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प्राचीन : भारतीय सिंधी क्यों नहीं भुला पाते सिंध को, इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं कई घटनाएं

प्रहलाद सबनानी
Updated Wed, 17 Aug 2022 07:06 AM IST

सार

भारत से कृषि उत्पादों, मसालों एवं कपड़े आदि के निर्यात से विदेशी मुद्रा के रूप में सोना प्राप्त होता था, अतः भारत में सोने के अथाह भंडार जमा हो गए थे। भारत से होने वाला विदेशी व्यापार भी सामान्यतः सिंध स्थित बंदरगाहों के माध्यम से होता था।
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सिंधी समाज के लोग। - फोटो : अमर उजाला।


इसी कारण से सिंध प्रांत ने अरब देशों से भारत पर होने वाले आक्रांताओं के वार भी सबसे अधिक सहे। सिंध की पावन भूमि वैदिक संस्कृति एवं प्राचीन सभ्यता का केंद्र रही है। वहां अनेक ऋषियों एवं संत-महात्माओं ने जन्म लिया है। आज के बलूचिस्तान, ईरान, कराची और पूरे सिंधु इलाके के राजा थे दाहिरसेन। उन्हें सिंध का अंतिम हिंदू शासक माना जाता है और उन्होंने ही सिंध राज्य की सीमाओं का कन्नौज, कंधार, कश्मीर और कच्छ तक विस्तार किया था। 


उनका जन्म 663 ईसवी में हुआ था और 16 जून 712 ईसवी को इस महान भारत भूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने बलिदान दे दिया था। उनके शहीद होने के बाद उनकी पत्नी, बहन और दोनों पुत्रियों ने भी बलिदान देकर भारत में एक नई परंपरा का सूत्रपात किया था। गोरक्षक के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। सिंध राज्य के वैभव की कहानियां सुनकर ईरान के शासक हज्जाम ने 712 ईसवी में अपने सेनापति मोहम्मद बिन कासिम को एक विशाल सेना के साथ सिंध पर हमला करने के लिए भेजा। 


कासिम ने देवल के किले पर कई आक्रमण किए, पर राजा दाहिरसेन और उनके हिंदू वीरों ने हर बार उसे पीछे धकेल दिया। परंतु कई बार हारने के बावजूद अंततः मोहम्मद बिन कासिम ने दाहिरसेन को विश्वासघात कर हरा दिया। उसके बाद सिंध को अल-हिलाज के खलीफा द्वारा अपने राज्य में शामिल कर लिया गया और खलीफा के प्रतिनिधियों द्वारा सिंध में शासन-प्रशासन चलाया गया। समय के साथ-साथ सिंध पर शासन करने वाले शासक भी बदलते रहे। 


एक समय सिंध की राजधानी थट्टा पर अत्याचारी, दुराचारी एवं कट्टर इस्लामी आक्रमणकारी मिरखशाह का शासन स्थापित हो गया। उसने सिंध एवं इसके आसपास के क्षेत्र में इस्लाम को फैलाने के लिए वहां के निवासियों का नरसंहार करना शुरू किया। यदि भारत के प्राचीन अर्थतंत्र के बारे में अध्ययन किया जाए, तो ध्यान आता है कि प्राचीन भारत की अर्थव्यस्था बहुत समृद्ध थी एवं इसमें सिंध क्षेत्र का प्रमुख योगदान था। 


ब्रिटिश आर्थिक इतिहास लेखक एंगस मेडिसन एवं अन्य कई अनुसंधान शोधपत्रों के अनुसार ईसा के पूर्व की 15 शताब्दियों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 35.40 प्रतिशत बना रहा एवं ईसवी वर्ष एक से सन 1500 तक भारत विश्व का सबसे धनी देश था। एंगस मेडिसन के अनुसार, मुगलकालीन आर्थिक गतिरोध के बाद भी 1700 ईसवी में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान 24.4 प्रतिशत था। ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के दौर में यह घटकर 1950 में मात्र 4.2 प्रतिशत रह गया था। 


भारत से कृषि उत्पादों, मसालों एवं कपड़े आदि के निर्यात से विदेशी मुद्रा के रूप में सोना प्राप्त होता था, अतः भारत में सोने के अथाह भंडार जमा हो गए थे। भारत से होने वाला विदेशी व्यापार भी सामान्यतः सिंध स्थित बंदरगाहों के माध्यम से होता था। मुगलों एवं अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में हिंदुओं को विभिन्न जाति, धर्म, पंथ एवं संप्रदाय में अलग-अलग बांटने की पुरजोर कोशिश की गई थी, ताकि भारत एक राष्ट्र के रूप में उभर नहीं सके। 
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सिंध क्षेत्र के हिंदू सिंधियों पर इन बातों का बहुत कम असर हुआ था। इसी के चलते वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के समय लाखों की संख्या में हिंदू सिंधियों ने भारत को अपनी माता मानते हुए भारत के विभिन्न राज्यों में अपना घर बसा लिया। हिंदू सिंधियों के उस वक्त के सबसे बुरे दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उनकी बहुत मदद की थी। चूंकि पूर्व में सिंध भारत का अभिन्न अंग रहा है, अतः आज भारतीय सिंधियों में इस बात की टीस लगातार उभरती रहती है कि सिंध भारत से अलग क्यों है।

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