अध्ययनों से पता चला है कि बांस पारंपरिक पेड़ों की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकते हैं। यह कार्बन पौधे के तने, पत्तियों और जड़ों सहित बायोमास में जमा होता है। इसके अतिरिक्त, बांस की व्यापक जड़ प्रणाली मिट्टी को स्थिर करने और कटाव को रोकने में मदद करती है, जिससे कार्बन के प्राकृतिक भंडारण में भी मदद मिलती है। बांस का उच्च बायोमास उत्पादन जलवायु परिवर्तन के शमन का महत्वपूर्ण कारक है। यह बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ का उत्पादन करता है, जिसका उपयोग बायोएनर्जी सहित विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। बांस के बायोमास को बायोचार में परिवर्तित किया जा सकता है, जो चारकोल का एक रूप है, और सैकड़ों वर्षों तक कार्बन को वायुमंडल से अलग कर सकता है। बांस लकड़ी का एक स्थायी विकल्प प्रदान करता है। इसकी कटाई के बाद इसे दोबारा लगाने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि अपनी जड़ से यह दोबारा उगता है। बांस पारंपरिक वनों पर दबाव भी कम करता है और इस तरह वन और जल संरक्षण में योगदान देता है।
दुनिया भर में बांस के जंगल लगभग 3.15 करोड़ हेक्टेयर में फैले हुए हैं। चीन, भारत और म्यांमार प्रमुख बांस उत्पादक देश हैं। कई वैश्विक पहलें जलवायु परिवर्तन के शमन में बांस की भूमिका पर जोर देती हैं। इथियोपिया और घाना जैसे देश अपने पुनर्वनीकरण और भूमि बहाली प्रयासों के तहत बांस की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। कोलंबिया और इक्वाडोर जैसे देश सतत विकास और जलवायु लचीलेपन के लिए बांस को अपनी राष्ट्रीय रणनीतियों में शामिल कर रहे हैं। चीन ने भी जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए बांस की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े बांस उत्पादकों में से एक है, जहां लगभग 1.4 करोड़ हेक्टेयर बांस के जंगल हैं। असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम सहित पूर्वोत्तर राज्यों में देश के बांस संसाधनों का 50 फीसदी से अधिक हिस्सा है। केंद्र सरकार के बांस मिशन का उद्देश्य बांस की खेती और इसके टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना है। भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि भारत में बांस के जंगल प्रति वर्ष लगभग 12 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकते हैं। यह आंकड़ा भारत के जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों में बांस के संभावित योगदान को दर्शाता है। राष्ट्रीय बांस मिशन (एनबीएम) ग्रामीण समुदायों की आजीविका बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने के लिए गैर-वन क्षेत्रों में बांस की खेती को बढ़ावा देता है। विभिन्न राज्य सरकारों ने बांस की खेती और उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए कार्यक्रम शुरू किए हैं।
बांस की खेती और प्रबंधन के बारे में सीमित जागरूकता है। इसके अतिरिक्त, बांस के कार्बन पृथक्करण को मापने के लिए मानकीकृत पद्धतियों की कमी इसके जलवायु लाभों के मूल्यांकन को जटिल बनाती है। बांस के पारिस्थितिक और आर्थिक लाभों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अनुसंधान में निवेश करना, बांस की खेती, उपयोग और व्यापार को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाना, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों और हितधारकों की क्षमता को बढ़ाना और बांस उत्पादों के लिए बाजार बनाना और विस्तार करना जरूरी है। बांस जलवायु परिवर्तन के शमन के लिए आशाजनक समाधान प्रस्तुत करता है। यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक मूल्यवान संसाधन है। सरकारों, अनुसंधान संस्थानों और समुदायों के ठोस प्रयासों से बांस सतत विकास को बढ़ावा देते हुए वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकता है। बांस की क्षमता का उपयोग करके हम एक हरित जलवायु-प्रिय भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।
-लेखिका राष्ट्रीय बांस मिशन की सलाहकार हैं।