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राजनीति: भाजपा पर अतीत के प्रतीकों का साया, महाराष्ट्र में इनसे उसे खुद निपटना होगा

शंकर अय्यर
Updated Tue, 27 Aug 2024 06:57 AM IST

सार

महाराष्ट्र का चुनाव भाजपा के लिए निर्णायक है। नमो शेतकरी महासम्मान निधि और लड़की बहिन नकद हस्तांतरण योजना को लेकर चर्चा है और इससे पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन भाजपा के सामने जो चुनौतियां खड़ी हैं, उनसे उसे खुद ही निपटना होगा।
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देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे, अजित पवार - फोटो : पीटीआई


इस महीने चुनाव आयोग ने हरियाणा और जम्मू एवं कश्मीर के चुनाव की तारीखों की घोषणा की। लेकिन लोगों का ध्यान महाराष्ट्र पर लगा है, क्योंकि इसे राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्व का मार्ग माना जाता है। पिछले एक दशक की भाजपा की यात्रा अल्पकालिक फायदे देखने की प्रवृत्ति के खतरों को दर्शाती है। पार्टी ने भ्रष्टाचार-विरोधी मुद्दों को छोड़ दिया, सहयोगी दलों के बीच अविश्वास की भावना पैदा की, तोड़-फोड़ की राजनीति करके अपनी विश्वसनीयता खोई, नतीजतन उसे अवसरवादी राजनीति करने का आरोप झेलना पड़ा।


वर्ष 2014 में भाजपा का सफल अभियान व्यक्तित्व और वादे के इर्द-गिर्द बुना गया था। नारा दिया गया था-दिल्ली में नरेंद्र, मुंबई में देवेंद्र। फडणवीस मिलनसार थे, लेकिन अपने दृष्टिकोण में आक्रामक एवं कट्टर थे। वर्ष 2012 में मंत्रालय में आग लगने के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए याचिका दायर की थी। वर्ष 2014 से 2019 के बीच फडणवीस ने अपनी शानदार छवि बनाई थी। पर लगता है कि अब उनकी वह छवि खो गई है। 2024 में फडणवीस पार्टी के भीतर ही अक्सर युद्ध की स्थिति में नजर आते हैं।


भाजपा की सफलता के मूल में राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त करने का वादा था, जिसे कांग्रेस-राकांपा गठबंधन पर 11 लाख करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप पत्र द्वारा रेखांकित किया गया था। अक्तूबर, 2014 में भाजपा ने शिवसेना के साथ मिलकर 288 सीटों में से क्रमशः 122 और 63 सीटें जीतकर घर वापसी की थी। सत्ता में आने के तुरंत बाद फडणवीस सरकार ने राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को राकांपा के अजीत पवार और सुनील तटकरे के खिलाफ जांच की मंजूरी दी। एक दशक बाद, फडणवीस और अजीत पवार उपमुख्यमंत्री हैं और 2024 के चुनावों के लिए साथ-साथ प्रचार कर रहे हैं। राजनीति में रिश्ते ही सफलता को परिभाषित करते हैं और भाषा मायने रखती है। एक चौथाई सदी तक भगवा गठबंधन में भाजपा और शिवसेना सहयोगी थे। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे द्वारा घरेलू कलह कहे जाने के बावजूद गठबंधन चलता रहा। मगर वर्ष 2019 के चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की लड़ाई को लेकर गठबंधन खत्म हो गया। सरकार का गठन रुका हुआ था। अंततः उद्धव ठाकरे गठबंधन से बाहर चले गए और गठबंधन टूट गया।


भाजपा खुद को अलग तरह की पार्टी बताती रही है। 105 विधायकों के साथ वह विपक्ष को मात दे सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। जैसे कॉरपोरेट कंपनियां किसी शत्रु कंपनी को अधिग्रहीत कर लेती हैं, ठीक वैसे ही भाजपा ने सरकार बनाने के लिए 23 नवंबर, 2019 को अजीत पवार को अपने खेमे में मिला लिया। राकांपा प्रमुख शरद पवार ने तुरंत अपने भतीजे के भाजपा में शामिल होने को अवैध बताया और शिवसेना-उद्धव, राकांपा-पवार और कांग्रेस को मिलाकर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) का गठन किया और उद्धव को मुख्यमंत्री नामित किया। अजीत पवार के साथ भाजपा का तात्कालिक गठजोड़ तीन दिन भी नहीं टिक पाया और अजीत पवार अपने सहयोगियों के साथ एमवीए सरकार में शामिल हो गए।


वर्ष 2022 में एमवीए अपने अंतर्विरोधों के बोझ तले ढहने के करीब दिखा, जब भाजपा ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के साथ साझेदारी करके एमवीए सरकार को गिरा दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियों का डर दिखा कर पार्टी तोड़ी गई। जबकि भाजपा ने खुद को निर्दोष बताया और शिंदे गुट ने कहा कि यह विभाजन नहीं था। फडणवीस को उपमुख्यमंत्री के रूप में सरकार में शामिल होने का निर्देश मिलने पर बदनामी झेलनी पड़ी। जुलाई, 2023 में भाजपा ने फिर से अपनी पुरानी योजना पर विचार करते हुए अजीत पवार गुट को सरकार में शामिल कर लिया। ऐसा निश्चित रूप से सामाजिक गठबंधनों और ग्रामीण महाराष्ट्र में चुनावी सफलता के लिए किया गया। हालांकि जून, 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में इसका कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि पार्टी की रणनीति पर ही असर पड़ा।


राजनीति के उलझने के साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था को झटका लगा। अतीत के विपरीत, राज्य 7.6 प्रतिशत की धीमी गति से विकास कर रहा है, जबकि भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत है। महाराष्ट्र का कर्ज बढ़कर 7.11 लाख करोड़ रुपये (राज्य जीडीपी का 17.6 फीसदी) हो गया है। 48,578 करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान राजस्व का 10 प्रतिशत है। 2014 में किसानों के समर्थन से भाजपा को सफलता मिली थी, लेकिन 2024 में किसान भाजपा के खिलाफ उग्र हो रहे हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा घटने को लेकर मराठाओं में गुस्सा है, लेकिन यह खेती की अव्यवहारिकता का भी प्रतीक है- शुद्ध बुआई का क्षेत्र घट रहा है और सकल फसल क्षेत्र स्थिर है। राज्य निवेश में पिछड़ रहा है और इसकी प्रति व्यक्ति आय 2.52 लाख रुपये है, जो सात राज्यों-सिक्किम, तेलंगाना, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु से पीछे है।
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यह भाजपा के लिए निर्णायक चुनाव है। हां, नमो शेतकरी महासम्मान निधि और लड़की बहिन नकद हस्तांतरण योजना को लेकर चर्चा है और इससे पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन चुनौती कठिन है। अहंकार और हताशा, एक के बाद एक गलत कदम उठाने और रणनीतिक के बजाय सामरिक विकल्प ने पार्टी को एक ऐसे दलदल में फंसा दिया है, जिससे उसे खुद को बाहर निकालना होगा।

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