विभिन्न देश इन तनावों को भरपूर झेल रहे हैं, लेकिन उनके पास बहानों की कोई कमी नहीं है। वे अपने अहंकार में इस प्रकार डूबे हुए हैं कि जन से जुड़ने और उनकी सुनने को राजी ही नहीं होते। ऐसे में संघर्ष और तनाव के मुद्दे घटने के बजाय बढ़े ही हैं। उसी का परिणाम है कि आज विश्व की एक बड़ी आबादी युद्ध, संघर्ष, आंदोलन एवं अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है।
इसके कारणों को लेकर विश्व के मानवतावादी लोग चिंतित हैं। लग रहा है कि जो निवेश कल्याण के लिए होने थे, वे हथियारों की खरीद के लिए हो रहे हैं। मनुष्य की बुनियादी जरूरतों से ज्यादा हथियार जरूरी हो गए हैं। वस्तुतः हमारे आर्थिक निवेश मानवीय सरोकारों से भटक से गए हैं और इससे सामाजिक न्याय को बहुत धक्का पहुंचा है। सामाजिक न्याय के लिए हो रहे संघर्ष हमारे लिए एक सबक हैं। ये बताते हैं कि हमने अपना निवेश उस दिशा में नहीं किया, जहां किया जाना जरूरी था। यदि सामाजिक न्याय के मुद्दे को सही तरीके से निपटाया गया होता, तो शायद ऐसे दिन न देखने पड़ते। आज विश्व के तमाम राज्य ग्लानिबोध से ग्रसित हैं कि वे अपने नागरिकों की आशाओं पर खरे नहीं उतरे हैं।
जिन देशों में ग्लानिबोध है, उनसे सुधार की आशाएं की जा सकती हैं, लेकिन सामाजिक न्याय के मार्ग से दूर हो चुके देशों का क्या होगा, यह एक बड़ा सवाल है। अफगानिस्तान में स्त्रियों के हालात अच्छे नहीं हैं, जबकि अफगानिस्तान भी खुद को कल्याणकारी मुल्क बताता है। वह कभी नहीं मानता कि उनके यहां स्त्रियों की स्थिति ठीक नहीं है और उन्हें शिक्षा व रोजगार की स्वतंत्रता नहीं है। ईरान में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं। युद्धरत देश भी कभी यह नहीं स्वीकार करेंगे कि उनके युद्ध लड़ने से आम लोगों को व्यापक नुकसान पहुंचा है। ये देश सामाजिक न्याय क्या करेंगे?
जून 2023 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सामाजिक न्याय के लिए वैश्विक गठबंधन बनाने की बात की थी। उस गठबंधन से यह उम्मीद की थी कि इससे दुनिया के लोग टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाएंगे, चुनौतियों से निपटेंगे। उनका यह मानना था कि यह पहल सामाजिक अनुबंध को फिर से तैयार करने पर लक्षित है, जिसे व्यक्ति-आधारित नीतियों से हासिल किया जाएगा और इन प्रयासों में सामाजिक न्याय पर विशेष बल दिया जाएगा। लेकिन उसे कितना अमल में लाया गया? उनके सामाजिक अनुबंध का आधार भी राज्य थे और उनका लक्ष्य महिलाओं एवं युवाओं को लाभान्वित करना था, ताकि सामाजिक स्थितियां बदल जाएं।
इसके पीछे उद्देश्य यह था कि सर्वजन के लिए समान अवसर उपलब्ध होगा। अति-आवश्यक सेवाओं की सुलभता होगी। जीवन-पर्यंत शिक्षा व प्रशिक्षण, उपयुक्त व शिष्ट रोजगार और सामाजिक संरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। आज मानवाधिकार कार्यकर्ता भी मानने लगे हैं कि सामाजिक न्याय का राज्यों को सुनिश्चित करना है, लेकिन वे उस दिशा में सक्रिय नहीं हैं। वे आज तक एक ऐसा रोड-मैप नहीं तैयार कर पाए, जिससे हमारी अवसंरचना ही लक्ष्य का निर्धारक बनती।
यदि समय रहते दुनिया के सभी देश इसे समझ सकें, तभी तनाव व संघर्ष कम हो सकेंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हमारे जो सतत विकास लक्ष्य के दावे हैं, वे शायद ही कभी पूरे हो सकेंगे। सभ्यतागत चुनौतियों के साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी हमारे समक्ष खड़ी है। इसलिए सामाजिक न्याय के प्रति योजनाबद्ध प्रतिबद्धता आज की मांग बन गई है। समय रहते यदि वैश्विक सहमति के साथ कोई योजना बनती है, तभी सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की पहल तो हो रही है। लेकिन विभिन्न देश अपने नागरिकों के हित में पहल कब करते हैं, यह देखने वाली बात है।
(-लेखक महामहिम राष्ट्रपति के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं।)