फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मुद्दा: क्या सिर्फ रिपोर्ट से शोषण रुकेगा, पिछले अनुभव करते हैं निराश

क्षमा शर्मा
Updated Mon, 26 Aug 2024 06:56 AM IST

सार

मलयालम फिल्मोद्योग में महिलाओं की स्थिति पर जस्टिस हेमा कोहली की रिपोर्ट ने केरल की राजनीति में भूचाल ला दिया है। पर क्या इससे स्थिति बदलेगी?
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर।


केरल उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जब अंततः बीते 19 अगस्त को सरकार द्वारा इसे जारी किया गया, तभी से वहां राजनीतिक भूचाल आ गया है। इस रिपोर्ट का वुमेन ऐंड सिनेमा कलेक्टिव ने स्वागत किया है। इस संगठन ने कहा है कि इतिहास में यह पहली बार है, जब हमारे पास एक ऐसी रिपोर्ट है, जो बताती है कि फिल्मी दुनिया में लैंगिक असमानता कितनी ज्यादा है। मलयाली फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्रियां किस तरह शोषण का शिकार होती हैं, इसकी कहानी जैसे रिपोर्ट का हर पृष्ठ कहता है। इसमें बताया गया है कि जैसे ही कोई स्त्री मलयालम फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करती है, सबसे पहले काम देने के बदले उससे सेक्सुअल फेवर की मांग की जाती है। यदि वह ऐसा करने से मना करती हैं, तो उसे कहीं काम नहीं मिलता। इसके अलावा, ठहरने के लिए अलग से कमरा, शौचालय की सुविधा, आने-जाने की व्यवस्था और सुरक्षित वातावरण जैसी मामूली सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। कार्यस्थल पर स्त्रियों से अश्लील बातें करना, समय पर पैसे न देना, दिए भी तो आधे-अधूरे पैसे देना, शिकायतों के लिए किसी संस्था का न होना आदि ऐसी बातें हैं, जो स्त्रियों ने हेमा कमेटी के सामने बताई थीं। जिन अभिनेत्रियों ने जस्टिस हेमा कमेटी के सामने बयान दिए, उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया।


बत्तीस साल की एक अभिनेत्री ने बताया कि जब वह जस्टिस हेमा कमेटी के सामने बयान देने गई, और खुलकर अपनी बातें रखीं, तो उसे काम मिलना बंद हो गया और उसे फिल्मी दुनिया को छोड़ना पड़ा। आज वह एक मामूली-सी नौकरी करती है।


ऐसे ही अनुभव वुमेन सिनेमा कलेक्टिव से जुड़ी बहुत-सी अभिनेत्रियों और तकनीकी क्षेत्र की विशेषज्ञ महिलाओं के हैं। इनमें से अधिकांश का कहना है कि चूंकि उन्होंने काम की खराब परिस्थितियों के बारे में बोला है, इसलिए उन्हें परेशानी पैदा करने वाली महिला बताया जाता है। कहा जाता है कि वे उन समस्याओं के बारे में बता रही हैं, जो मलयालम फिल्मोद्योग में हैं ही नहीं। जबकि तमाम भुक्त-भोगियों का कहना है कि यह उद्योग लैंगिक भेदभाव के मामले में बहुत निचले पायदान पर है।


मलयालम फिल्मोद्योग में काम करने वाली महिलाओं ने विरोध स्वरूप 2017 में एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट छोड़ दिया था। वे वुमेन सिनेमा कलेक्टिव की सदस्य बनी थीं। महिलाओं की शिकायत थी कि एसोसिएशन ने उस अभिनेता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिसने एक अभिनेत्री का यौन शोषण किया था। वह अभिनेत्री भी इस एसोसिएशन की सदस्य थी।


हिंदी फिल्म उद्योग में भी कास्टिंग काउच की शिकायतें अधिकांश अभिनेत्रियां करती रही हैं। ‘मी टू’ के बाद बड़ी संख्या में अभिनेत्रियों ने इस बारे में बातें की थीं। पर अफसोस की बात है कि जब भी वे बातें करती हैं, तो अक्सर कहती हैं कि फलां ने मुझे इस बारे में बताया था। अपने बारे में कभी नहीं कहतीं कि उन्हें भी इस तरह की मुसीबतों को झेलना पड़ा था। फिल्मी दुनिया में स्त्रियों के शोषण का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया भर में फिल्मों में काम करने वाली स्त्रियों को शारीरिक व मानसिक शोषण से गुजरना पड़ता है। एक बार अनुपम खेर ने एक विदेशी अभिनेत्री के बारे में कहा था कि काम पाने के लिए उन्हें फिल्म जगत से जुड़े तीन सौ पुरुषों को खुश करना पड़ा था। असल में अभिनेत्रियों को यही डर सताता है कि यदि वे अपने शोषण के बारे में बोलेंगी, तो उन्हें फिल्मोद्योग में काम नहीं मिलेगा।


गुजरे जमाने की मशहूर मराठी अभिनेत्री हंसा वाडेकर ने अपनी जीवनी में ऐसी ही बातों का उल्लेख किया था। यह जीवनी एक मशहूर हिंदी पत्रिका में धारावाहिक छपी थी। इसी जीवनी पर मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भूमिका नाम से फिल्म बनाई थी। आशा की जानी चाहिए कि जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट के बाद मलयाली फिल्मोद्योग में अभिनेत्रियों के कामकाज की स्थितियों में सुधार होगा। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next