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बचपन की शादी और करिअर

क्षमा शर्मा
Updated Mon, 05 Nov 2018 06:43 PM IST
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क्षमा शर्मा

जोधपुर की एक लड़की जब तीन साल की थी, तो उसकी शादी तय कर दी गई। लेकिन वह पढ़ती-लिखती रही। अब वह बाईस साल की है और चार्टर्ड अकाउंटेंट बन चुकी है। उसका कहना है कि बचपन में जिससे उसकी शादी तय हुई, वह उससे  शादी नहीं करना चाहती। वह जीवन में कुछ बनना चाहती है। लड़के का परिवार लड़की और उसके परिवार पर लगातार शादी का दबाव बनाता रहा। लड़की के शादी के लिए तैयार न होने को लड़के के परिवार ने अपना अपमान समझा। उन्होंने पंचायत में शिकायत कर दी। पंचायत ने सारी बात सुनने के बाद लड़के के परिवार का साथ दिया और लड़की के परिवार पर सोलह लाख का जुर्माना लगा दिया, जिसे उन्होंने चुकाया भी।



इस बात की शिकायत लड़की ने पुलिस से की। इसमें उसने पांच लोगों के नाम लिए, जिनमें लड़के के परिवार के लोग और सरपंच थे। पंचायत के फैसले की पुलिस से शिकायत करना भी जैसे उसका गंभीर अपराध मान लिया गया। पंचायत ने इसका बुरा माना। उसने दोबारा लड़की के परिवार पर न केवल बीस लाख रुपये का जुर्माना लगाया, बल्कि कहा कि पुलिस से शिकायत फौरन वापस ली जाए। सार्वजनिक रूप से इस गलती की माफी भी मांगी जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो लड़की के परिवार का गांव से सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा।

  

लड़की समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। उसके कारण उसके परिवार को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। पंचायत की बैठक से पहले वह पुलिस स्टेशन पहुंची। वहां उसने जहर खा लिया। पुलिस हरकत में आई। उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां अब वह ठीक हो रही है। उसका कहना है कि लोगों के डर से उसने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया है। पंचायत करिअर बनाने के उसके सपनों को खत्म कर देना चाहती है। उसकी सारी आशाएं खत्म हो रही थीं, इसलिए उसे लगा कि अब जीवन का क्या फायदा। और उसने जहर खा लिया। इससे पहले उसने तीन बार पुलिस कमिश्नर से मुलाकात कर शिकायत भी की,  तब कहीं जाकर उसकी एफआईआर लिखी जा सकी। उसके घर वालों का कहना है कि पुलिस ने उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि पुलिस का कहना है कि उसे बयान देने के लिए बुलाया गया था, मगर वह नहीं आई।


परंपराओं के नाम पर एक लड़की की हालत क्या कर दी गई कि वह जान देने लगी। पंचायतों को गांधी जी राम राज्य कहते थे। मगर पंचायतों के ऐसे निर्णय का क्या मतलब है कि बचपन में अगर शादी तय कर दी गई, तो एक लड़की बड़ी होने और पढ़ने- लिखने के बावजूद उसे तोड़ नहीं सकती। अगर वह लड़की हिम्मत दिखाती है, तो उसे भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पंचायत, समाज में और कोई उसका साथ नहीं देता।


राजस्थान में अब भी बहुत-सी शादियां बचपन में तय कर दी जाती हैं। आखातीज के अवसर पर हजारों ऐसे बच्चों की शादियां कर दी जाती हैं, जो पालने में होते हैं। उनके फोटो भी छपते रहते हैं। हजारों प्रयासों के बावजूद आज तक इन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है।

 

हालांकि पिछले दिनों से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि लोग पढ़-लिखकर बचपन में हुई शादियों या तय किए गए रिश्तों को नहीं मानना चाहते। उन्हें तोड़ देते हैं। इसमें कानून भी उनकी मदद करता है। लेकिन जब पंचायतें आगे आती हैं, तो वे लड़कियों की बातें क्यों नहीं सुनतीं? इस लड़की को जिन लोगों ने परेशान किया, उसके घरवालों से मोटी रकम वसूली, दोबारा भारी पैसे की मांग की और बहिष्कार की भी धमकी दी। उन्हें क्या सजा मिलेगी, यह तो वक्त ही बताएगा। 

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