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टाइम मशीन: अतीत में गुम रास्ता, जहां कभी होता था भारतीय कारोबारियों का राज

अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 18 Feb 2024 07:24 AM IST

सार

बाकू और अस्त्राखान के व्यापारी आपको बताएंगे कि भारतीय व्यापारी सभी तरह के सामानों की बिक्री के अलावा पैसे उधार देने, बिल डिस्काउंटिंग और बैंकिंग सेवाएं भी देते थे। अस्त्राखान में रहने वाले भारतीयों की आपूर्ति ईरान और अफगानिस्तान से होती थी और उनका अग्रिम व्यापार नेटवर्क मास्को या निजनिनी नोवोगोरोड में खत्म होता था।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : ANI


मगर क्या सच में यह नया व्यापार मार्ग था या दुनिया के सबसे पुराने व्यापार कॉरिडोर की नई शुरुआत भर थी?

तो आइए, बैठिए टाइम मशीन में, हम आपको सीधे ले चलते हैं अस्त्राखान और फिर बाकू। 16वीं-17वीं सदी के जगमगाते इतिहास वाले ये शहर उसी व्यापार मार्ग पर स्थित थे, जिसे स्वेज के बजाय वैकल्पिक रास्ते के तौर खोला जा रहा है।

अस्त्राखान और बाकू शहरों पर भारतीय कारोबारियों का राज चलता था, जो अपनी ताकत से रूस के जार को प्रभावित करते थे। इस सफर में आप मिलेंगे अस्त्राखान के शाह यानी भारत के ऐसे व्यापारियों से, जिनका रूस से लेकर ईरान तक सिक्का चलता था। बाल्टिक सागर के किनारे सेंट पीटर्सबर्ग से चला यह कंटेनर जिस रास्ते से कैस्पियन सागर के तट पर अस्त्राखान पहुंचा था, वह प्राचीन वोल्गा कैस्पियन मार्ग था, जो उप-मार्गों के जरिये सिल्क रूट से जुड़ जाता था। नौवीं शताब्दी में इसी रास्ते से नॉर्वे के वाइकिंग सिल्क यानी रेशम लेकर अपने देश लौटते थे।


ओस्लो विश्वविद्यालय के अध्ययन बताते हैं कि यह चीनी रेशम कांस्टेनोपल यानी आज के इस्तांबुल से खरीदा जाता था। इस शहर को वाइकिंग मिक्लागार्ड कहते थे। सिल्क रोड को जोड़ने वाले रास्तों से चीन का यह रेशम कांस्टेनोपल आता था।

टाइम मशीन उड़ान भर चुकी है। अब हम 16वीं-17वीं सदी के बाकू में हैं।  आज भी यदि कोई चटगांव (बांग्लादेश) से यात्रा शुरू कर हावड़ा के जरिये गंगा-यमुना दोआब में आए, तो आगे अमृतसर के रास्ते पेशावर-काबुल होते हुए बलख और बुखारा तक पहुंच जाएगा। यही रास्ता आगे कैस्पियन सागर के किनारे बाकू तक जाता है, जहां हम मौजूद हैं और यह सोलहवीं सदी है। बाकू में आपको पगड़ी बांधे मुल्तानी और शिकारपुरी व्यापारी मिल जाएंगे, जो आर्मेनियाई सौदागरों से कारोबार कर रहे हैं। आपको यहां साइबेरियाई तातार दिखेंगे, जो भारत के सफेद कॉटन या लिनेन के लिए मुंहमांगी कीमत दे रहे हैं।


और यह क्या? बाकू में आप कुछ देख रहे हैं? एक अनोखी इमारत। यह प्रसिद्ध आतिशगाह है। यह एक मंदिर है, जिसमें आदिग्रंथ (गुरुग्रंथ साहिब) का पाठ, गणेश व देवी की पूजा-अर्चना होती थी।

आगे चलते हैं...अब आप अस्त्राखान में हैं, जहां भारतीय शाह यानी व्यापारियों का जलवा देखते ही बनेगा। मुल्तान के ये व्यापारी रूसी जार तक पहुंच रखते थे। रूसी अभिलेखागार में संरक्षित दस्तावेजों से पता चलता है कि 17वीं सदी में अस्त्राखान में भारत का एक अग्रणी व्यापारी था, जिसका नाम था सुतुर। सुतुर 1620 के दशक में ईरान से अस्त्राखान पहुंचा था। उसके भाई उत्तरी ईरानी शहरों में व्यापार करते थे। सुतुर ने दावा किया कि 1646 में उसके निमंत्रण पर उसके भाई और 25 अन्य भारतीय व्यापारी बहुत से माल के साथ अस्त्राखान पहुंचे और उनमें से कुछ यहीं बस भी गए। सुतुर की पहुंच इतनी ऊंची थी कि उसकी शिकायत पर जार ने व्यापारियों को सताने वाले एक सरकारी अधिकारी को तुरंत पद से हटा दिया। 1647 में सुतुर ने अस्त्राखान में गोस्टनी यानी गेस्ट हाउस बनवाया।
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यह एक किस्म का आवासीय बाजार था। गोस्टनी गेट के अंदर रहने वाले अमीर भारतीय व्यापारी परंपरागत पूजन और भोजन पद्धतियों का पालन करते थे। तब यहां 26 बड़े भारतीय व्यापारी रह रहे थे, जो इस्फहान और काजविन से सामान लाकर रूस भेजते थे। सुतुर उस दौर का पहला बहुराष्ट्रीय कारोबारी रहा होगा। उसने मास्को में एक कारोबारी प्रतिष्ठान बनवाया, जहां वह खुद तीन साल तक रहा। ईरानी और रूसी अभिलेखों में मुल्तानी शब्द का उल्लेख है। ये संभवत: खत्री, मारवाड़ी व जैन थे, जिनका मूल निवास मुल्तान था और जहां समृद्ध पुरुषों को शाह कहा जाता था। ये कारोबारी सुदूर स्थानों में अपने एजेंट भी नियुक्त करते थे। 17वीं सदी के बाजार से टहलते हुए आपको पता चलेगा कि इस्फहान में 17वीं सदी के मध्य में दस हजार भारतीय स्थायी रूप से बसे हुए थे। इनका व्यापार तब के अफगानिस्तान के सभी शहरों और कस्बों में फैला हुआ था। 1727 में भारतीय व्यापारियों विषनात नरमलदास (विश्वनाथ निर्मलदास), अरदयाल (हरदयाल) व नारायण चंचामल के रूसी शासन के साथ पत्र-व्यवहार के प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने अपने कारोबार के बदले रूसी अधिकारियों से रियायत हासिल की थी।


सुखानंत दिरिमदास (सुखानंद दिरमदास) भी परंपरागत मुल्तानी शाह थे। वह 17 साल की उम्र में मुल्तान से अस्त्राखान आए। 1759 में 60 साल की उम्र में मास्को में उनकी मौत हुई थी। उनकी संपत्ति का मूल्य तीन लाख रूबल था, जबकि उस वक्त एक संपन्न रूसी व्यापारी के पास बमुश्किल 1,000 रूबल की संपत्ति होती थी। बाकू और अस्त्राखान के व्यापारी आपको बताएंगे कि भारतीय व्यापारी सभी तरह के सामान की बिक्री के अलावा पैसे उधार देने, बिल डिस्काउंटिंग और बैंकिंग सेवाएं भी देते थे। अस्त्राखान में रहने वाले भारतीयों की आपूर्ति ईरान और अफगानिस्तान से होती थी और उनका अग्रिम व्यापार नेटवर्क मास्को या निजनिनी नोवोगोरोड में खत्म होता था। तभी तो 1723 में, अनबू राम मुलिन ने जार पीटर महान से प्रार्थना की कि उसे सेंट पीटर्सबर्ग और आर्कएंजेल में व्यापार करने की छूट दी जाए। मुलिन चाहते थे कि उन्हें रूस के रास्ते एक ओर जर्मनी और दूसरी ओर चीन में व्यापार करने का अधिकार मिल जाए।


18वीं सदी के अंत तक रूस के व्यापारी अपने रसूख के इस्तेमाल से भारतीय कारोबारियों को रोकने में लगे थे। इसलिए शायद अनबू राम को जार की मंजूरी नहीं मिली। टाइम मशीन के 21वीं सदी की तरफ बढ़ते हुए 18वीं सदी के मध्य का वह दौर दिखेगा, जब अफगानों के हमले ने ईरान की सफाविद सल्तनत को उखाड़ फेंका। इस्फहान को गिलजाइयों ने लूट लिया। इस उथल-पुथल से अस्त्राखान में भारतीय व्यापारियों की आपूर्ति शृंखला खत्म हो गई। अगले दो दशकों में, अस्त्राखान में भारतीय आधे रह गए और शताब्दी के अंत तक लगभग खत्म हो गए।


1832 में जब एलेक्जेंडर बर्न्स काबुल आया, तब उसे ऊपरी वोल्गा क्षेत्र के निजनी नोवागोरोड, अस्त्राखान और बुखारा में भारतीय हुंडियों के इस्तेमाल का पता चला था। यह आखिरी बार था, जब हमने अस्त्राखान और रूस के अंदरूनी हिस्सों में पारंपरिक भारतीय व्यापारियों के बारे में सुना। टाइम मशीन अब आज के अस्त्राखान और बाकू के करीब से उड़ान भर रही है। हमें सेंट पीटर्सबर्ग से अस्त्राखान, अंजाली और बंदर अब्बास से मुंबई तक जाता हुआ कंटेनर दिख रहा है। इस रास्ते का नया नाम इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर है। भारत, ईरान और रूस ने वर्ष 2000 में इस संधि पर दस्तखत किए थे। 7,200 किलोमीटर का यह कॉरिडोर भारत, ईरान, अजरबैजान और रूस को जोड़ता है, जो हिंद महासागर, अरब सागर, कैस्पियन और बाल्टिक सागर को जोड़ने वाला सबसे छोटा रास्ता भी है। टाइम मशीन अब मुंबई में उतर रही है, जहां शिपिंग कंपनियां स्वेज के रास्ते के बंद होने की बढ़ती लागत का हिसाब कर रही हैं। कारोबार सड़कों को छोड़ समुद्रों की तरफ मुड़ा, तो आगे बढ़ा और फला-फूला। मगर वक्त ने अब फिर कारोबार को इतिहास में खो चुकी सड़कें तलाशने को मजबूर कर दिया है।

आज का सफर यहीं तक। फिर मिलते हैं अगली उड़ान पर।
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