हिमालय संरक्षण के लिए इससे जुड़े जन मुद्दों पर बहस जरूरी है, क्योंकि अब तक हम उस हिमालय की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं, जो यहां के जनजीवन से भी ज्यादा जुड़ा है। हिमालय मात्र हवा, मिट्टी, पत्थर और पानी ही नहीं है, बल्कि देश-दुनिया की संस्कृति व संसाधनों का जनक भी है।
हिमालय से मात्र लाभ लेना हिमालय के प्रति असंवेदनशीलता होगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हिमालय में देवी-देवताओं के वास के पीछे इसकी प्रकृति और पवित्रता बड़े कारण रहे हैं। अगर हम संदर्भ समझे बिना कोई बात करने की कोशिश करेंगें, तो वह बेमानी होगा। यह समय यह मंथन करने का है कि हमने हिमालय से क्या-क्या लिया है और उसके सापेक्ष उसे क्य-क्या लौटाया है। हिमालय के बिगड़ते हालात हमारी न लौटाने वाली प्रवृत्ति का सूचक है।
हिमालय जो देश-दुनिया को सब कुछ अनवरत एवं अप्रत्याशित रूप में देता है, आज स्वयं संकटों से घिरा है। पिछले 10 वर्षों में कोई भी मानसून ऐसा नहीं बीता, जब यहां जानमाल की हानि न हुई हो। अब इसे जलवायु परिवर्तन की मार समझ लें या फिर इसके साथ खुद की नासमझी को जोड़ लें, पर हिमालय को इस हाल में हमने ही पहुंचाया है।
हिमालय ने कई सरकारें देख ली। यह उत्तराखंड हो या फिर अन्य कोई राज्य या फिर केंद्र। किसी ने कभी हिमालय की समग्रता को लेकर चिंता नहीं की। हां, हमारी बातचीत में यह जरूर झलकता है कि इससे कैसे लाभ उठा सकते हैं, पर इसके संरक्षण के प्रति उदासीनता दिखाई देती है। यहां के लोग ठगा-सा महसूस करते हैं।
यहां के संसाधन कभी इनके काम नहीं आए। बांधों का बोझ हो या फिर बाढ़ का प्रकोप, बस यही इनके हिस्से में ज्यादा आया। वैसे भी अब पहाड़ी मानसून का स्वागत नहीं कर पाते। इनसे जुड़े लोकगीत की धुन अब फीकी पड़ गई। बरसात अब यहां नींद उड़ा देती है और हर बार घर-गांव का कुछ न कुछ बह ही जाता है।
असल में हिमालयी राज्यों के निर्माण में उनकी भौगोलिक विषमता की दुहाई दी गई। इसके पैरोकारों ने यहां के कठिन जीवन से मुक्ति पाने का रास्ता राज्य निर्माण ही माना था, पर वह भी उल्टे गले पड़ गया, क्योंकि सरकारों की चुनौती राज्य की आर्थिकी को मजबूत करने तक सीमित रही है।
आखिर उन्हें भी अगली पारी की तैयारी करनी होती है। इसी लपेटे में हिमालय एक के बाद एक विकास की ऐसी एकतरफा योजनाओं में फंस गया है, जिनसे बस यही हुआ कि घर, गांव खाली हो गए हैं। राज्य निर्माण के बाद हिमालय के रखरखाव व पारिस्थितिकी संतुलन को दरकिनार कर दिया गया। पहाड़ी राज्यों में हिमाचल प्रदेश की खुशहाली अपनी जगह जरूर बनी हुई है, पर गत पांच वर्षों में यहां भी पारिस्थितिकी असंतुलन बढ़ा है।
यहां खेती-बाड़ी तो जरूर बेहतर हुई, मगर बांधों ने यहां की पारिस्थितिकी का बंटाधार कर दिया है। अमूमन ये हालात सभी हिमालयी राज्यों के हैं, जहां आर्थिकी के चक्कर में पर्यावरण गर्त में जा रहा है। हिमालय देश-दुनिया को पालता है, इसका चिरायु रहना आवश्यक है। इसका अतिदोहन इसके अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है।
हमने हिमालय को लेकर इसके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक पहलुओं को बहुत उघारा है, पर इनके संरक्षण के लिए ज्यादा दम नहीं लगाया। हिमालय की पारिस्थितिकी समझ इसकी पहली शर्त होनी चाहिए थी। यहां विकास का ढांचा सड़क व उद्योगों से जोड़कर देखा जाता है।
हिमालय के विकास के प्रति कटिबद्धता खोखली लगती है। सरकारों का मानना होता है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। सही भी है और स्वीकार्य भी। पर यहां के स्थानीय निवासियों को क्या मिला, सवाल अपनी जगह खड़े हैं। हिमालय अगर सबका है, तो इसके संरक्षण का जिम्मा सिर्फ इनका क्यों, जो आज भी कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
हम हिमालय में ऐसे विकास के पक्षधर कैसे हो सकते हैं, जब हमारे हिस्से में सिर्फ बाढ़, अनियोजित सड़क निर्माण से हो रहा भूस्खलन और पलायन हो। हमारी विकास की नीतियों में हिमालयीपन और अपनापन नहीं है और यही उत्तर भी है। हिमालय हमारा नहीं रहा, इसमें मालिकाना हक सरकारों का हो गया है! हिमालय को बचाना है, तो एक बार फिर सड़कों पर उतरने का समय आ गया है और अबकी बार अपने लिए न सही, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए, जो हमें तर्पण देंगी। (लेखक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।)