अफगानिस्तान में आज राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर के लिए मतदान होना है। देश में पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता हस्तांतरण के तहत करजई के उत्तराधिकारी का निर्वाचन होगा। मतदाताओं में इसके प्रति उत्साह है। अफगानिस्तान की जनता शांति तो चाहती ही है, इसके अलावा स्थानीय आतंकी संगठनों को निरस्त्र करने, पुलिस और न्यायपालिका की छवि सुधारने, नस्लवादी हिंसा का समाधान ढूंढने और मानवाधिकार का पालन करने की वे उम्मीद करते हैं। लेकिन तालिबान ने आज होने वाले मतदान को बाधित करने की धमकी दी है।
दूसरे चरण में चुनाव मैदान में पूर्व विपक्ष के नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला और विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री अशरफ गनी ही रह गए हैं। अब्दुल्ला अब्दुल्ला की पहचान तालिबान के कट्टर विरोधी की रही है। वह पाकिस्तान के साथ समझौता शायद ही करना चाहेंगे, जबकि अशरफ गनी बता चुके हैं कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती उनकी नीति का बुनियादी हिस्सा होगी। अब्दुल्ला अब्दुल्ला को अमेरिका मोहरा भी नहीं समझा जाता। इसका उन्हें घरेलू राजनीति में फायदा मिल सकता है। इसके अलावा स्थानीय नस्लीय समीकरण की दृष्टि से भी वह अशरफ गनी की तुलना में बीस ठहरते हैं।
पर अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन का समय बहुत खतरनाक है, क्योंकि इसी साल विदेशी सैनिकों के वहां से रुख्सत होने की बात है। इसके मद्देनजर तालिबान ने न सिर्फ हमले तेज करने की चेतावनी दी है, बल्कि इस पर अमल भी शुरू कर दिया है। पिछले दस-बारह वर्षों में तालिबान कमजोर नहीं हुए हैं और उन्हें पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है। अमेरिका का मानना है कि अफगानिस्तान अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसलिए वह एहतियातन विदेशी सैनिकों की मौजूदगी वहां बनाए रखने का पक्षधर है। पर हामिद करजई ने अब तक सुरक्षा समझौते पर दस्तखत नहीं किए, हालांकि राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे मौजूदा दोनों उम्मीदवारों ने समझौते पर हस्ताक्षर करके विदेशी सैनिकों की मौजूदगी बरकरार रखने का वायदा किया है।
अंत-अंत में ओबामा और करजई के बीच के विवाद खुलकर सामने आ गए। तालिबान की कैद से अमेरिकी सार्जेंट ब्रोवे बर्गडैल की गुपचुप रिहाई की करजई ने आलोचना की है। पिछले महीने ओबामा जब बिना पूर्व सूचना के काबुल के बगराम सैनिक अड्डे पर पहुंचे थे, तब भी करजई ने उनसे मिलने से इन्कार कर दिया था। राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार इस मामले में ओबामा के बजाय करजई के समर्थन में हैं। ऐसे में, लगता यही है कि नए अफगान राष्ट्रपति जहां अमेरिका से खुली दोस्ती करने से बचेंगे, वहीं अमेरिका अपनी बची हुई फौज को निकाल ले सकता है। उसके बाद अफगानिस्तान में अस्थिरता का दौर शुरू हो सकता है।
तालिबान की हरसंभव कोशिश होगी कि भारत को बाहर निकाला जाए। भारत द्वारा अफगान फौज को मजबूत करने के लिए हथियारों व साजो-सामान के बदले रूस को रुपये का भुगतान करना उसे बहुत अखर रहा है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफगानिस्तान व पाकिस्तान को लेकर अपनी जिस उदार नीति का प्रमाण दिया है, वह भी तालिबान को हजम नहीं हो रहा। ऐसे में, मोदी सरकार को अफगानिस्तान मामले में सरकार की नीतियों की जल्द से जल्द समीक्षा करनी होगी। वह पड़ोसी देशों में लोकतांत्रिक शक्तियों को समर्थन देकर तथा रूस एवं चीन के साथ साझा आतंकवाद-विरोधी रणनीति बनाकर इस खतरे से निपट सकती है।