बांग्लादेश में 1981 के बाद तकरीबन तीन दशक से राजनीतिक विमर्श 'दो बेगमों की जंग' पर केंद्रित है। दो बार प्रधानमंत्री रह चुकीं खालिदा जिया, जिनकी आधिकारिक पहचान ही 'बेगम' की बन गईं, का सीधा टकराव मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना से है, जोकि प्रतिबद्ध मुस्लिम होने के बावजूद खुद की पहचान को बांग्ला संस्कृति से जोड़ना पसंद करती हैं। एक वृहत मुस्लिम समाज के लिहाज से यह अहम है, जोकि खुद बांग्ला भाषा और संस्कृति पर गर्व करता है।
यह अटकल तेज है कि क्या बेगम जिया, जिन्होंने पिछले संसदीय चुनावों का बहिष्कार कर भारी चूक की थी और जिसके कारण एक तरह से राजनीतिक रूप से नुक्सानदेह निर्वासन में चली गई थीं, इस वर्ष के आखिर में या अगले वर्ष की शुरुआत में होने वाले चुनाव में हिस्सा लेंगी? राजनीतिक रूप से वापसी करने का उनके पास यह आखिरी मौका होगा। वह 73 की वर्ष की हो चुकी हैं और उनके दिल का ऑपरेशन हो चुका है। इसके अलावा वह लंबे समय से जोड़ों के दर्द से भी पीड़ित हैं। उन्होंने अपने बेहद प्रिय छोटे बेटे अराफात को भी खो दिया है।
कालेधन को वैध करने से जुड़े मामले से बचने के लिए उसने सिंगापुर में शरण ली थी। उनके लिए राजनीतिक रूप से बदतर साबित हुआ उनके बड़े बेटे तारिक का आत्म निर्वासन, जिस पर मां के प्रधानमंत्री रहते सत्ता का दुरुपयोग करने और रिश्वत लेने के आरोप हैं और बांग्लादेश पुलिस को जिनकी तलाश है। बांग्लादेश वापसी पर उसकी गिरफ्तारी तय है।
उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) 'राष्ट्रवाद' को अपनी प्रतिद्वंद्वी अवामी लीग से अलग तरह से परिभाषित करती है। वास्तव में उनके पति ने जहां शेख मुजीब के हत्यारों को शरण दी और पाकिस्तानी शासकों का समर्थन करने वाली मुस्लिम लीग पर लगा प्रतिबंध हटाया, तो खालिदा ने इस पार्टी के साथ गठबंधन किया था और 2001-06 के दौरान अपनी सरकार में लीग से कई मंत्री भी बनाए थे। वह सत्ता में और उससे बाहर हमेशा भारत के खिलाफ विषवमन में लगी रही हैं और अपनी प्रतिद्वंद्वी हसीना और उनकी पार्टी को 'भारतीय एजेंट' करार देती हैं।
खालिदा के शासनकाल में इस्लामिक पार्टियों और उग्रवादी संगठनों ने आतंक फैलाया और धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा उदारवादियों को निशाना बनाया। हालांकि वह तब तक उनकी मौजूदगी से इन्कार करती रहीं, जब तक कि अमेरिका और विश्व समुदाय ने इसकी आलोचना कर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी न दी। उनके कार्यकाल के दौरान कम से कम तीन बार हसीना की हत्या के प्रयास किए गए।बीएनपी ने एक बार फिर से सक्रिय होकर उठ खड़ा होने के संकेत दिए हैं। हाल ही में खालिदा जिया ने अपनी पार्टी के तीन पूर्व सांसदों को भारत भी भेजा था। इस यात्रा से एक विशाल पड़ोसी देश को दी जा रही अहमियत का पता चलता है। अमेरिका और ब्रिटेन की ऐसी यात्राओं से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
बांग्लादेश के पूर्व वाणिज्य मंत्री आमिर खुसरो ने अनेक भारतीय थिंक टैंक को संबोधित किया और मीडिया को इंटरव्यू भी दिए, जिनमें उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत ने 'भूलवश' यह गलत धारणा बना ली कि बेगम जिया और बीएनपी भारत विरोधी हैं।
यह विमर्श तीन कारणों से हसीना नहीं, बल्कि जिया पर केंद्रित है। पहला, इस्लामिक ताकतें बांग्लादेश में पैर जमा रही हैं, जिसका पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव पड़ रहा है। बावजूद इसके कि हसीना ने जिया के मुख्य सहयोगी बांग्लादेश मुस्लिम लीग के अनेक बड़े नेताओं को 1971 के मुक्ति संघर्ष में पाकिस्तानी सत्ता का साथ देने और नागरिकों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के कारण सजा दिलाई, जिसमें फांसी तक शामिल थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 47 साल बाद राष्ट्रवादी भावनाएं मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन ताकतवर मध्य वर्ग में पाकिस्तानी समर्थक भावनाएं पनप रही हैं और भारत से 'घिरा' होने का एहसास प्रभावित कर रहा है। हसीना के कार्यकाल में उदारवादियों पर हो रहे हमले गंभीर हैं। इस पर उनकी प्रतिक्रिया कमजोर है। ऐसा लगता है, मानो वह शासन करने के लिए जरूरी मुस्लिम पहचान और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा करने की जरूरत के बीच फंस गई हैं। दूसरा, वह नौ वर्ष से सत्ता में हैं, लिहाजा उन्हें सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ेगा। सामाजिक-आर्थिक संकेतक निश्चय ही बेहतर हुए हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनकी उपलब्धियां मिली-जुली हैं।
तीसरा कारक है भारत, क्योंकि हसीना को उनकी विरासत तथा उनके रिकॉर्ड के कारण भारत समर्थक माना जाता है। उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों के शिविरों को बंद करवाकर आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद की। स्वाभिवक रूप से इसके बदले में वह भी कुछ चाहती थीं। वह महसूस करती हैं कि इसकी पर्याप्त भरपाई नहीं की गई।
भूमि सीमा समझौते ने आबादी और क्षेत्र से जुड़े विवाद को निपटाया, जोकि मूलतः विभाजन की वजह से विरासत में मिला था। लेकिन तीस्ता जल बंटवारा समझौता अंजाम तक नहीं पहुंच सका है। यह बांग्लादेश के लिए अहम है, फिर वहां सत्ता में कोई भी रहे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति को देखते हुए यह मुश्किल दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने ढाका को तो कुछ हद तक राजी कर लिया था, लेकिन ममता राजी नहीं हैं। तीस्ता समझौते से इन्कार कर भारत काफी कुछ गंवा सकता है।
कल्पना कीजिए कि यदि जिया सत्ता में वापस आ जाती हैं। वह तीस्ता का मामला फरक्का मुद्दे की तरह संयुक्त राष्ट्र आमसभा तक ले जा सकती हैं। बांग्लादेश पहले ही चीन की बेल्ट और रोड परियोजना का हिस्सा बन चुका है। कहीं वह चीन के जरिये भारत पर गंगा का अधिक पानी छोड़ने के लिए दबाव बनाने लगा तब क्या होगा?
ऐसे समय जब छोटा सा मालदीव आंखें तरेर रहा है, और ऐसे क्षेत्र में जहां चीनी ड्रैगन अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, भारत को अपने इस भरोसेमंद पड़ोसी से सकारात्मक संबंध कायम रखने के लिए वाकई गंभीरता से विचार करना चाहिए।