हिमालयी देश में अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम ने भले ही प्रचंड की कुर्सी बचा ली हो, लेकिन यह भारत के लिए शुभ नहीं है। मालदीव में चीन समर्थक सरकार और पाकिस्तान से दुश्मनी के बीच नेपाल में चीन के प्रति वफादार कम्युनिस्टों के प्रभुत्व वाली नई सरकार का गठन इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव को कम करने वाला है।
विदेशी राजनीति के जानकारों के अनुसार, प्रचंड सत्ता में बने रहने की कला जानते हैं। नेशनल एसेंबली में नेपाली कांग्रेस के 89 और सीपीएन (यूएमएल) के 77 सांसद हैं, जबकि प्रचंड की पार्टी के सिर्फ 32 सांसद ही हैं। ओली की सीपीएन (यूएमएल) के सहयोग से प्रचंड वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री बने थे। दिसंबर, 2023 में ओली ने अपना समर्थन वापस ले लिया, लेकिन प्रचंड नेपाली कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने रहे।
दरअसल, पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रचंड का समर्थन करने से इन्कार कर दिया, जो उनके गठबंधन टूटने का मुख्य कारण बना था। अब नेपाली कांग्रेस के साथ गहरे मतभदों के चलते प्रचंड फिर से ओली के साथ आ गए हैं। हालांकि नेपाली कांग्रेस के साथ उभरे मतभेदों को सुलझाया जा सकता था। प्रचंड और देउबा ने मिलकर सात राज्यों में सरकारें बनाई थीं, अब उनका भविष्य भी खतरे में है। ओली के साथ आने और उनकी शर्तों की वजह से प्रचंड कमजोर पड़ गए हैं।
नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने प्रचंड पर विश्वासघात का आरोप लगाया है। प्रचंड ने भी नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं रखने की अपनी बेबसी जाहिर की है। अब देखना होगा कि कम्युनिस्ट विचारधारा वाले दोनों प्रतिद्वंद्वी (प्रचंड और ओली) नए गठबंधन को कैसे संभालते हैं।
जानकारों के अनुसार, प्रचंड और देउबा सरकार की ओर से नागरिकता विधयेक को मंजूरी देना भारत और अमेरिका से निकटता के रूप में देखा गया, जिससे चीन नाराज हो गया। दूसरा, 2022 में सत्ता संभालने के बाद प्रचंड ने चीन के बजाय अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना। इस दौरान दोनों देशों के बीच सात समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। यहां तक कि प्रचंड ने सीमा विवाद से भी बचने की कोशिश की। लेकिन अब परिदृश्य बदल गया है। प्रचंड और ओली, दोनों ही घोर कम्युनिस्ट हैं। इससे वहां चीन को वरीयता मिल सकती है।
भारत ने 2022 में अग्निवीर योजना शुरू की थी, जिसका विस्तार नेपाल तक होना था, लेकिन कुछ आपत्तियों के चलते यह आगे नहीं बढ़ सकी। जमीनी रिपोर्टों के अनुसार, बेरोजगार नेपाली युवा अग्निवीर के रूप में भारतीय सेना में भर्ती हो सकते हैं, लेकिन पिछली दोनों सरकारों ने इस पर कोई फैसला नहीं किया, तो तीसरी सरकार से भी ज्यादा उम्मीद नहीं है। भारतीय सेना ने 2022 में 40 हजार अग्निवीरों की भर्ती निकाली थी। सेना प्रमुख मनोज पांडे ने स्पष्ट कर दिया था कि नेपाल सरकार द्वारा यदि कोई निर्णय नहीं लिया गया, तो रिक्तियों को समाप्त किया जा सकता है। अब नई सरकार के लिए इसे स्वीकार या अस्वीकार करना बड़ी चुनौती होगा।
दरअसल अग्निवीर योजना का काठमांडु में कुछ सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने विरोध किया था। यह योजना 1947 में ब्रिटेन, भारत और नेपाल के बीच हुई त्रिपक्षीय संधि से विनियमित है। लेकिन नेपाल का मानना है कि अग्निवीर योजना उस संधि का उल्लंघन है। अब ओली की पार्टी इसमें बाधा बन सकती है, क्योंकि उसका रुख चीन की ओर हो सकता है, जो भारत को मंजूर नहीं होगा।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाली कांग्रेस का झुकाव भारत की ओर था, लेकिन प्रचंड और ओली के साथ आने से परिस्थितियां बदल गई हैं। अब भारत को नेपाल संबंधी अपनी नीति में बदलाव करना होगा, ताकि नेपाल से रिश्ते सामान्य बने रहें। दूसरा, प्रचंड के नई दिल्ली दौरे के दौरान जो ऊर्जा समझौता हुआ, उसको लेकर भी भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। कई वर्षों के गतिरोध के बाद हुए एक त्रिपक्षीय समझौते के अनुसार, भारत दस वर्षों के लिए नेपाल से 10,000 मेगावाट बिजली आयात करेगा। इससे भारत को हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा और हमारे देश को अतिरिक्त बिजली भी मिलेगी।
वहीं, नेपाल भारत के जरिये बांग्लादेश को 60 मेगावाट बिजली निर्यात करने में सक्षम होगा। इस समझौते से नेपाल भारत समेत अन्य देशों को बिजली बेचकर अपनी समृद्धि बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई कम्युनिस्ट सरकार इस बिजली समझौते को तोड़ सकती है, जो दोनों ही देशों के लिए लाभकारी हैा।
भारत विरोधी के रूप में कुख्यात ओली नेपाल को चीन के करीब ले जाने का प्रयास करेंगे। केपीएस ओली के प्रधानमंत्री रहते नेपाल और भारत के संबंध काफी खराब हो गए थे। लिपुलेख, कालापानी और लिमपियाधुरा का सीमा विवाद उभरा था, नेपाल ने इन क्षेत्रों को अपने नक्शे में दिखाया था, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था। भारत को इस मुद्दे पर भी नजर रखने की जरूरत है।
नेपाल के इस नए घटनाक्रम को देखते हुए भारत को अपनी सुरक्षा को लेकर भी सजग रहने की जरूरत है। एक अन्य गंभीर मुद्दा है चीन की महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव। इस मामले में कोई भी प्रगति हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है, क्योंकि नेपाल के साथ हमारी 1,770 किलोमीटर सीमा खुली है। चीन ने नेपाल में 1.34 अरब डॉलर का निवेश किया है, वह इस योजना को लागू करने के लिए नई सरकार पर दबाव बनाएगा।
नेपाल, मालदीव और पाकिस्तान को भारत से दूर करने के चीनी प्रयासों से भारत को सतर्क रहने की जरूरत तो है ही, इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका से सहयोग की नीति पर फिर से काम करने की जरूरत है, क्योंकि चीन का बढ़ता प्रभाव हमारे हित में नहीं है।