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नौकरशाही का वर्ग चरित्र कब बदलेगा

Sat, 30 May 2015 01:09 PM IST
सुभाषचंद्र कुशवाहा
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अखिल भारतीय सेवाएं (अनुशासन एवं अपील) संशोधन नियम-2015 के मसौदे के अनुसार राज्य सरकारें किसी भी आईएएस या आईपीएस अधिकारी को एक हफ्ते से ज्यादा निलंबित नहीं रख सकेंगी। सिवाय उन मामलों को छोड़कर जहां राज्य सरकारों की समीक्षा समिति ने इसकी पूर्व अनुमति दी हो। राज्य सरकारों को उनके निलंबन के बारे में 48 घंटे के भीतर केंद्र सरकार को सूचना देनी होगी। कार्मिक मंत्रालय ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन से सलाह-मशविरे के बाद यह मसौदा तैयार किया है। केंद्र सरकार का यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नौकरशाह लंबे समय से मांग करते रहे थे कि राज्य सरकारें मनमर्जी से उनका निलंबन और स्थानांतरण कर देती हैं।
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नौकरशाहों की यह मांग नाजायज नहीं है। राजनीतिक कारणों से तथा मनमाफिक अधिकारियों की तैनाती के लिए नौकरशाहों के प्रति मनमाना व्यवहार किया जाता रहा है। इससे प्रशासनिक गुणवत्ता का पतन हुआ है। मगर यह मांग नाजायज तब लगती है, जब यही नौकरशाह अपने अधीनस्थों को आए दिन अकारण या अपने अहं की तुष्टि के लिए निलंबित करते रहते हैं और लंबे समय तक जांच पूरी नहीं करते। भारतीय प्रशासनिक सेवा का मूल चरित्र ज्यादातर भेदभाव वाला रहा है। इस सेवा के अधिकारी अपने लिए समय-समय पर विशेष रियायतें हासिल करते रहे हैं। दूसरी और देश के लाखों अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ, वे अकारण जुल्म भी ढाते रहे हैं। न्यायालयों में ज्यादातर सरकारी सेवकों के मुकदमें इन्हीं जुल्मों के कारण जाते हैं। आज अगर पूरी मशीनरी ठीक से कार्य नहीं कर रही है, तो इसके लिए प्रशासनिक अधिकारी भी दोषी हैं।


कुछ वर्ष पूर्व एक ऐसी ही अधिसूचना के द्वारा यह नियम लागू हुआ कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और उसके परिजन, विदेशों में सरकारी खर्चे पर इलाज करा सकते हैं। आपातकालीन चिकित्सा के लिए उन्हें हेलिकॉप्टर से राज्य के बाहर ले जाने की भी सुविधा दी गई। मरीज के साथ विदेश जाने वाले सहायक व्यक्ति के आने-जाने का विमान किराये का खर्च भी सरकार उठाएगी। क्या यह अजीब नहीं लगता कि देश की चिकित्सा व्यवस्था को ध्वस्त कर, अपना इलाज विदेशों में कराना और देश के आम नागरिकों, दूसरे कर्मचारियों को भगवान भरोसे छोड़ देना, सबके लिए समान कानून की अवधारणा के खिलाफ है? प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को तमाम बेहतर और खर्चीली सुविधाएं मिली हुई हैं। वहीं दूसरे अधिकारियों के बार-बार स्थानांतरण पर आवास की समुचित व्यवस्था तक नहीं होती। इस लोकतांत्रिक देश के हर नागरिक के लिए एक संविधान, समान कानून और विधान होते हुए भी सब कुछ असमान है, तो इसके लिए यहां की नौकरशाही भी काफी हद तक जिम्मेदार है। यह अकारण नहीं है कि समर्थवानों के लिए कानून, प्रशासन और विधायिका, जितने सुलभ और हित पोषक हैं, उतने ही आम आदमी के लिए दूभर और जलालत भरे।
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उदारीकरण की नीतियों पर तेजी से अमल करती सरकारों की सारी की सारी नीतियां, दोहरी व्यवस्था लागू करने पर आधारित हैं। यानी आम के लिए कुछ और, खास के लिए कुछ और। इस नीति से लोकतंत्र में लोक की उपेक्षा हो रही है। यह गैरबराबरी की बुनियाद को मजबूत कर रहा है। ये भेदभावपरक नीतियां, समाज में कुंठा, आक्रोश या विघटन पैदा कर रही हैं। सरकार और नौकरशाहों को इस बिंदु पर मनन करना चाहिए क्योंकि उनके दर्द को दूसरों से भिन्न तो नहीं कहा जा सकता?
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