हमारे यहां अस्पृश्यता अमेरिका और अफ्रीका की गुलाम पृथा से अधिक अमानवीय है। हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक हो गया, पर दलित दमन और बढ़ गया। अस्पृश्यता रूप बदल कर आज भी जारी है। हम उन देशों से भी प्रेरणा नहीं लेते, जिन्होंने जातिभेद की तरह नस्लभेद और रंगभेद को समाप्त कर दिया। हमारे यहां संविधान सम्मत व्यवहार नहीं हो रहा।
जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की सामाजिक शिक्षा सकारात्मक और संविधान सम्मत हो। छात्रों को संविधान की मूलभूत शिक्षा अवश्य पढ़ाई जानी चाहिए। समता भाव जगाने वाली फिल्मों, कविताओं, कहानियाें, चित्रकला, गीत, संगीत, नृत्य आदि को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए। दलित आदिवासियों के साहित्य इस दिशा में काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
अध्ययन बताता है कि दास पृथा केवल दासों के प्रयासों से समाप्त नहीं हुई। उसमें स्वामी वर्ग का भी योगदान था। दरअसल गोरे स्वामियों का एक बड़ा हिस्सा दास पृथा के विरोध में खड़ा हो गया था। पचास फीसद गोरे कालों की गुलामी के विरोध में खड़े हो गए और दास पृथा को उन्होंने समाप्त कर दिया। यही नहीं, अमेरिका ने उसके बाद कला, मीडिया, उद्योग, शिक्षा, साहित्य जैसे सभी क्षेत्रों में अफर्मेटिव ऐक्शन के तहत दलितों की भागीदारी सुनिश्चित कर और काम करने के अवसर देकर अपने देश को महाशक्ति बना दिया।
दूसरी ओर, हमारे देश में दलितों और आदिवासियों को सेवाओं से बाहर रखने के लिए ही नए-नए तरीके अपनाए गए, जिससे देश को उनकी सेवाओं का लाभ नहीं मिल सकता। हमारे नेता केवल राजनीति में ही रुचि लेते हैं, समाज सुधार की चिंता उन्हें नहीं होती। चूंकि समाज में, साहित्य में, शिक्षा में उच्च मानवीय आदर्श नहीं हैं, इसलिए ऐसे वर्णभेदी समाज से निकला नेता भी लोकतांत्रित समता भाव का विकास नहीं करना चाहता, वह समाज में मौजूद भेदभाव का केवल राजनीतिक लाभ लेना चाहता है।