कविता लिखने का कोई नुस्खा मैंने किताबों से नहीं सीखा। कवि को दूसरे जनों से सीखना होता है। कोई अकेलापन अजेय नहीं होता। सभी राहें उसी लक्ष्य को जाती हैं-जो हम हैं, उसे दूसरों को संप्रेषित करना और उस ऐंद्रजालिक स्थली तक पहुंचने के लिए, जहां हम अपना अनाड़ी नृत्य कर सकें और अपना दुख भरा गीत गा सकें। हमें अकेलेपन और कठिनाई से, विलगाव और मौन से गुजरना पड़ेगा-लेकिन इस नृत्य या गीत में हमारी आत्मा के प्राचीनतम संस्कार मानव होने और साझा नियति में आस्था के बोध में चरितार्थ होते हैं।
मैं मानता हूं कि कवि के कर्तव्यों में न तो आरोप लगाना शामिल है और न बचाव करना। कवि कोई लघु ईश्वर नहीं होता। नहीं, वह लघु ईश्वर नहीं है। उसे कोई रहस्यमय नियति दूसरे हुनरों और पेशे वालों पर तरजीह देकर नहीं चुनती। मैंने अक्सर यह माना है कि सबसे अच्छा कवि वह है, जो हमारे लिए रोज की रोटी तैयार करता है-हमारे सबसे नजदीक का नानबाई, जो खुद को खुदा नहीं समझता।
आटा गूंधने, उसे भट्ठी में डालने, उसे सुनहरे रंगों में सेंकने और हमें अपनी रोज की रोटी पकड़ाने का शानदार और निरभिमानी काम वह दोस्ताना फर्ज की तरह निभाता है। और यदि कवि इस सादा एहसास को हासिल करने में कामयाब हो जाता है, तो यह भी एक विराट गतिविधि के एक तत्व में बदल जाएगा, एक सादा या जटिल संरचना के तत्व में, जिससे एक बिरादरी का निर्माण संघटित होता है।
सामान्यजन होने के अपरिहार्य आचरण मात्र से ही हम कविता को वह जबर्दस्त विस्तार लौटा सकेंगे, जो हर युग में उससे थोड़ा-थोड़ा कतर दिया गया है, ठीक जैसे हम हर युग में छील दिए गए हैं। हमारे मूल मार्गदर्शी नक्षत्र हैं संघर्ष और आशा। लेकिन अकेला संघर्ष और अकेली आशा नाम की कोई चीज नहीं होती।
-चिली के नोबेलजयी कवि