सुनने में भले ही यह भयावह लगे, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। जनवरी, 2022 से नोम पेन्ह स्थित भारतीय दूतावास एक हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों की स्वदेश वापसी करा चुका है। वर्ष 2024 के पहले नौ महीनों के दौरान ही करीब 770 भारतीय नागरिक स्वदेश लौट आए हैं। ठीक ऐसी ही कहानियां लाओस से भी निकलकर सामने आई हैं। भारत सरकार अपने नागरिकों को विभिन्न मिशनों के जरिये कंबोडिया और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में संदिग्ध एजेंटों और सोशल मीडिया विज्ञापनों के माध्यम से मिलने वाली नौकरियों के प्रस्तावों से बचने व सावधानी बरतने की चेतावनी जारी करती रही है।
भोले-भाले भारतीय नागरिकों को वैध रोजगार का वादा कर साइबर अपराधों में फंसाया जाता है, विशेषकर डाटा एंट्री ऑपरेटर जैसी नौकरियों का प्रलोभन देकर। इन साइबर अपराधियों के चंगुल में फंसने पर भारतीय नागरिकों को अवैध साइबर गतिविधियों में शामिल होने के लिए बाध्य किया जाता है, जैसे-फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाना, बिना सोचे-समझे लोगों को धोखा देने के लिए धोखाधड़ी वाली साजिशों में शामिल होना। इन पीड़ितों में दूसरे देशों के लोग भी शामिल हैं, जिन्हें साइबर अपराध के लिए मजबूर किया जाता है, इनमें ‘पिग बुचरिंग’ घोटाले भी समाहित हैं, जहां ये साइबर ठग लोगों के साथ ऑनलाइन संबंध स्थापित कर उन्हें सोशल मीडिया या डेटिंग एप्स के जरिये गलत निवेश के लिए मजबूर करते हैं। ‘पिग बुचरिंग’, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, जिस तरह जानवर को मारने से पहले उसे खिला-पिलाकर मोटा-ताजा किया जाता है। ठीक उसी तरह ये धोखेबाज लालच देकर पीड़ितों को पहले विश्वास में लेते हैं और फिर उनसे भारी मात्रा में धन ऐंठ लेते हैं।
धोखेबाजी का यह खेल पिछले करीब दो वर्षों से चल रहा है। अक्तूबर, 2022 में द लाओशियन टाइम्स ने खबर प्रकाशित की कि 130 भारतीय पेशेवरों को लाओस, म्यांमार और कंबोडिया से मुक्त कराया गया। उन्हें थाईलैंड में नौकरी का प्रस्ताव देकर फंसाया गया था, लेकिन दूसरी जगह ले जाया गया और आपराधिक नेटवर्क के जरिये उन्हें साइबर धोखाधड़ी करने के लिए मजबूर किया गया। भारत में राज्य सरकारों के साथ ही केंद्र सरकार ने भी बार-बार सलाह जारी कर भारतीयों को विदेश में फर्जी नौकरियों के प्रस्तावों के प्रति आगाह किया है। चेतावनियों और दक्षिण पूर्वी एशिया के कुख्यात स्कैम कंपाउंड के बारे में दर्जनों आलेख प्रकाशित होने के बावजूद छापामारी, गिरफ्तारी और भयावह कहानियां जारी हैं। हाल की कई रिपोर्टों से पता चलता है कि अपने सपनों की नौकरी के बजाय पीड़ित खुद को जेल में पाते हैं, विशेष रूप से म्यांमार, लाओस, कंबोडिया के कुछ हिस्सों में, जहां उन्हें ऑनलाइन धोखाधड़ी का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।
आखिर क्यों इतने सारे युवा, शिक्षित भारतीय दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेटों द्वारा दी जा रही फर्जी नौकरी की पेशकश में फंसते जा रहे हैं? दरअसल, आपराधिक गिरोह जान-बूझकर युवा, शिक्षित और थोड़ी-बहुत तकनीकी जानकारी रखने वाले, लेकिन दुनिया से कम परिचित लोगों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ड्रग्स एंड क्राइम पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) की सितंबर 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को नौकरी के विज्ञापनों द्वारा लुभाया जाता है, जो उच्च वेतन और दिलचस्प काम की पेशकश करते हैं। झूठे इंटरव्यू के बाद पीड़ित नौकरी हासिल कर लेता है, छह महीने के कार्य-अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर हस्ताक्षर करता है और फिर शीघ्र ही दक्षिण पूर्व एशिया चला जाता है, जिसके बारे में उसे लगता है कि वहां उसकी एक रोमांचक नई पेशेवर भूमिका होगी। घोटालों और धोखाधड़ी को अंजाम देने के मामले में संगठित अपराध नेटवर्क की कार्यप्रणाली मेकांग क्षेत्र के सभी देशों में काफी सुसंगत है। वे मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों से निकले स्नातक छात्रों को शिकार बनाते हैं, जो कई भाषाओं में पारंगत होते हैं, सूचना प्रौद्योगिकी कौशल से युक्त होते हैं, सोशल मीडिया से परिचित होते हैं और जिन्हें क्रिप्टोकरेंसी का कामचलाऊ ज्ञान होता है। संगठित आपराधिक समूह के लिए ये शर्तें जरूरी होती हैं, क्योंकि उन्हें एक कुशल कार्यबल की जरूरत होती है, जो साइबर स्पेस में आपराधिक गतिविधियों-विभिन्न घोटालों से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध जुए तक को अंजाम दे सके।
यूएनओडीसी ने बताया कि अपराध नेटवर्क के भर्तीकर्ता चुनिंदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निशाना बना रहे हैं, जो युवाओं के लिए कंफर्ट जोन होता है। फेसबुक (मेटा) और इंस्टाग्राम पर भी धोखाधड़ी वाले नौकरी के विज्ञापन और पोस्ट की पहचान की गई है। संगठित अपराध समूहों और संभावित पीड़ितों के बीच संपर्क व्हाट्सएप, लाइन, टेलीग्राम और मैसेंजर के माध्यम से होता है। जाहिर है, विदेश में नौकरी की चाहत और बाहरी दुनिया के बारे में कम जानकारी, दोनों मिलकर घातक साबित होते हैं। खास तौर पर ऐसे समय में, जब सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में व्हाइट-कॉलर नौकरियों में गिरावट के कारण कई नए स्नातक और युवा बेरोजगार हो गए हैं। सबसे बदतर बात यह है कि धोखेबाज पीडि़तों को धोखा देने के लिए अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का भी उपयोग कर रहे हैं। भारत की सरकारी एजेंसियों को उन युवाओं को सचेत करने के लिए हर उपलब्ध मंच का उपयोग करना चाहिए, जो आसान लक्ष्य हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए नागरिकों को भी जागना होगा। वे झूठे वादों में न फंसें। विदेश में नौकरी का प्रस्ताव मिलने पर उसके बारे में पर्याप्त जानकारी इकट्ठा करें। विदेश में एक आरामदायक जीवन के बजाय यह एक स्कैम कंपाउंड में बंधक का जीवन हो सकता है।