आमजन की आशा भी है कि आस्थावान, राममय देश में रामराज्य के लोकतंत्र की भी स्थापना हो। क्या जनता के रामराज्य के सपने को सपने जैसा विशाल जनमत पाई सरकार समझती है? अपने देश के पौराणिक ग्रंथों में रामराज्य के लोकतंत्र का उद्देश्य और माहात्म्य है। तुलसीदास रचित रामतरितमानस के उत्तरकांड में रामराज्य का वर्णन आता है, राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका/बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।
तुलसीदास की पौराणिक आशा को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने भी दोहराया था। तब की परिस्थितियों को समझते हुए रामराज्य के अपने तात्पर्य को समझाते हुए उन्होंने कहा था, 'रामराज्य से मेरा तात्पर्य हिंदू राज से नहीं है। रामराज्य से मेरा तात्पर्य दिव्य राज, द किंगडम ऑफ गॉड से है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही देवता हैं। मैं किसी अन्य ईश्वर को नहीं, बल्कि एक सत्य और नीतिपरायणता के ईश्वर को स्वीकार करता हूं। चाहे मेरी कल्पना के राम इस धरती पर कभी रहे हों या नहीं, रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है, जिसमें सबसे कमजोर नागरिक भी विस्तृत और महंगी प्रक्रिया के बिना शीघ्र न्याय सुनिश्चित कर सकता है।'
उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा था, ‘मेरे सपनों का रामराज्य राजा और रंक, दोनों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करता है। राजनीतिक स्वतंत्रता से मेरा तात्पर्य ब्रिटेन, रूस या इटली या जर्मनी के शासन की नकल से नहीं है। उनके पास उनकी प्रतिभा के अनुकूल प्रणालियां होंगी। हमें अपने स्वयं के अनुकूल प्रणाली बनानी चाहिए। वह क्या हो सकती है, यह मैं जितना बता सकता हूं, उससे कहीं अधिक है। मैंने इसे रामराज्य के रूप में वर्णित किया है। अर्थात शुद्ध नैतिक अधिकार पर आधारित लोगों की संप्रभुता। अन्यायपूर्ण असमानताओं की वर्तमान स्थिति में कोई रामराज्य नहीं हो सकता है, जिसमें कुछ लोग अति अमीर हैं और ज्यादातर जनता को खाने के लिए भी पर्याप्त नहीं है।’
गांधी जी ने रामराज्य के संदर्भ में अपने धर्म के बारे में भी कहा था, 'मेरा हिंदू धर्म मुझे सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाता है। इसी में रामराज्य का रहस्य छिपा है। यदि आप ईश्वर को रामराज्य के रूप में देखना चाहते हैं, तो पहली आवश्यकता है आत्म-निरीक्षण। हमें अपने दोषों को दूर करना होगा और अपने पड़ोसियों के दोषों पर आंखें मूंद लेनी होंगी। वास्तविक प्रगति का यही एकमात्र रास्ता है।... रामराज्य यानी पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य।'
आज परिस्थिति बेहतर है, इसलिए आने वाली स्थितियों का निडरता से सामना करने की तैयारी के बारे में समाज सीख सकता है। राम मंदिर व अन्य तीर्थस्थलों में बनाए गए गलियारों से पर्यटन के रोजगार और अध्यात्म की समझ में वृद्धि की आशा लगाई जा रही है। एक तरह से वहीं के लोगों को वहीं रोजगार मिले, तो अच्छा ही है। सिर्फ औद्योगिक या राजनीतिक शहर ही प्रगति या विकास करें, तो सारे समाज की रचनात्मकता का क्या होगा?
इसलिए छोटे शहरों का उत्थान भी राज्यसत्ता की जिम्मेदारी है। पर्यटन बढ़े, तो पलायन रुके, तभी प्रगति हो। यही सब सोचकर अयोध्या से सांसद लल्लू सिंह ने छह साल पहले अयोध्या पर्व मनाना शुरू किया था। वह अयोध्या के जनजीवन, संस्कृति और अध्यात्म से जुड़े पहलुओं पर प्रकाश डालते आ रहे हैं, अयोध्या की चौरासी कोस यात्रा का माहात्म्य राजधानी में समझाते आ रहे हैं। अयोध्या से ही समरस समाज के रामराज्य की शुरुआत होनी चाहिए।