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संपादकीयः नौकरशाही का भ्रष्टाचार भी है बड़ा चुनावी मुद्दा, असंतोष और निराशा का माहौल

शिवदान सिंह Published by: Raman Singh Updated Thu, 25 Apr 2019 10:35 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर

हर बार चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियां लोक-लुभावन वादे करके जनता से वोट मांगती हैं। पर जनता को रोजमर्रा के जीवन में भ्रष्टाचार के कारण जो मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं, उन्हें मिटाने के लिए वे कोई रोडमैप प्रस्तुत नहीं करती हैं। बड़े-बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार की खबरें तो सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन नौकरशाही के कारण जो भ्रष्टाचार आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है, उसके बारे में कोई चर्चा नहीं होती। रोजमर्रा के जीवन में लोगों को विभिन्न सरकारी सुविधाएं पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है।



अभी हाल ही में कुछ पूर्व नौकरशाहों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर एक शिकायती पत्र महामहिम राष्ट्रपति को लिखा, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप लगाए हैं कि वह निष्पक्षता, दक्षता और पारदर्शिता से अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहा है। इन पूर्व नौकरशाहों को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से तो प्रजातंत्र पर खतरा महसूस हुआ, लेकिन उन्हें नौकरशाही का भ्रष्टाचार नहीं दिखता, जिसके कारण पूरे देश में असंतोष और निराशा का माहौल पैदा हो गया है।


पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने इस समस्या को समझते हुए उच्चतम न्यायालय में पुलिस सुधार के लिए 2006 में एक याचिका दायर की थी, जिसे स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंग्रेजों द्वारा लागू पुलिस ऐक्ट, 1861 में बदलाव तथा सुधारों के लिए सरकार को निर्देश दिए, ताकि पुलिस का स्वरूप सामंतवादी के बजाय प्रजातांत्रिक बन जाए। परंतु ऐसे प्रयास सिविस सर्विसेज कोड को बदलने के लिए नहीं किए गए।


भारतीय नौकरशाह मौका मिलने पर सिविल सर्विस कोड में दी गई अपार शक्तियों का प्रयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करने लगे और देश की गरीब जनता का शोषण करने के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित धन में हेराफेरी करने लगे। मगर हैरानी की बात यह है कि रंगे हाथों पकड़े जाने पर भी किसी नौकरशाह पर अभियोग चलाने के लिए सरकार की अनुमति अनिवार्य है! भारत के वरिष्ठ नौकरशाह और पूर्व चीफ विजिलेंस कमिश्नर एन विट्ठल ने कहा था कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा नौकरशाह भ्रष्ट हैं, क्योंकि राजनेताओं को तो जनता एक समय बाद हटा सकती है, लेकिन नौकरशाह पूरी सेवा काल तक भ्रष्टाचार करता रहता है।


शासन तंत्र की मुख्य धुरी नौकरशाही के कारण देश की प्रतिष्ठा तथा अर्थव्यवस्था को समय-समय पर हानि हुई है। इसी का परिणाम है कि इस देश में पर्याप्त संसाधन होते हुए भी चारों तरफ गरीबी, बेरोजगारी तथा निराशा का माहौल है। क्या यह प्रजातंत्र के साथ विश्वासघात नहीं है? दुर्भाग्य की बात है कि भारत की कोई भी राजनीतिक पार्टी नौकरशाही के भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई योजना नहीं पेश कर रही है! भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनावों में विदेशों में जमा कालाधन वापस लाने तथा भ्रष्टाचार मिटाने का वादा किया था, परंतु उसकी कोई योजना नहीं बताई थी, जिसके चलते न तो काला धन आया और न भ्रष्टाचार मिटा!


अगर हमें नया भारत बनाना है और सबको न्याय तथा विकास का लाभ देना है, तो इसके लिए नौकरशाही को देश की अपेक्षा के अनुसार बनाना होगा! इसके लिए नौकरशाही में प्रवेश के तरीकों तथा प्रशिक्षण में परिवर्तन करने होंगे! सेवा में प्रवेश के समय इनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए, ताकि इनकी मनोस्थिति का पता चल सके! इससे देश के निचले स्तर से भ्रष्टाचार मिटेगा तथा देश में समरसता तथा राष्ट्रीयता की भावना मजबूत होगी! क्या राजनीतिक दल भ्रष्टाचार मिटाने का कोई रोडमैप जनता के सामने पेश करेंगे।

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