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गांव जीत लिया...और सब की प्यारी ‘पियारा बुआ’ बन गई

Sun, 03 Dec 2017 03:36 PM IST
अभियान डेस्क / अमर उजाला
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उस दिन सुबह की सफेदी अभी छुपी भी नहीं थी कि इमली-तले के तीनदरे से पियारा बुआ के रेघा-रेघाकर रोने की आवाज सारे मोहल्ले में गूंज उठी। रुलाई में ऐसा दर्द कि पिछले पहर के नींद में माते सन्नाटे का सीना चाक-चाक हो रहा था। आदमियों की नींद तो हवा हो ही गई। इमली पर बसेरा लेने वाले पंछी और उसके नीचे खूंटों से बंधे चौपाए भी ऐसे चीखने और डकराने लगे कि जैसे यह दर्द उनसे भी सहा न जा रहा हो। सारे मोहल्ले में जगरम हो गया और जो जैसे था, वैसे ही पियारा बुआ के तीनदरे की ओर भाग खड़ा हुआ। सोए बच्चों की चिन्ता न होती तो बहुएं भी वहां जाने से अपने को न रोक पातीं। फिर भी वे अपने-अपने दरवाजे पर खड़ी हो, कान रोपे उधर से आने वाली आवाजों को सुनने की कोशिश करने लगीं।
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देखते-देखते तीनदरे के सामने छोह-भरे लोगों का ठठ्ठ लग गया। ओसारे में नाक तक मारकीन की धोती का घूंघट खींचे, पांवों पर बेहाल सी बैठी, गर्दन झुकाए, बाएं हाथ पर गाल टेके रेघा-रेघाकर पियारा बुआ रो रही थीं-आ रामा! इहे दिनवा दिखावे खातिर तू हमके छोड़ी गइल हो रामा! अ-ह-ह ...

दाबे पर धरमुआ एक हत्यारे की तरह सिर झुकाए बैठा था और दालान में उसकी औरत। पियारा बुआ को चारों ओर से घेरकर औरतें बैठी थीं और उन्हें छू-छूकर उन्हें चुप कराने की कोशिश करती, रोने का सबब पूछ रही थीं। लेकिन पियारा बुआ का सिर तो जैसे उठना ही भूल गया था। पियारा बुआ को आंख दिखाने वाले यह जान तो लें कि उन्हें जानने-मानने वाले कितने हैं? मोहल्ले और गांव की बात कौन चलावे, बाहर के आने-जाने वाले पंथी भी जितना पियारा बुआ को जानते-मानते थे, उतना कितनों के नसीबों में न होता है! जो कोई भी वहां आता या जहां-कहीं भी वह जातीं, ‘पियारा बुआ-पियारा बुआ’ कहते लोगों की जबान घिसती। बहुओं और औरतों को तो तीज-त्योहार भी बिना उनके हुंकारी पारे न होता। ऐसी कोई बहू नहीं, जो पियरी पहने और उनके पांव छूकर असीस न ले। ऐसी कोई औरत नहीं, जो कोई गहना बनवाए और उनसे राय न ले।
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किसी बच्चे के दांत उठें, तो घुट्टी वो तैयार करें, किसी की आंव आए, तो रुखरा वो पारें। ब्याह-शादी, पूजा-पाठ में वो गीत कढ़ावें, तो गीत शुरू हो। किसी के भी रंज-गम में सबसे आगे वो। मर्द भी उनका मुंह जोहते, बिना उनकी राय लिए कोई कदम न उठाते। इसी गांव में वह पचास पार करने को आईं। उन्हें ‘पियारा’ कहके पुकारने वाले गांव में अब इने-गिने ही रह गए हैं। आज पियारा को देखकर कौन कह सकता है कि यह सुन्दर शरीर, लेकिन फूटा करम लेकर दुनिया में आईं थी। ब्याह की डोली चढ़कर गई, तो तीन महीने के अन्दर ही विधवा होकर वापस आ गई और छह महीने के अन्दर ही बेबाप भी हो गई। छोटा इकलौता भाई धरमुआ उस वक्त 12 साल का था और मां ऐसी मूर्ख कि इस दोहरे सदमे से उसका दिमाग ही चल गया। उसके रोने और हंसने में कोई फर्क ही नहीं रह गया। पियारा का देवर क्रिया-कर्म में आया, तो उसने पियारा को ले जाने की इच्छा प्रकट की। पियारा का एक पट्टीदार मां-भाई को अपने यहां रखने को तैयार हो गया, लेकिन पियारा बोली, ‘मेरी जो गति अब होनी होगी, यहीं होगी। तुम लोग खोज-खबर लेते रहना और मैं कुछ नहीं चाहती।’

और पियारा की देह पर जो मारकीन की धोती चढ़ी, तो फिर कोई दूसरा कपड़ा किसी ने कभी भी नहीं देखा। और जो उसका घूंघट भौंहों के नीचे झुका, तो तब से किसी मर्द ने उसकी आंखें न देखीं। कोई कहता, ‘पियारा, तू गांव की बेटी है, यह घूंघट काहे को काढ़े रहती है?’ तो वह कहती, ‘भैया, इसी की शर्म बची रहे!

बाप पोत पर लेकर एक बैल से खेती करता था। क्रिया-कर्म में बैल बिक गया था। पियारा से खेती क्या होती? वह एक पिसनहारी के साथ मिलकर घर की जाते पर दिन-रात आटा पीसने लगी। बाजार के दिन वह टोकरी में आटा सजा माथे पर ले पिसनहारी के साथ कस्बे बेचने जाती। थोड़े ही दिनों में उनका आटा बाजार में मशहूर हो गया। फिर धरमू के माथे भी वह आटा ले जाने लगी। सत्तू चाट-चाटकर तीन बरस तक उसने गुजर किया। फिर एक दिन देखा गया कि उसके ओसारे में कुरुई और मउनी सज रही हैं। मालूम हुआ कि वह आटा के साथ-साथ मसाले की दुकान भी खोलने जा रही है।
कहते हैं, पियारा का तभी से दिमाग खुल गया। एक दिन वह था और एक दिन यह है। पियारा ने तीनदरा बनवा लिया, धरमू की शादी रचाई। अपने मीठे व्यवहार, परोपकारी स्वभाव और परिश्रम की कमाई की बदौलत उसने मोहल्ले और गांव को जीत लिया।

और सब की प्यारी ‘पियारा बुआ’ बन गई। और भैया, मारकीन की धोती और भौहों के नीचे तक घूंघट में उसे आज देखो, तो क्या तुम कह सकोगे कि वह पचास पार करने को आई? ऐसी मजबूत काठी और मेहनत की बनी तंदुरुस्ती कि उसे देखकर मुश्किल-से-मुश्किल काम भी दहल जाए! लेकिन भैया, जब से धरमू की शादी हुई है, रह-रहकर कभी-न-कभी बर्तन बज ही उठते हैं। बेचारी पियारा लड़ाई-झगड़ा क्या जाने, वह नाक तक घूंघट खींचकर बस रोने लगती है। और उसकी रुलाई का दर्द किसी से सहा नहीं जाता। और तो और, पियारा की बछिया ऐसे डकारने लगती है कि जैसे उसकी गर्दन पर कोई कसाई छुरी फेर रहा हो। कभी-कभी डर लगता है, भैया कि कहीं बछिया पगहा न तुड़ा ले। पियारा के देवर अब भी साल-छह महीने में खोज-खबर लेने आते हैं। कहीं कसाई धरमुआ और उसकी औरत के कारण पियारा मोहल्ला-गांव छोड़कर अपनी ससुराल चली गई तो...
लेकिन सुननेवाला एक अजीब मुस्कान होंठों पर लाकर कहता है, ‘बाबा! मोहल्ला-गांव धरमुआ से कहीं बड़ा है, वह अपनी पियारा बुआ को कहीं भी नहीं जाने देगा! यह खूंटा कोई वैसा कमजोर नहीं!’
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