फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दुविधा में दोनों बड़े दल

Tue, 05 Feb 2013 12:29 AM IST
नीरजा चौधरी
विज्ञापन
विज्ञापन
बीते दिनों सत्तारूढ़ कांग्रेस एवं मुख्य विपक्षी दल भाजपा, दोनों पार्टियों ने 2014 के चुनाव की तैयारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कांग्रेस ने जहां राहुल गांधी का कद बढ़ाकर उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया, वहीं अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत भाजपा ने राजनाथ सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया।
विज्ञापन


उपाध्यक्ष बनने के बाद अपने पहले भाषण में राहुल ने जयपुर में अपने पार्टी नेताओं के साथ भावनात्मक रिश्ता जोड़ा, जिसके चलते कई नेताओं के आंसू छलक पड़े। वह न केवल अपने असमंजस के बारे में खुलकर बोले, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि कैसी कांग्रेस वह चाहते हैं। राहुल के सामने चुनौतियां विकट हैं। उन्होंने ऐसे वक्त में पार्टी की कमान संभाली है, जब घोटालों एवं महंगाई पर अंकुश लगा पाने में सरकार की विफलता के कारण कांग्रेस की छवि खराब है।

उनका मूल्यांकन इसी आधार पर किया जाएगा कि इस वर्ष जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है। सामान्य तौर पर कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को रक्षात्मक रहने पर मजबूर करने में सक्षम है, लेकिन दोनों राज्यों में स्पष्ट नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस की भी राह आसान नहीं है।
विज्ञापन


दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस को सत्ता विरोधी रुझान से जूझना पड़ रहा है, हालांकि दक्षिण राज्य कर्नाटक में उसके लिए अवसर है। देश के बड़े राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल में पार्टी को पुनर्जीवित करने की दीर्घकालीन चुनौती भी बाकी है। एक बार फिर तेलंगाना मसले पर फैसला स्थगित करने के कारण आंध्र प्रदेश में पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है। जबकि इसी राज्य ने 2004 एवं 2009 में पार्टी को सत्ता में पहुंचाया था।

राहुल की स्वाभाविक अपील युवा मतदाताओं के लिए है, क्योंकि देश की 65 फीसदी आबादी युवा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि 2009 में यूपीए की जीत के पीछे युवाओं की बड़ी भूमिका थी। पर इस बात के लिए राहुल की काफी आलोचना हुई कि न तो वह अन्ना के आंदोलन में शामिल थे और न ही तब उनकी सक्रियता दिखी थी, जब 23 वर्षीय युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के प्रतिरोध में युवा लोग स्वतःस्फूर्त सड़कों पर उतरे थे। कहा जाता है कि स्थिति अब भी बिल्कुल अनिश्चित है और काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि विरोधी खेमे में चीजें कैसे आकार लेती हैं।
 
हालांकि भाजपा और एनडीए में नेतृत्व का सवाल अब भी हल नहीं हुआ है। नीतीश कुमार जहां नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का खुलकर विरोध कर रहे हैं, वहीं शिवसेना सुषमा स्वराज का नाम उछाल रही है। इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाने के लिए भाजपा के अंदर घटनाओं को धीरे-धीरे गति देना चाहते हैं।

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ मोदी की मुलाकात के अगले ही दिन पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के पक्ष में बयान दिया। यों भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी राजनाथ से बात की, मगर मोदी की उनके साथ हुई लंबी बातचीत ही सुर्खियां बनीं।

मोदी ने भी इसका लाभ उठाने, दबाव बढ़ाने और खबरों में रहने के लिए इस्तेमाल किया। इसमें मोदी माहिर भी हैं। बाद में राजनाथ सिंह ने स्वीकार किया कि मुलाकात के दौरान उन्होंने मोदी की बड़ी भूमिका के बारे में चर्चा की। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में ऐसी भावना बढ़ रही है कि मौजूदा स्थिति में मोदी पर दांव लगाना अच्छा रहेगा, क्योंकि वह वोट बटोर सकते हैं। लेकिन इस बारे में फैसला पार्टी और उसके वरिष्ठ नेता ही लेंगे।

हाल के महीनों में मोदी ने गांधीनगर से दिल्ली की प्रस्तावित यात्रा की कई बाधाएं पार कर ली हैं। कॉर्पोरेट घराने स्पष्ट तौर पर उनका नाम उछाल रहे हैं। पश्चिमी देशों ने 2002 के दंगों में उनकी भूमिका को लेकर अपनी आपत्तियां छोड़ दी हैं। संघ के आला नेता पुराने विरोध को त्यागकर उन्हें भाजपा का एकमात्र तुरुप का पत्ता मानने को तैयार हैं, क्योंकि वह पार्टी और संघ परिवार की छवि से बड़े होकर उभरे हैं।

भाजपा कार्यकर्ता तो उनको लेकर उत्साहित हैं ही। लेकिन उन्हें कई बाधाएं अभी पार करनी हैं। उन्हें न केवल पार्टी से बाहर, बल्कि भीतर भी अपनी छवि सुधारनी होगी और स्वयं को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए स्वीकार्य बनाना होगा। उन्हें न केवल टकराव की मुद्रा से परहेज करना होगा, बल्कि पार्टी के आला नेताओं को भरोसे में लेना होगा कि वह पार्टी को आगे ले जा सकते हैं।

मौजूदा स्थिति की विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार और सुशासन के मुद्दे का लाभ उठाने के लिए भाजपा के पास सब कुछ है। वह मोदी की दृढ़ छवि को पेश कर सकती है, क्योंकि उनके खिलाफ ऐसे कोई आरोप नहीं हैं। मगर जब ऐसा ध्रुवीकरण होगा, तो उसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। यदि पहले 20 में से दस मुसलमान वोट देने निकलते थे, तो मोदी के भाजपा की अगुआई करने की स्थिति में 20 में से 19 मुसलमान वोट देने निकलेंगे। हालांकि कांग्रेस को इसमें सावधानी बरतनी होगी। उसे ध्रुवीकरण की कोशिश करते दिखने से बचना होगा, क्योंकि इससे उसके हाथ से बहुसंख्यक वोट खिसक जाएंगे।
 
दूसरी विडंबना यह है कि कांग्रेस यदि अगले लोकसभा चुनाव में 150 सीट जीतने में सफल हो जाती है, तो वह क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार बना सकती है और वह कोई और मनमोहन सिंह तलाश लेगी। दूसरी ओर भाजपा को 180 सीट जीतने पर भी इसमें मुश्किल आएगी। नरेंद्र मोदी को अपनी दावेदारी के लिए पार्टी को 200 सीटें जितानी पड़ेंगी, अन्यथा भाजपा किसी अन्य को चुन लेगी। यही वजह है कि लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की उम्मीदें जिंदा हैं।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें