श्यामा देवी की अध्यक्षता में सभा हुई और पेड़ों की सुरक्षा का प्रण दोहराया गया। शिशुपाल कुंवर तथा अनुसूया प्रसाद लगातार साथ थे। महिलाएं सफलता मिलने के बाद ही अपने घर वापस लौटीं। यह अगले साल रेणी में होने वाले प्रतिरोध का पूर्व संकेत था। लेकिन महिलाओं के लिए यह नई बात नहीं थी। कुछ ही साल पहले शराबबंदी आंदोलन में वे हिस्सेदारी कर चुकी थीं। चमोली में सक्रियता ज्यादा थी। वहां की महिलाएं टिहरी और गिरफ्तारी के बाद सहारनपुर जेल गईं। ग्रामीणों और कार्यकताओं की सावधानी, सक्रियता और सुसंगठन से मैखंडा जंगल के ज्यादा पेड़ बच गए।
मंडल के बाद चिपको का दूसरा प्रतिरोध भी सफल रहा। यह कार्यकताओं की मेहनत और ग्रामीणों की समझ की बदौलत हुआ। चिपको के पहले प्रतिरोधों में ग्रामीणों के साथ चंडीप्रसाद भट्ट, आनन्दसिंह बिष्ट, शिशुपाल कुंवर, मुरारीलाल, केदारसिंह रावत, श्यामादेवी आदि का प्रत्यक्ष योगदान रहा। सुंदरलाल बहुगुणा 25 अक्तूबर से चार महीने की पदयात्रा पर निकल चुके थे। अभी जंगल की लड़ाई को उत्तरकाशी, नैनीताल और अन्य जगहों तक जाना था। फाटा की जीत से आंदोलन को ज्यादा गहराई और विस्तार मिला। सरकार ने चिपको आंदोलन के प्रतिनिधि को लखनऊ में बुलाकर उन्हें नई वन नीति हेतु सुझाव देने को कहा। दूसरी ओर, उनके इलाके में कटान-छपान जारी रखा। न सरकारी नीति बदली और न आंदोलनकारी ही। फाटा में चार पेड़ों का कटान हुआ, पर अगली नीलामी के लिए छपान जारी था। तभी रेणी तथा अन्य जंगलों की नीलामी की सूचना मिली। उधर उत्तराखंड के सात जिलों की 23 लीसा इकाइयां बंद थीं।
1,800 क्विंटल लीसे का नीलाम 150-155 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से हुआ। लेकिन यह स्थानीय इकाइयों को 180 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर मिला। पर अभी तो लीसा नहीं, रेणी की नीलामी महत्वपूर्ण थी। नवंबर, 1973 के प्रारंभ में गोविंद सिंह, चंडीप्रसाद, हयातसिंह, वासवानंद तथा जगतसिंह केरणी आदि जोशीमठ-रेणी के बीच के गांवों की यात्रा कर चुके थे। दिसंबर, 1973 में गोविन्द सिंह, हयातसिंह, वासवानंद आदि गांवों में जाते रहे। गोविंद सिंह ने तब ‘आ गया है लाल निशान, लूटने वालो हो सावधान’ नारे वाला ‘चिपको आंदोलन का शुभारंभ’ पर्चा निकाला। इसमें पहाड़ों को उपनिवेश बनाने और यहां की संपदा की लूट के विरोध के साथ संगठित होकर वनाधिकार प्राप्त करने का आग्रह था। फाटा से रेणी प्रतिकार के लिए ऊर्जा मिली। इलाके में कार्य जारी था।
चंडीप्रसाद ने सर्वोदय मंडल के निर्णयानुसार देहरादून जाना उचित समझा, जहां जंगलों की नीलामी होने वाली थी। हालांकि, चंडीप्रसाद शहरों में नीलामी के विरोध से असहमत थे। चिपको आंदोलन का पर्चा बनाकर वह देहरादून पहुंचे। उन्हें सीमा पता थी, पर संदेश ज्यादा लोगों तक जा सकता था। यह नीलामी के प्रतीकात्मक विरोध की शुरुआत थी। पर्चे में जंगलों का विनाश रोकने, नीलामी-ठेकेदारी प्रथा बंद करने, हक-हकूक बढ़ाने, श्रम समितियां बनाने, कच्चा माल बाहर न भेजने, वनवासियों को कच्चा माल-तकनीक-पूंजी मुहैया कराने हेतु चिपको आंदोलन को सफल बनाने की अपील थी। पर्चे के अंत में मार्मिक वाक्य थे: ‘यह तिलाड़ी का संदेश है, बेलाकूची (वह गांव, जो 1970 की बाढ़ में बहा) की बाढ़ में डूबने वालों का क्रंदन है और जंगल की अंधाधुंध कटाई से हर साल आने वाली बाढ़ों से तबाह होने वालों की पुकार है।’
दो जनवरी, 1974 को चंडीप्रसाद ने वन अधिकारियों से मानवीय, सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से नीलामी रोकने को कहा। रात को उन्होंने विद्यार्थी बृ. सिं. मनु निश्चिंत तथा लक्ष्मी प्रसाद नौटियाल के सहयोग से टाउन हॉल के आसपास कुछ पोस्टर चिपकाए। दोनों ने कहा कि नीलामी पर रोक लगाई जाए। पर सहमति नहीं बनी। गोपेश्वर से आए पर्चे के अनुसार पोस्टर बने और लगे।
तीन जनवरी, 1974 को चंडीप्रसाद देहरादून के टाउन हॉल के द्वार पर खड़े हो गए। पिछली शाम भी ठेकेदारों और मुंशियों से बात करने का प्रयास किया और बताया कि रेणी में चिपको आंदोलन चलेगा। ठेकेदार-मुंशी उनका मजाक उड़ाते रहे। वे उनको सिर्फ पोस्टर का इशारा करते। ठेकेदार-मुंशी उत्सुकता से पोस्टर पढ़ते और फिर व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ भीतर जाते। टाउन हॉल के भीतर नीलामी होती रही। रेणी का जंगल चार लाख 71 हजार रुपये में नीलाम हो गया। नीलामी के बाद सभी बाहर आ रहे थे, तो चंडीप्रसाद हॉल के भीतर गए और रेणी के ठेकेदार के मुंशी से मिले।
उन्होंने कहा कि अपने ठेकेदार को बता देना कि जब वे रेणी जंगल काटने आएंगे, तो उन्हें चिपको आंदोलन का मुकाबला करना पड़ेगा। ठेकेदार-मुंशियों की स्मृति में उस दिन ‘चिपको’ शब्द अटक गया। देहरादून से चंडीप्रसाद गोपेश्वर आए। दग्रास्वसं में मंत्री शिशुपाल सिंह, दयालसिंह, चक्रधर, दानसिंह, विश्वंभर रदत्त, सोबनसिंह तथा हयातसिंह से बातचीत की। साथियों को रेणी नीलामी की खबर भेजी। गोपेश्वर में अनेक विचार-विमर्श हुए। फरवरी, 1974 में फिर एक बार क्षेत्र की यात्रा गोविंद सिंह ने पुराने अंदाज में की। इस बार उनके साथ हयातसिंह, सुदर्शन कठैत, कामरेड सुदामा आदि थे। लाटा में उनकी सभा में ग्राम प्रधान जगतसिंह और महिला मंगल दल की अध्यक्षा मंगुलीदेवी सहित तमाम ग्रामीण उपस्थित हुए। अगले दिन रेणी में सभा हुई।
12 मार्च, 1974 को चंडीप्रसाद ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजा। मुख्यमंत्री से वार्ता, नई जंगलात नीति बनाने के बाबत विमर्श होने के बावजूद सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जोशीमठ-रेणी के इलाके में कार्यकर्ता आ-जा रहे थे। गोविंद सिंह का प्रधानों और आम जनता से सीधा संपर्क था। पिछले साल वे समस्त प्रधानों की ओर से पर्चा बांट चुके थे। पर्चे लगातार बांटे और पढ़े जा रहे थे। जनवरी तथा फरवरी 1974 में हर ओर तैयारी होती रही। जनता-आंदोलनकारी, ठेकेदार, जंगलात विभाग तथा लखनऊ की सरकार अपनी-अपनी तरह से इस तैयारी में जुटे थे। सब अपनी-अपनी रणनीति बनाने में संलग्न थे। पर्वतीय विकास निगम ने चंपावत और तिलवाड़ा में दो लीसा इकाइयां 15 फरवरी, 1974 से शुरू कीं। चमोली के गांवों में घोषणा पहुंच चुकी थी कि रेणी कटान के विरुद्ध 15 मार्च, 1974 को जोशीमठ में प्रदर्शन होगा।