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पुलिस तंत्र के तले सिसकता जनतंत्र

Tue, 05 Feb 2013 12:26 AM IST
लक्ष्मीकांता चावला
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लगता तो यह है कि देश का आम आदमी महंगाई और भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त है, लेकिन सच्चाई यही है कि पुलिस तंत्र के डरावने एवं क्रूर रवैये के सामने तो भूख, महंगाई और भ्रष्टाचार को भी लोग भूल जाते हैं। आम आदमी को पुलिस का अमानवीय रूप कदम-कदम पर डराता है।
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हाल ही में बिहार के शेखपुरा जिले में एक 22 वर्षीय युवक को हिरासत में लेकर पुलिस ने उसके साथ बर्बर व्यवहार किया। इस घटना पर मचे बवाल के बाद मुख्यमंत्री ने पुलिस अधीक्षक समेत 14 पुलिस कर्मियों को या तो निलंबित या फिर स्थानांतरित कर दिया। पीड़ित युवक अभी अस्पताल में मौत से जूझ रहा है।
 
यह कोई अकेली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं कमोबेश देश के विभिन्न राज्यों में अक्सर होती रहती हैं। अमृतसर के अजनाला के निकट नंगली गांव में एक युवक को अपराधियों ने बुरी तरह पीट दिया। जब वह तड़प-तड़प कर पानी मांग रहा था, तो उसके मुंह पर एक आरोपी ने पेशाब कर दिया। लेकिन सत्ता संरक्षित होने के कारण पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कुछ नहीं किया।
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पिछले सप्ताह जालंधर के फिल्लौर क्षेत्र में एक आरोपी ने हवालात में अपने साथ हुए बर्बर पुलिस यातना का जिस तरह रो-रोकर वर्णन किया, उससे यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं और क्या यह एक वैसे मुल्क की पुलिस है, जहां सबको सम्मान के साथ जीने की आजादी संविधान ने दी है।

अपने देश की पुलिस आम जनता की रक्षक कम भक्षक ज्यादा है। वह सत्तापतियों एवं दबंग किस्म के लोगों के हाथों की कठपुतली बनी हुई है। मुझे छोटे रैंक के पुलिसकर्मियों से उतनी ज्यादा शिकायत नहीं है, जितनी पुलिस तंत्र के उच्चाधिकारियों से है। कनिष्ठ पुलिसकर्मी तो अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार ही काम करता है।

जब कोई सशक्त सत्तापति किसी श्रुति का हथियार के बल पर अपहरण करता है, तब पुलिस को जैसे काठ मार जाता है, लेकिन जब कोई गरीब व्यक्ति इनके चंगुल में फंस जाता है, तो वे अपनी सारी शक्ति उसे बेहाल करने में लगा देते हैं। पटियाला के बादशाहपुर गांव की एक बलात्कार पीड़िता की तो शिकायत दर्ज करने में ही पुलिस ने दो सप्ताह का समय लगा दिया। इतना ही नहीं, उसे समझौता करने और पैसे लेकर चुप रह जाने के लिए भी विवश किया गया।

हमारे देश के कानून के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटों के भीतर न्यायालय में पेश करने का नियम है, लेकिन कौन नहीं जानता कि हिरासत में लेकर गरीबों एवं निचले तबके के व्यक्तियों का पुलिस कितना उत्पीड़न करती है। दुनिया भर में हमारी पुलिस बर्बर उत्पीड़न के लिए बदनाम हैं। अक्सर मानवाधिकारवादी संस्थाएं इसके लिए पुलिस की आलोचना करती है।

हमारी न्याय व्यवस्था के रखवालों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन आरोपियों को पुलिस रिमांड में भेजा जाता है, उनके साथ अमानवीय बर्ताव न हो। फिल्लौर पुलिस की हिरासत में फंसे आरोपी ने पुलिस द्वारा अपने साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है, इसकी व्यापक जांच होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। पुलिस का यह रवैया नाबालिग आरोपियों के साथ भी उसी तरह ही क्रूर एवं बर्बर होता है। लुधियाना के दो बच्चों को पुलिस ने जिस ढंग से बिजली के करंट लगाए, उससे तो शर्म भी शर्मिंदा हो जाती है।

समय के साथ सारी चीजें बदल गईं, लेकिन नहीं बदला तो हमारी पुलिस का रवैया। आज भी चौक-चौराहे में खड़ा कोई भी पुलिसकर्मी किसी भी व्यक्ति को गाड़ी से बाहर खींच सकता है, थप्पड़ मार सकता है, गाली दे सकता है और नोट भी ले सकता है। इसका सीधा कारण है कि ऐसे पुलिस को नेताओं का संरक्षण हासिल है। उन्हीं की कृपा से पुलिस को मनचाहे स्थान पर पोस्टिंग मिलती है, इसलिए वे नेताओं के प्रति ही वफादारी दिखाते हैं।

आज आम आदमी बदलाव की मांग कर रहा है, इसलिए बदलाव के कानूनों में नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र एवं न्यायिक प्रक्रिया में भी होनी चाहिए। खासकर पुलिस की भर्ती, प्रशिक्षण एवं उसके कामकाज में बदलाव लाने की बहुत बड़ी जरूरत है, इसके बिना आम आदमी के साथ न्याय हो पाना मुश्किल है।
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