आम आदमी पार्टी ने ना-ना करते जिस तरह दिल्ली में सरकार बनाने की तैयारी कर ली है, उससे कई सवाल उठे हैं, तो कई आशंकाएं भी बलवती हुई हैं। लेकिन यह तय है कि आप सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है। अन्यथा जो अरविंद केजरीवाल यह कहते नहीं थकते थे कि न तो वह किसी का समर्थन लेंगे, न ही किसी को समर्थन देंगे, वह जनता की राय के नाम पर उसी कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाने को तैयार हो गए हैं, जिसका विरोध करते हुए वह यहां तक पहुंचे हैं।
दिल्ली में आप ने जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर अब तक खांचे में बंटी रही राजनीति को इन खांचों से एक हद तक बाहर निकाल दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आप उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा जैसे ठेठ हिंदीभाषी राज्यों की राजनीति बदल पाएगी, जहां काफी हद तक जाति और धर्म के खांचे में राजनीति बंधी हुई है। तीनों ही राज्यों में जाति आधारित वोटिंग क्रूर सच्चाई है और उससे भी बड़ी सच्चाई परिवारवाद बन गई है।
तीनों ही राज्यों की प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता जिंदगी भर पार्टी कार्यक्रमों में दरी और जाजिम ही बिछाते रह जाते हैं और जब सांसद और विधायक बनने की बारी आती है, तो पार्टियों के आलाकमान के घर के अलावा कोई दूसरा नाम नहीं सूझता। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का परिवार हो या बिहार में लालू प्रसाद यादव का परिवार या फिर हरियाणा के तीनों लालों का परिवार... हर जगह परिवारवाद हावी है।
परिवारवाद की इसी परिधि में अब हरियाणा का हुड्डा परिवार और पंजाब का बादल परिवार भी आ गया है। जब इन सवालों को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ प्रमुख नेताओं से चर्चा की गई, तो उन्होंने आम आदमी पार्टी के उभार को दूध के उबाल की तरह नकारने में देर नहीं लगाई। मुलायम सिंह यादव तो खुलेआम कह ही चुके हैं कि आप का उभार महज सियासी बुलबुला है, जो जल्दी ही फूट जाएगा। मगर दिल्ली में जब आप का गठन हुआ था, तब न तो कांग्रेस और न ही भाजपा ने उसे गंभीरता से लिया था। भाजपा चुनाव के दिन तक उसे अपने लिए वोट काटने वाली पार्टी ही मानती रही और सत्ता पर कब्जे का सपना देखती रही। लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि आप ने किस तरह दिल्ली की दोनों दिग्गज पार्टियों की दीवार में गहरा सूराख कर दिया है। इसलिए यह मानना कि आप का असर बाकी राज्यों में नहीं होगा, इस पर ठहर कर सोचने का वक्त सभी राज्यों के क्षत्रपों के लिए आ गया है।
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में करीब 62 फीसदी युवा हैं, जिनकी उम्र 18 से 35 साल के बीच है। दिल्ली के चुनावी रूझानों से साफ है कि इन युवाओं का सबसे ज्यादा समर्थन आप को ही मिला। फेसबुक और ट्वीटर पर राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी भी हैं। कांग्रेस और भाजपा भी हैं। लेकिन बाजी मारी आप के आक्रामक चुनाव अभियान ने। उसने उन युवाओं को अपने साथ जोड़ा, जिन्हें ईमानदारी से अपनी मेहनत और योग्यता के मुताबिक काम मिलना चाहिए और इसके लिए उन्हें घूस नहीं देना पड़े। उन्हें अपने बिजली के कनेक्शन या जाति या आय प्रमाणपत्र के लिए किसी सरकारी अधिकारी को चढ़ावा न चढ़ाना पड़े। आज गांवों तक का युवा प्रीपेड मोबाइल कनेक्शन के ही जरिये फेसबुक और ट्वीटर से परिचित है और इनके जरिये वह आप की क्रांति से वाकिफ हो चुका है। पटना और कोलकाता में आप के नाम पर जुलूस निकलने की शुरुआत से जाहिर है कि इन इलाकों में भी सूत्रपात हो चुका है। योगेंद्र यादव कह भी चुके हैं कि 328 जिलों में उनकी पार्टी की इकाइयां काम कर रही हैं। जन लोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे के अनशन के दौरान जिस तरह गांवों और ढाणियों तक में मोमबत्तियां जलाई गईं, उन तक अरविंद केजरीवाल का नाम पहुंच चुका है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि आप ने हरियाणा के ईमानदार आईएएस अफसर माने जा रहे अशोक खेमका पर अपनी निगाह गड़ा दी है। इसलिए अगर पड़ोसी राज्यों में भी बदलाव की आहट सुनाई देने लगे, तो हैरत नहीं होगी। लिहाजा सोचने का वक्त इन राज्यों को अब तक चलाते रहे कर्णधारों के लिए है।