फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पहले से बुरी स्थिति में इराक

Fri, 13 Jun 2014 08:22 PM IST
डेविड ब्रुक्स
विज्ञापन
विज्ञापन
वर्ष 2003 में अमेरिका ने जब इराक पर हमला किया था, तब उसने सफलता के साथ वहां की सरकार को ध्वस्त कर दिया था। लेकिन धीरे-धीरे अपनी गलतियों से सबक लेते हुए उसने अगले आठ वर्ष वहां बिताए, ताकि राज्य का पुनर्निर्माण हो सके। इस दौरान उसका वहां रहना काफी खर्चीला भी रहा। इस अखबार के लिए इराक युद्ध की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार डेक्सटर फिल्किन्स ने इसी सप्ताह द न्यूयॉर्कर पर अपने ब्लॉग में लिखा है, वर्ष 2011 से अमेरिका वहां अपने लक्ष्य में सफल रहा है, फिर भी वह अपना काम पूरा नहीं कर सका।
विज्ञापन


इराक में स्थानीय सेना ज्यादा पेशेवर तरीके से काम कर रही थी। प्रधानमंत्री नूरी कमाल अल मालिकी धार्मिक भावनाओं में बह न जाएं, इसलिए अमेरिकी राजनयिकों ने उन पर नियंत्रण बनाए रखा। अमेरिकी जनरलों ने चेतावनी दे रखी थी कि अगर मालिकी ऐसा कोई भी आदेश देते हैं, जिससे यह लगे कि वह लोगों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं, तो वे इराक में सेना की आवाजाही बंद कर देंगे।

हमें यह कभी पता नहीं चल सकेगा कि ये सारे प्रयास एक आत्मनिर्भर और स्थिर इराक की बुनियाद रखने में कितना सफल हो सके। लेकिन जब इराक अपने पैरों पर खड़े होने के करीब था, तब ओबामा प्रशासन नाटो सैन्य समझौते से जुड़े मुद्दे पर बातचीत किए बगैर ही, जिसमें कुछ अमेरिकी सैनिकों की वहां मौजूदगी संबंधी प्रावधान थे, वहां से निकल आया। अमेरिकी सैनिकों की वतन वापसी शुरू होने से कुछ महीने पहले तक ओबामा प्रशासन ने वार्ता भी शुरू नहीं की थी। जैसा कि फिल्किन्स ने लिखा है, चूंकि ह्वाइट हाउस की इस मामले में ज्यादा रुचि नहीं थी, इसलिए ओबामा और मालिकी के बीच बातचीत की कड़ी टूट गई।
विज्ञापन


वर्ष 2011 में अमेरिकी सैनिक इराक से निकल गए। राष्ट्रपति ओबामा ने घोषणा कर दी कि इराक युद्ध खत्म हो गया है। ओबामा प्रशासन का यही आकलन था कि क्षेत्र में छिटपुट विद्रोह के अलावा चारों ओर शांति है। पर लगभग तभी से हालात बिगड़ने शुरू हो गए। मालिकी की कट्टरवादी कोशिशों पर अंकुश लगाने के लिए वहां कोई नहीं बचा। नतीजतन इराकी सेना को पेशेवराना बनाने की अमेरिकी कोशिश अधूरी ही रह गई।

अमेरिकी सीनेटरों के अलावा फौज ने भी तब यह भविष्यवाणी की थी कि इराक गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है। वहां उभरती सांप्रदायिक हिंसा ने इस आशंका में घी डालने का काम किया कि यह पूरा क्षेत्र भयावह युद्ध का गवाह बनेगा। यह युद्ध शिया और सुन्नियों के बीच होगा, जो सीमाओं को पार कर करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले लेगा।

सीरिया में जारी गृहयुद्ध ने भी इराक की अराजक स्थिति को बिगाड़ने का काम किया, जो लगभग उसी समय शुरू हुआ था। शिया-सुन्नी के मुद्दे पर गंभीर रूप से बंटे हुए दोनों देश बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा के साये में आगे बढ़ रहे थे।
इराक से अमेरिकी सैनिकों की जल्द वापसी के खतरों से अगाह करने वालों ने ही ओबामा से अनुरोध किया था कि वह सीरिया में नरमपंथियों को मजबूत बनाएं। वे ओबामा का हाथ मजबूत करने के लिए इस लड़ाई में शामिल भी हुए। लेकिन कुछ खास नहीं किया जा सका। वहां उदारवादी मानसिकता वाला विपक्ष मन मसोस कर रह गया। मरने वालों की संख्या बढ़ी, और वहां कट्टरपंथी गुट आईएसआईएल (जो इराक समेत आसपास के इलाकों में इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए काम करता है) का कब्जा हो गया। वह इसका उपयोग खुद के संगठित होने और नए लड़ाकों को भर्ती करने में करने लगे। राष्ट्रपति ओबामा ने रक्षात्मक रवैया अपनाया। उनका तर्क था कि ऐसी स्थिति में अमेरिकी हस्तक्षेप से सीरिया को नुकसान ही होगा। लिहाजा अमेरिकी प्रभाव कम किया गया।

नतीजतन अब एक भयावह युद्ध की आशंका सच साबित होती दिख रही है। आईएसआईएल सीरिया और इराक के बढ़ते क्षेत्रों में एक वास्तविक सरकार के रूप में काम करने लगा है। संख्या में कम होने के बावजूद कट्टरपंथी लड़ाके इराक की सेना पर हावी हो रहे हैं। ऐसे में, इराक एक गैर-राष्ट्र बनने के खतरे से जूझ रहा है।

इराक में स्थिति सुधारने की दिशा में काम करने वाले एंड्रयू ह्वाइट ने अपने ब्लॉग में लिखा है, 2003 के युद्ध के बाद राष्ट्र अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। आईएसआईएल मोसुल पर कब्जा जमाने में न सिर्फ कामयाब हो गया है, बल्कि उसने वहां तमाम सरकारी भवन ध्वस्त कर दिए हैं। कैदियों को जेल से आजाद कर दिया गया है और अनगिनत लोगों की हत्या हुई है।

इस बीच, आसपास के निरंकुश तत्व व्यापक युद्ध की तैयारी में जुट गए हैं। पाकिस्तानी तालिबान का बढ़ता प्रभाव यही बता रहा है। यमन और लीबिया में भी अराजकता फैल रही है। कट्टरपंथी जेहादी तो सक्रिय हुए ही हैं, उन्होंने हजारों लड़ाकों को भी अपने साथ जोड़ लिया है।

दरअसल अमेरिका की लगातार दो सरकारों ने इराक में अपनी सबसे खराब विदेश नीति को अंजाम दिया है। पुनर्निर्माण की प्रक्रिया पूरी किए बिना वहां से अमेरिकी सैनिकों की जल्दी वापसी करके ओबामा प्रशासन ने कुछ वैसी ही गलतियां कीं, जो पूर्व की जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने की थी। यह अमेरिकी दखलंदाजी का सबसे भयावह प्रदर्शन है।

बहरहाल, अब भी इतना ज्यादा विलंब नहीं हुआ है कि हम सीरियाई उदारवादियों की मदद न कर सकें। इराक के लिए भी बेहतर यही होगा कि वहां से सैनिकों को वापस न निकाला जाए। सांप्रदायिक तनाव दूर करने के लिए जरूरी है कि वहां मालिकी की मदद की जाए। ऐसा नहीं है कि इराकी सरकार क्षेत्रीय प्रशासनिक इकाइयों को मजबूत नहीं कर सकती। मालिकी सेना को फिर से पेशेवर होने में मदद कर सकते हैं। संविधान में प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की अवधि तय की जा सकती है। लेकिन ये सारे प्रयास तभी सफल हो सकते हैं, जब अमेरिका व्यावहारिक रुख दिखाए। अमेरिका कभी-कभी उदासीन रवैया अपनाता है, जबकि उसकी ओर से चौकन्नेपन की जरूरत है। राष्ट्रपति ओबामा अपने फैसलों को बेवकूफी नहीं मानते। पर उन्हें याद रखना चाहिए कि खुद को किनारे करना कभी-कभी सबसे बड़ी बेवकूफी साबित होता है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें