोलापन ही होगा कि महामारी के कारण समाज में सांप्रदायिक सोच खत्म हो गई है। वह अब भी है और आगे भी रहेगी। 


सांप्रदायिकता की सोच के बीच कश्मीर में एक अद्भुत घटना हो गई। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में चमनलाल पंडित नाम के सत्तर साल के एक कश्मीरी ब्राह्मण रहते थे। बीती सदी के नौवें दशक में मुस्लिम आतंकवादी जब कश्मीर से पंडितों को भगा रहे थे, तब चमनलाल पंडित ने कश्मीर छोड़ने के बजाय अपने पूर्वजों की जमीन पर रहना पसंद किया। चूंकि उनके परिजन कम ही थे, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद मुस्लिम पड़ोसियों ने उनका अंतिम संस्कार किया। चमनलाल पंडित के मुस्लिम पड़ोसियों का कहना था कि उनका अंतिम संस्कार तो हमें ही करना है, क्योंकि वे हमारे ही लोग थे। अगर यही सोच कश्मीर के तमाम मुसलमानों में होती, तो कश्मीरी पंडितों को घाटी से बाहर जाने के लिए मजबूर न होना पड़ता। 


उदारता का लोप होने से ही मनुष्य में स्वार्थ, लालच, ईर्ष्या और घृणा की भावना बढ़ती है। उदारता की शिक्षा बचपन में ही मिलती है। इसके लिए वैसे माहौल की जरूरत है, जिसका आज दुर्योग से अभाव ही ज्यादा दिखाई देता है। उदारता की इस शिक्षा से मानवता की भावना पैदा होती है। और मानवता की यह भावना ही हम मनुष्यों को बर्बरता और पाशविकता से दूर रख सकती है। भारत में महामारी के इस चरम दु:समय में जब ऑक्सीजन के अभाव में लोग तड़प रहे हैं, जब ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी करते हुए आए दिन लोग पकड़े जा रहे हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपनी जेब से पैसे खर्च कर अनजाने मरीजों के लिए ऑक्सीजन खरीद रहे हैं, संक्रमितों के लिए भोजन का इंतजाम कर रहे हैं। इस पृथ्वी पर हमेशा ही दो तरह के लोग होते आए हैं-अच्छे और बुरे। समाज में अच्छी और उदार सोच वाले लोगों के बढ़ने का लाभ है। तब यह पृथ्वी हमारे रहने के अनुकूल होती है। महामारी के इस दौर में मानवता की जरूरत कहीं ज्यादा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next