मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के एक छोटे-से शहर में हुआ। मैंने बहुत छोटी उम्र से लिखना शुरू कर दिया था। मुझे लिखने की प्रेरणा मेरी मां से मिली, जो मुझे तरह-तरह की लोककथाएं सुनाती थीं। लोककथाओं के किरदार मेरे आसपास घूमते थे, रात में अक्सर वे मेरे सपने में भी आते थे।
युवा होने पर मेरा जीवन लेखन से मिली कमाई पर ही निर्भर था। हालांकि मैंने एम.ए. तक पढ़ाई की, लेकिन लंबे समय तक मैंने नौकरी नहीं की, क्योंकि मुझे लगता था कि नौकरी करने का मेरे लेखन पर विपरीत असर पड़ेगा।
मैंने इसी कारण शादी न करने के बारे में भी सोचा था। लेकिन न केवल मेरी शादी हुई, बल्कि न चाहते हुए भी मुझे सरकार द्वारा वित्तपोषित एक संस्था में अस्थायी नौकरी करने के लिए विवश होना पड़ा। वह मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था, क्योंकि मैं न चाहते हुए भी साहित्य से दूर हो रहा था। लेकिन उस हताशा और संघर्ष भरे दौर में लोककथाओं ने ही मुझे सहारा दिया।
मेरे उपन्यासों में मुस्लिम समाज की महिलाएं बहुतायत में हैं। इस कारण पाठक मुझे स्त्रीवादी लेखक समझ लेते हैं। चूंकि मैंने गांव का जीवन जीया है, इसलिए मेरे लेखन में लोकजीवन और लोककथाओं को महत्व मिला है, क्योंकि मुझे लगता है कि गांव से जुड़ी कहानियां दरअसल हमारे जड़ों से जुड़ी कहानियां हैं।
मैं खुद को एक साधारण आदमी मानता हूं, इसलिए साधारण लोगों की कहानियां लिखने में विश्वास करता हूं। आज भी मैं लोककथाएं ढूंढता हूं और उन्हीं के आसपास अपनी कहानियों और उपन्यासों की रूपरेखा तैयार करता हूं।