दूसरी ओर वे हैं, जो कभी ‘प्रो राम’ और ‘प्रो मंदिर’, कभी ‘दुविधाग्रस्त’ और कभी 'अवसरवादी’ और कभी ‘राम विरोधी’ जैसे नजर आते रहे हैं और फिर भी ‘असली रामभक्तों’ से चिढ़कर अपने को ‘असली रामभक्त’ की तरह दिखाना चाहते हैं, ताकि रामभक्त उनसे नाराज न हो जाएं। इनका मानना है कि राम तो सबके हैं, लेकिन उनको ऐसे राजनीतिक समूह ने हथिया लिया है, जो राम को अपनी राजनीति का हथियार बनाकर चौबीस की वैतरणी पार करना चाहता है।
हमारी नजर में राम मंदिर पर वर्चस्व की इस लड़ाई में ऐसे तत्व संघ, भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी से लड़ते-लड़ते सीधे भगवान राम से ही लड़ गए दिखते हैं। ये समझ नहीं पा रहे कि भाजपा से लड़ना संभव है, लेकिन राम से लड़ना असंभव है। ‘असली रामभक्तों’ को आप लाख दिखावटी, कर्मकांडी, प्रदर्शनप्रिय, कम्यूनल, फासिस्ट कहें, वे ऐसे आरोपों के कारण अपने को ‘रक्षात्मक’ नहीं दिखाते, क्योंकि वे रामभक्त जनता की भावनाओं के साथ अपनी भावनात्मक तादात्म्यता पर अटूट व अखंड विश्वास रखते हैं।
धर्मप्राण जनता का यह एक ऐसा रिप्रेजेंटेशन है, जो आधुनिक 'सामाजिक समझौते’; सोशल कांट्रेक्ट से भी आगे जाता है। यह उस ‘भावनात्मक एकता’ का ‘समुच्चय’ है, जिसे ‘भक्ति’ कहा जाता है, जो मध्यकाल में एक विदेशी धर्म के आक्रमण की प्रतिक्रिया में पैदा हुई और जिसे ‘सेक्यूलर इतिहासकारों’ ने ‘मध्यकालीन बोध’ के नाम से 'फिक्स' किया, जिसे हम आज की पदावली में मध्यकालीन सहमति’; मेडिएवल कंसेंसस कह सकते हैं, जो एक विदेशी धर्म की सत्ता की कमान के नीचे बनी। हिंदी साहित्य के आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की मानें, तो यह ‘सहमति’ या भक्ति विदेशी आक्रांताओं के आगे एक ‘पराजित जाति का अंतर्मुखी’ हो जाना थी, जो पांच सौ से अधिक बरस बाद अब आकर ‘बहिर्मुखी’ हो रही है। स्पष्ट है कि ‘मध्यकालीन कंसेंसस’ जा रहा है और ‘नया कंसेंसस’ बनाया जा रहा है। सारी आकुलता इसी विराट ‘भाव प्रतिवर्तन’ से हो रही है।
उक्त दूसरी श्रेणी के भक्त इस ‘भाव प्रतिवर्तन’ से परेशान हैं, लेकिन उनके पास हिंदुत्व द्वारा हर रोज ‘सीमेंटित’ किए जा रहे इस ‘प्रतिवर्तन’ की कोई काट नहीं है। कई सोचते हैं कि ‘जाति गणना’ इसकी काट है, लेकिन जाति भी एक ‘हिंदू कैटेगरी’ है, जो अंततः हिंदुत्व को ही पुष्ट करती है। मंडल के बाद कमंडल से निकला ‘अधिक उर्जस्वी हिंदुत्व’ इसका प्रमाण है। इसी श्रेणी के कुछ ‘पार्ट टाइम भक्त’ हिंदुत्व की काट के लिए ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ के सवाल खड़े करके सोचते हैं कि इससे हिंदुत्व का जादू टूट जाएगा।
ऐसा कहते हुए वे भूल जाते हैं कि हिंदुत्व की अब तक ‘अविच्छेद्य अखंडता’ ही इन तात्कालिक सवालों का जवाब है, जो कहती है कि एक बार अपना ‘पूर्ण वर्चस्व’ हो जाए, तो ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ भी ठीक हो जाएगी। यों भी जब सदियों का ‘पराजय भाव’ आज के ‘विजय गर्व’ में डूबा हो, तो ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ ज्यादा महसूस नहीं होती, इसीलिए गरीब से गरीब रामभक्त तक कह देता है कि ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ कब नहीं थी? और उनके होने की वजह से क्या हम अपने भगवान राम को छोड़ दें? गोस्वामी तुलसीदास के मानस के ‘राम’ का जादू इसी तरह सिर चढ़कर बोलता है। आप यहां सबसे लड़ सकते हैं, ‘राम’ से नहीं।
‘अवसरवादी भक्त’ इतने से मर्म को नहीं समझ पाते कि धर्म सिर्फ कमजोर की कमजोरी नहीं है, बल्कि वह उसके लिए ‘परम आनंद’ का कारण और ‘परम मोक्ष’ का सपना है। जो समाज अपने इष्ट के लिए अक्सर ‘व्रत’ व ‘उपवास’ करता हो, भूखा रहता हो, उस समाज को ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ कहां व्यापती है?
‘असली भक्तों’ के तर्क इसी तरह चलते हैं और ‘नकली भक्तों’ के तर्कों को बेकार करते रहते हैं। इस तरह, असली भक्त जहां 22 जनवरी को एक ‘सांस्कृतिक नवजागरण दिवस’ की तरह जता, बता और मना रहे हैं, वहीं इसी रामभक्ति के ‘सिंक’ में डूबा मीडिया, अयोध्या के विकास व भव्य, दिव्य राम मंदिर की साज-सज्जा को चौबीस बाई सात के हिसाब से दिखाते हुए एक ‘नया सांस्कृतिक जागरण’ बता रहा है।
राममय हुआ मीडिया बताता रहता है कि मंदिर निर्माण के लिए कितना आया और कौन क्या दे रहा है, गर्भगृह में राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के लिए प्रधानमंत्री व पुजारियों द्वारा कितने व कैसे अनुष्ठान व जप, तप किए जा रहे हैं और आज की ‘अयोध्या’ किस तरह से नए भारत की ‘वेटिकन सिटी’ या ‘मक्का- मदीना’ बनने जा रही है!
विचित्र कंट्रास्ट है : एक ओर ‘असली भक्त’ निमंत्रण दे रहे हैं, दूसरी ओर ‘अवसरवादी भक्त’ सिर्फ ‘छिद्रान्वेषण’ व ‘रूठने-मटकने’ में लगे हैं। एक भक्त भजन गा रहे हैं, दूसरे उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। खिल्ली उड़ाने वाला सिर्फ ‘प्रतिक्रियावादी’ होता है। तीसरे श्रेणी के भक्त वे हैं, जो जरूरत पड़ने पर अचानक ‘हनुमान भक्त’ बन जाते हैं। चौथे ऐसे हैं, जो धर्म को अफीम मानते हैं, फिर भी धर्म-कर्म पर टिप्पणी करते रहते हैं।
पिछले एक महीने से हम अयोध्या के बहाने एक ऐसा नया ‘धर्मयुद्ध' होते देख रहे हैं, जहां कथित मध्यकालीन सहमति ‘अंतर्मुखी’ की जगह ‘बहिर्मुखी’ हो चली है। तब विदेशी धर्म का शासन था, अब स्वदेशी धर्म का शासन है, और हम देख रहे हैं कि जो तब ऊपर थे, अब नीचे हैं। यह एक बुहत बड़ा ‘प्रतिवर्तन’ है, जिसे समझे बिना हम आज के असली भक्तों और नकली भक्तों के संघर्ष को नहीं समझ सकते, न उसमें हस्तक्षेप ही कर सकते हैं!