रस प्रधान साहित्य शब्द ब्रह्म का आनंदमय रूप है। कालिदास की कविता पढ़ना मानो ब्रह्म का पान करना है, एक शांत आनंद बोध है, परंतु भीतर के चिन्मय व्यक्तित्व का एक सक्रिय जागरण भी है। 'रघुवंशम' पढ़ते समय श्लोक-प्रति-श्लोक दोनों तथ्यों का बोध होता चलता है।
शब्द ब्रह्म के आनंद का पान करने से हमारे अंतर के प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोष तृप्त और सबल होते हैं। यह क्रिया लगातार चलती रहती है। इस प्रकार एक 'स्थायी प्रवृत्ति' की रचना होती है। यह स्थायी 'प्रवृत्ति' ही हमारे दैनंदिन या दीर्घकालीन क्रिया-कलाप में अपने को शत-सहस्र रूपों में व्यक्त कर रही है।
यह हमारी सकर्मक मनोभूमि को या चेतना के सकर्मक को निरंतर प्रचोदित-उत्प्रेरित कर रही है। हमारे बाह्य जीवन की सारी क्रियाएं इसी प्रचोदन का लोप है। इसीलिए कहता हूं कि कालिदास को पढ़ना सरस्वती-प्रचोदित मनोभूमि का आस्वादन है।
श्लोक-प्रति-श्लोक लगता है कि हमारा संपुटित चिन्मय व्यक्तित्व संपुट-मुक्त होने को उन्मुख है और सारी मनोभूमि दल-प्रति-दल, कला-प्रति-कला स्पंदित होने लगती है। मन-प्राण और बुद्धि एक अपूर्व 'आनंद' से या रस-बोध' से तृप्त और स्वस्थ हो जाते हैं और साथ ही मनोभूमि सक्रिय होकर कर्म-स्पंदन के लिए तत्पर हो उठती है।
अतः साहित्य, कला, दर्शन आदि पर, विशेषतः रसप्रधान साहित्य पर, यह आक्षेप कि यह मनोविलास मात्र है, भित्तिहीन है। यह एक मानसिक चिकित्सा है, मानसिक भोजन-पान है और मानसिक सक्रियता है। जैसे देह के लिए रोटी-दाल 'विलास' नहीं 'आवश्यकता' है, वैसे ही साहित्य मन की जरूरत है।