विस्थापन का दर्द तो उन अतीत जीवियों का हुआ, जो इस के भुक्तभोगी थे। मैं उन लोगों के विस्थापन वाले इतिहास से बहुत दूर पड़ जाता हूं। परंतु मैं पीढ़ियों की इस दूरी का खंडन भी कर रहा हूं। कहने का मेरा तात्पर्य है उन लोगों का विस्थापन मेरे अंतस में अपनी तरह से एक कोना जमाए बैठा होता है और मैं उसे बड़े प्यार से संजोये रखता हूं। इसी बात पर मेरा मनोबल यह बनता है कि मैं भारतीयों के विस्थापन को मानसिक स्तर पर जीता आया हूं।
यही नहीं, बल्कि मैं तो कहता हूं कि अपने छुटपन में मैं अपने छोटे पांवों से इतिहास की गलियों में बहुत दूर तक चला भी था। अपने लेखन के लिए मैंने भारतीयों का विस्थापन लिया, तो यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है, मैंने उनके सुख-दुख, आंसू, शोषण, गरीबी, रिश्ते सब के सब लिए। मेरे किशोर काल में मेरे पिता मुझे इस देश में आकर बसे हुए भारतीयों की वेदनाजनित कहानियां सुनाया करते थे।
अपने पिता से सुना हुआ भारतीयों का दुख-दर्द मेरी धमनियों में बहुत गहरे उतरता था।
यह तो बाद की बात हुई कि मैं लेखक हुआ। परंतु कौन जाने मेरे पिता अप्रत्यक्ष रूप से मुझे लेखन कर्म के लिए तैयार करते थे। वह मेरे लिए अच्छी कलम खरीदते थे। पाटी, पुस्तक और पढ़ाई के दूसरे साधनों से मानो वे मुझे मालामाल करते थे। मेरे पिता अनपढ़ थे, लेकिन उन्हें ज्ञात था कि सरस्वती नाम की एक देवी है, जिसके हाथों में वीणा होती है और उसे विद्या की देवी कहा जाता है।
मेरे पिता ने सरस्वती का कैलेंडर दीवार पर टांगकर मुझ से कहा था कि विद्या प्राप्ति के लिए नित्य उस का वंदन करूं। बचपन में मुझे अपने पिता की ओर से हिंदी का संस्कार मिला था। जिसे वास्तविक हिंदी का ज्ञान कहेंगे, वह बाद में मेरे हिस्से आया। आज हिंदी से अपनी पहचान का मुझे बहुत फख्र है। हिंदी ने मुझे अनाथ नहीं छोड़ा। हिंदी ने मुझे रोटी दी और मैंने इसी भाषा के बूते बच्चों को पढ़ाया।
-मॉरीशस के वरिष्ठ कथाकार