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पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

Sun, 27 Jul 2014 04:49 PM IST
नीरजा चौधरी
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भारतीय राजनीति का जो स्वरूप खटकता है, वह है गैरजरूरी चीजों का अचानक मुद्दा बन जाना। जैसे कि एक दिन 'रोजे में रोटी' सुर्खियां बनती है, तो अगले एक-दो दिनों में सानिया मिर्जा का मामला उछलता है। बेशक, ये मामले चाय के प्याले में तूफान जैसे साबित होते हैं, पर जब तक वे खत्म नहीं होते, तब तक भावनाओं को भड़काते हैं, पूर्वाग्रह या पक्षपात को बढ़ाते हैं और मीडिया को ब्रेकिंग न्यूज मुहैया कराते हैं।
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पैसे चुकाने के बावजूद घटिया रोटी परोसने पर किसी का भी नाराज होना स्वाभाविक है। दिल्ली के न्यू महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के सांसदों का गुस्सा होना इसीलिए आश्चर्यजनक नहीं था। पर ऐसी स्थिति में प्रबंधन को शिकायत करने का विकल्प मौजूद था। इसके बजाय एक सांसद ने खान-पान प्रबंधक को पकड़ा और उसके मुंह में रोटी ठूंस दी। जबकि वह बार-बार कह रहा था कि उसने रोजा रखा है। यह उदाहरण राजनेताओं के प्रति हमारी वितृष्णा के बारे में बताता है। इन्हीं वजहों से उन्हें 'नए महाराजा' कहा जाता है। जिस तरह वे चाहते हैं, अगर उस तरह उनकी सेवा नहीं की गई, तो जिस भी तरीके से चाहे, प्रतिक्रिया जताना वे अपना अधिकार समझते हैं और यह भी अपेक्षा रखते हैं कि उनके तौर-तरीकों की आलोचना न हो। यह और कुछ नहीं, सामंती मानसिकता है।

भाजपा, यहां तक कि शिवसेना नेतृत्व ने भी, उस सांसद की करतूत से खुद को अलग कर लिया, पर उसकी कठोर निंदा नहीं की। यह रवैया उस देश के चरित्र से मेल नहीं खाता, जो हर पंथ के लोगों को गरिमा और स्वतंत्रता के साथ अपने धर्म का पालन करने की सांविधानिक गारंटी देने पर गर्व करता है।
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उसके बाद सानिया मिर्जा का प्रकरण सामने आया। तेलंगाना में भाजपा विधायक दल के नेता के लक्ष्मण ने राज्य सरकार से सवाल किया कि उसने टेनिस स्टार को अपना ब्रांड एंबेसडर क्यों नियुक्त किया है। उन्होंने सवाल किया कि एक 'पाकिस्तानी बहू' को (सानिया मिर्जा ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी की है) यह सम्मान कैसे दिया जा सकता है। कुछ लोगों ने उसे 'धरती की बेटी' कहे जाने पर भी आपत्ति जताई, क्योंकि सानिया के पिता महाराष्ट्र से तेलंगाना आए थे। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के फैसले के आलोचकों का तर्क यह भी था कि सानिया ने तेलंगाना के लिए कुछ नहीं किया है।

एक ऐसे देश में इन तर्कों का कोई मतलब नहीं है, जो हर किसी को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने और देश में कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसा भी नहीं है कि सानिया पाकिस्तानी बन गई हैं और उन्होंने पाकिस्तान की नागरिकता कबूल कर ली है। वह अब भी भारतीय नागरिक हैं। अन्य राज्यों ने भी अपने-अपने ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किए हैं, जिन पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। मसलन, अमिताभ बच्चन गुजरात के, तो शाहरुख खान पश्चिम बंगाल के ब्रांड एंबेसडर हैं। बेशक यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि तेलंगाना के लिए सानिया मिर्जा का क्या योगदान है। एक नए राज्य के ब्रांड एंबेसडर के रूप में उनके चयन का मापदंड क्या था-नए तेलंगाना राज्य के निर्माण के लिए हुए आंदोलन में उनकी भागीदारी या तेलंगाना के नागरिक के रूप में हासिल की गई उनकी उपलब्धियां?

दो बार ग्रैंड स्लैम विजेता रह चुकी सानिया दुनिया भर में युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत मानी जाती हैं। वर्ष 2006 में भारत के दौरे पर आए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दिल्ली स्थित पुराना किला में भाषण देते हुए कहा था, 'मैं सानिया मिर्जा के नगर हैदराबाद की यात्रा के बाद यहां आया हूं।' पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर में सानिया मिर्जा ने ही हैदराबाद को वैश्विक पहचान दी।

सच कहें, तो सानिया की आलोचना से लैंगिक भेदभाव की भी बू आती है। उनका आकलन एक व्यक्ति के रूप में उनकी अपनी उपलब्धियों के आधार पर नहीं, बल्कि किसी की पत्नी के रूप में हो रहा है। बात उनके पति तक इसलिए जा रही है, क्योंकि वह संयोग से पाकिस्तानी हैं। सानिया का मूल्यांकन एक युवा मुस्लिम महिला के रूप में भी नहीं हो रहा, जबकि देश की मुस्लिम लड़कियां शिक्षा, पोषण और कई अन्य मामलों में बहुत पीछे हैं।

विवाद बढ़ने पर भाजपा ने के लक्ष्मण के बयान से किनारा जरूर कर लिया, पर उसने इसकी ठोस निंदा नहीं की। पार्टी ने यह कहते हुए तस्वीर साफ करने की कोशिश की कि सानिया की उपलब्धियों पर उसे भी गर्व है, पर उन्हें तेलंगाना का ब्रांड एंबेसडर बनाकर राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति कर रही है, क्योंकि जल्दी ही ग्रेटर हैदराबाद में नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं। पर इस तर्क के आधार पर तो कोई मुस्लिम कभी किसी पद पर नियुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि देश में हमेशा कोई न कोई चुनाव होते ही रहते हैं! कभी पंचायत चुनाव होते हैं, कभी जिला परिषद, कभी विधानसभा, तो कभी लोकसभा चुनाव होते ही रहते हैं। हालांकि सच यह भी है कि सानिया कट्टरपंथी मुसलमानों को भी बमुश्किल ही पसंद आई हैं। अगर मुसलमानों की वह आदर्श होतीं, तो खेल के दौरान छोटे स्कर्ट पहनने पर कट्टरपंथियों द्वारा विवाद नहीं खड़ा किया जाता।

बहरहाल, सानिया मिर्जा प्रकरण अथवा रोटी-रोजा विवाद पनपने और उस पर भाजपा और शिवसेना की प्रतिक्रिया से यह सवाल खड़ा होता है कि कहीं ये पार्टियां दोहरी राजनीति को प्रश्रय तो नहीं दे रहीं। क्या वे नेताओं को इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणी करने के लिए बढ़ावा तो नहीं दे रहीं, जिससे ध्रुवीकरण बढ़े? यह सवाल इसलिए गंभीर हैं, क्योंकि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में चुनाव होने वाले हैं।
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